Highlights
- केंद्र सरकार ने गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026 का मसौदा वापस लिया
- किसानों और खांडसारी उद्योग के विरोध के बाद लिया गया फैसला
- गन्ना बेचने के विकल्प सीमित होने की आशंका फिलहाल टली
- यूपी समेत कई राज्यों के लाखों किसानों को राहत
- सरकार अब नए सिरे से तैयार करेगी संशोधित मसौदा
नई दिल्ली। देश के लाखों गन्ना किसानों के लिए बड़ी राहत की खबर है। केंद्र सरकार ने उस गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026 के मसौदे को वापस लेने का फैसला किया है, जिस पर किसान संगठन, खांडसारी उद्योग और कई राज्य सरकारें लगातार आपत्ति जता रही थीं। किसानों का दावा था कि यदि यह मसौदा लागू हो जाता तो गन्ना बेचने के विकल्प सीमित हो सकते थे और बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी प्रभावित हो सकती थी।
सरकार के इस फैसले को किसानों की बड़ी जीत माना जा रहा है। खासकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक और बिहार जैसे गन्ना उत्पादक राज्यों में इस खबर को राहत के रूप में देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने कहा है कि प्राप्त सुझावों और आपत्तियों का अध्ययन करने के बाद मसौदे को नए सिरे से तैयार किया जाएगा।
आखिर क्यों मचा था इतना विवाद?
सरकार 60 साल पुराने गन्ना (नियंत्रण) आदेश 1966 की जगह नया ढांचा लागू करना चाहती थी। इसके लिए गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026 का मसौदा तैयार किया गया था। सरकार का कहना था कि एथनॉल उत्पादन, चीनी उद्योग और गन्ना आधारित कारोबार में बड़े बदलाव आ चुके हैं, इसलिए नियमों को भी आधुनिक बनाने की जरूरत है।
लेकिन मसौदा सामने आते ही किसान संगठनों और उद्योग जगत ने कई प्रावधानों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। उनका कहना था कि नए नियमों से छोटे उद्योगों और किसानों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
किसानों को किस बात का सबसे ज्यादा डर था?
कई इलाकों में किसान अपनी फसल सिर्फ चीनी मिलों को नहीं बल्कि खांडसारी इकाइयों को भी बेचते हैं। अक्सर खांडसारी इकाइयां किसानों को बेहतर भाव और अपेक्षाकृत तेज भुगतान देती हैं।
किसानों की चिंता थी कि यदि नए नियमों से खांडसारी इकाइयों का संचालन मुश्किल होता है तो बाजार में प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी। ऐसी स्थिति में किसानों के पास गन्ना बेचने के विकल्प घट सकते हैं और उनकी मोलभाव करने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है।
यही वजह रही कि कई किसान संगठनों ने मसौदे का खुलकर विरोध किया।
खांडसारी उद्योग ने क्यों जताई आपत्ति?
सबसे बड़ा विवाद खांडसारी इकाइयों की नई परिभाषा को लेकर था। मसौदे में 10 से अधिक श्रमिकों और प्रतिदिन 500 टन से ज्यादा गन्ना पेराई क्षमता वाली इकाइयों को खांडसारी इकाई मानने का प्रस्ताव रखा गया था।
उद्योग संगठनों का कहना था कि इससे बड़ी संख्या में छोटी इकाइयां अतिरिक्त सरकारी नियंत्रण के दायरे में आ जाएंगी। लाइसेंस, अनुपालन और प्रशासनिक खर्च बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों के रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता था।
एथनॉल सेक्टर भी था चिंतित
भारत सरकार 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए तेजी से काम कर रही है। गन्ना इस रणनीति का अहम हिस्सा है। मसौदे में एथनॉल इकाइयों को भी नियामकीय ढांचे में शामिल करने का प्रस्ताव था।
उद्योग जगत का मानना था कि किसी भी बड़े बदलाव से पहले व्यापक चर्चा जरूरी है ताकि निवेश, उत्पादन और विस्तार योजनाएं प्रभावित न हों।
सरकार ने क्या कहा?
खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने कहा है कि राज्य सरकारों, किसान संगठनों और अन्य हितधारकों से मिली टिप्पणियों के आधार पर मसौदे पर पुनर्विचार किया जाएगा। सरकार ने संकेत दिए हैं कि भविष्य में संशोधित मसौदा फिर से जारी किया जा सकता है।
यूपी के किसानों के लिए क्यों अहम है फैसला?
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है। यहां लाखों किसान सीधे गन्ना खेती पर निर्भर हैं। प्रदेश में चीनी मिलों के साथ-साथ बड़ी संख्या में खांडसारी इकाइयां भी काम करती हैं।
ऐसे में नियमों में किसी भी बड़े बदलाव का असर सबसे पहले और सबसे ज्यादा यूपी के किसानों पर पड़ सकता था। यही वजह है कि इस फैसले को पश्चिमी यूपी के किसान संगठनों ने राहत भरा कदम बताया है।
अब आगे क्या होगा?
सरकार अब सभी सुझावों का अध्ययन करेगी और उसके बाद नया मसौदा तैयार किया जा सकता है। माना जा रहा है कि संशोधित प्रस्ताव में किसानों, चीनी उद्योग, खांडसारी इकाइयों और एथनॉल सेक्टर के हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश होगी।
फिलहाल इतना तय है कि केंद्र सरकार के इस फैसले ने लाखों गन्ना किसानों की बड़ी चिंता दूर कर दी है और किसानों को तत्काल राहत मिली है।
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