भारत की पवित्र गंगा नदी ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। केंद्रीय राज्य मंत्री Raj Bhushan Choudhary ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि गंगा नदी का पानी अब सभी मॉनिटर किए गए स्थानों पर स्नान मानकों के अनुरूप है और प्रदूषण स्तर लगातार घट रहे हैं। यह डेटा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2025 के मध्यवर्ती आंकड़ों (जनवरी से अगस्त) पर आधारित है।
गंगा का पानी अब स्नान के लिए सुरक्षित
राज्य मंत्री ने बताया कि गंगा का pH और घुलित ऑक्सीजन स्तर सभी monitored locations पर स्नान मानकों के अनुरूप हैं। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में कुल 112 स्थानों पर पानी की गुणवत्ता का निरीक्षण किया गया।
विशेष रूप से, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में पूरे नदी तट की जल गुणवत्ता स्नान मानकों के अनुसार है। हालांकि, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में सुधार की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। इनमें शामिल हैं:
- फर्रुखाबाद से पुराना राजापुर (कानपुर)
- डलमऊ (रायबरेली)
- मिर्जापुर से तारिघाट (गाजीपुर)
इसका मतलब यह है कि नदी का अधिकांश हिस्सा अब सुरक्षित है, लेकिन कुछ हिस्सों में प्रदूषण नियंत्रण और पानी की गुणवत्ता में और सुधार की जरूरत है।
जैविक जल गुणवत्ता और जलीय जीवन
राज्य मंत्री ने बताया कि 2024-25 में गंगा और उसकी सहायक नदियों में 50 स्थानों पर और यमुना नदी में 26 स्थानों पर बायो-मॉनिटरिंग की गई। इसका परिणाम यह दिखाता है कि नदी की जैविक जल गुणवत्ता मुख्य रूप से “अच्छी” से “मध्यम” स्तर पर है।
इसका महत्व यह है कि नदियों में जलीय जीवन को बनाए रखने की प्राकृतिक क्षमता बनी हुई है। इसके साथ ही नदी में रहने वाले जीव-जंतु और मछलियों की संख्या में भी सुधार देखा जा रहा है।
जैव विविधता और संरक्षण कार्यक्रम
गंगा और उसकी सहायक नदियों में जैव विविधता बढ़ाने के लिए कई संरक्षित परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं। इनमें शामिल हैं:
- डॉल्फिन संरक्षण
- ऊद और हिल्सा मछली का पुनर्वास
- कछुआ और घड़ियाल की सुरक्षा
इन परियोजनाओं के तहत रिस्क्यू और पुनर्वास कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। वन्य जीव संस्थान और राज्य वन विभाग के सहयोग से इन प्रजातियों की संख्या में वृद्धि देखी गई है।
नमामि गंगे कार्यक्रम की सफलता
गंगा और इसकी सहायक नदियों को साफ और पुनर्जीवित करने के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत कई व्यापक पहल की गई हैं। इनमें शामिल हैं:
- सीवेज ट्रीटमेंट और औद्योगिक effluent का प्रबंधन
- नदी किनारे का विकास और संरक्षण
- जल प्रवाह सुनिश्चित करना (e-flow)
- ग्रामीण स्वच्छता और वृक्षारोपण
- जैव विविधता संरक्षण और जनता की भागीदारी
फरवरी 2026 तक, कुल 524 परियोजनाएं मंजूर की गई हैं, जिनकी कुल लागत ₹43,030 करोड़ है। इनमें से 355 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।
विशेष रूप से, 218 सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं से 6,610 MLD की ट्रीटमेंट क्षमता सुनिश्चित हुई है। 138 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (4,050 MLD) पूरी तरह से ऑपरेशनल हैं।
औद्योगिक प्रदूषण में कमी
औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण कम करने के लिए तीन सामान्य effluent treatment plants (CETPs) स्थापित किए गए हैं:
- जजमऊ (20 MLD)
- बांथर (4.5 MLD)
- मथुरा (6.25 MLD)
इनमें से दो प्लांट पूरी तरह कार्यरत हैं।
सालाना निरीक्षणों के अनुसार, बीओडी लोड 2017 में 26 टन प्रति दिन था, जो 2024 में घटकर 10.75 टन प्रति दिन रह गया। इसी तरह, औद्योगिक effluent डिस्चार्ज में 23.9% की कमी हुई है, जो 349 MLD से घटकर 265.56 MLD हो गया।
अन्य नदियों में सुधार
गंगा के अलावा, राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) के तहत अन्य नदियों में भी प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं। अब तक 58 नदियों में 100 शहरों में ₹8,970.51 करोड़ की परियोजनाएं लागू की गई हैं। इन परियोजनाओं से कुल 3,019 MLD सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता बनाई गई है।
निष्कर्ष और महत्व
इस डेटा से स्पष्ट होता है कि गंगा और अन्य नदियों में पानी की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है और प्रदूषण स्तर घट रहा है। इसका महत्व केवल स्नान और धार्मिक उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर जलीय जीवन, कृषि, स्वास्थ्य और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ता है।
सतत सरकारी प्रयास, वैज्ञानिक तकनीक और जनता की भागीदारी मिलकर नदियों की सफाई और संरक्षण में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं। गंगा नदी का अब स्नान मानकों पर खरा उतरना और प्रदूषण में कमी, नमामि गंगे कार्यक्रम की सफलता का प्रतीक है।
यह दर्शाता है कि सही दिशा में लगातार प्रयास और तकनीकी हस्तक्षेप से प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
Also Read:


