पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत की तेल मार्केट को फिर मुश्किल में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है और ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से इसमें करीब 50 फीसदी की तेजी आ चुकी है। इसका सीधा असर भारत की सरकारी तेल कंपनियों पर पड़ रहा है, जिन्हें अब हर दिन भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
हाल ही में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी, लेकिन ब्रोकरेज फर्मों और एनालिस्ट्स का कहना है कि यह बढ़ोतरी नुकसान की तुलना में बेहद कम है। अनुमान है कि इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी मिलाकर रोजाना लगभग ₹1,380 करोड़ का नुकसान हो रहा है।
क्यों बढ़ रहा है तेल कंपनियों का नुकसान?
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो उसका सीधा असर देश की तेल कंपनियों की लागत पर पड़ता है। लेकिन राजनीतिक और महंगाई के दबाव की वजह से कंपनियां तुरंत खुदरा कीमतों में उतनी बढ़ोतरी नहीं कर पातीं।
यही वजह है कि कंपनियां महंगा कच्चा तेल खरीद रही हैं, लेकिन पेट्रोल-डीजल सीमित दाम पर बेच रही हैं इससे प्रति लीटर मार्जिन तेजी से घट रहा है नोमुरा के एनालिस्ट विनीत बांका की कैलकुलेशन के मुताबिक मौजूदा हालात में कंपनियों का संयुक्त नुकसान रोजाना ₹1,380 करोड़ तक पहुंच गया है।
कितनी बढ़ सकती हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें?
एनालिस्ट्स का मानना है कि सिर्फ 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं है। कुछ ब्रोकरेज रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकारी तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर 20 से 25 रुपये प्रति लीटर तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है, अगर कच्चे तेल के दाम लंबे समय तक ऊंचे बने रहते हैं।
हालांकि सरकार एक साथ इतनी बड़ी बढ़ोतरी शायद ही करे क्योंकि इससे महंगाई पर बड़ा असर पड़ेगा। इसलिए संभावना यह है कि कीमतें चरणबद्ध तरीके से बढ़ें या सरकार कंपनियों को सब्सिडी/फिस्कल सपोर्ट दे या एक्साइज ड्यूटी में बदलाव किया जाए
किस कंपनी की स्थिति सबसे ज्यादा खराब?
ब्रोकरेज रिपोर्ट्स के अनुसार सबसे ज्यादा दबाव हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) पर है। कंपनी को इंटीग्रेटेड बेसिस पर प्रति बैरल करीब 19 डॉलर का नुकसान हो रहा है। वहीं इंडियन ऑयल (IOCL) को करीब 4 डॉलर प्रति बैरल नुकसान, भारत पेट्रोलियम (BPCL) को करीब 8 डॉलर प्रति बैरल नुकसान
बताया जा रहा है कि अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो HPCL की बैलेंस शीट पर सबसे पहले असर पड़ेगा, BPCL पर 4 साल में दबाव बढ़ सकता है जबकि IOCL की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है
दिलचस्प बात यह है कि ईरान संकट से पहले यही कंपनियां प्रति बैरल 12 से 14 डॉलर तक का फायदा कमा रही थीं।
एलपीजी सिलेंडर पर भी भारी घाटा
संकट सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं है। घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर भी कंपनियां भारी नुकसान उठा रही हैं। एचपीसीएल ने हाल की एनालिस्ट कॉल में बताया कि हर घरेलू गैस सिलेंडर पर करीब ₹670 का नुकसान हो रहा है ब्रोकरेज फर्म एमके के मुताबिक एलपीजी पर कंपनियों का दैनिक नुकसान ₹200–400 करोड़ के बीच हो सकता है।
इसके अलावा विमान ईंधन यानी ATF पर भी कंपनियों को दबाव झेलना पड़ रहा है क्योंकि एयरलाइंस सेक्टर में कीमतों में पूरी बढ़ोतरी पास नहीं की गई है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा।
महंगा ईंधन ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ाएगा, खाने-पीने की चीजें महंगी करेगा, कैब और बस किराया बढ़ा सकता है, हवाई यात्रा महंगी कर सकता है, महंगाई दर पर दबाव बढ़ा सकता है यानी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
यूक्रेन युद्ध जैसा दोबारा बन रहा माहौल?
नोमुरा समेत कई ग्लोबल ब्रोकरेज फर्मों का कहना है कि मौजूदा स्थिति काफी हद तक यूक्रेन युद्ध जैसी दिख रही है। उस समय भी कच्चा तेल तेजी से महंगा हुआ था तेल कंपनियों का नुकसान बढ़ा था बाद में धीरे-धीरे खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ी थी अब फिर वैसा ही दबाव बनता दिख रहा है।
आगे क्या हो सकता है?
अब पूरा खेल तीन चीजों पर निर्भर करेगा:
- ईरान और पश्चिम एशिया का तनाव कितना बढ़ता है
- ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के ऊपर कितने समय तक रहता है
- सरकार कंपनियों को राहत देती है या कीमतें बढ़ाने देती है
अगर कच्चा तेल जल्दी नीचे नहीं आया तो आने वाले हफ्तों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
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