भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक बड़े गैस इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान युद्ध के कारण तेल और गैस सप्लाई पर बढ़ते खतरे के बीच केंद्र सरकार ओमान से भारत तक समुद्र के नीचे गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना पर विचार कर रही है। इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब ₹40,000 करोड़ बताई जा रही है।
अगर यह योजना आगे बढ़ती है तो ओमान से नेचुरल गैस सीधे गुजरात तट तक पहुंचेगी। इससे भारत की LNG इंपोर्ट पर निर्भरता कम हो सकती है और भविष्य में सप्लाई संकट से राहत मिलने की उम्मीद है।
क्यों जरूरी बन गया यह प्रोजेक्ट?
ईरान-इजरायल युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर असर पड़ने के कारण तेल और गैस सप्लाई बाधित हुई है। भारत अपनी कुल गैस जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इसका अधिकांश हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।
भारत के पास अभी क्रूड ऑयल की तरह कोई बड़ा स्ट्रैटजिक गैस रिजर्व नहीं है। ऐसे में अगर सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित होती है तो बिजली, उर्वरक, उद्योग और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर पर बड़ा दबाव पड़ सकता है।
इसी खतरे को देखते हुए सरकार अब लॉन्ग-टर्म पाइपलाइन नेटवर्क और गैस स्टोरेज बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
क्या है ओमान-भारत गैस पाइपलाइन योजना?
रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रस्तावित “मिडिल-ईस्ट इंडिया डीप वॉटर पाइपलाइन” अरब सागर के नीचे लगभग 2,000 किलोमीटर लंबी हो सकती है। यह पाइपलाइन ओमान से शुरू होकर सीधे गुजरात तट तक पहुंचेगी।
बताया जा रहा है कि यह पाइपलाइन समुद्र में लगभग 3,450 मीटर की गहराई से गुजर सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह दुनिया की सबसे गहरी अंडरसी पाइपलाइनों में शामिल हो सकती है।
सरकार इस प्रोजेक्ट के लिए गेल, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन जैसी कंपनियों से डिटेल फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करा सकती है।
एक प्राइवेट सेक्टर कंसोर्टियम “द साउथ एशिया गैस एंटरप्राइजेज” पहले ही प्री-फिजिबिलिटी स्टडी सरकार को सौंप चुका है।
भारत को कितना फायदा होगा?
इस पाइपलाइन के जरिए भारत को रोजाना करीब 31 मिलियन क्यूबिक मीटर नेचुरल गैस मिलने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की बढ़ती गैस डिमांड को पूरा करने में मदद मिलेगी।
फिलहाल भारत की रोजाना गैस खपत करीब 192 मिलियन क्यूबिक मीटर है। अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में यह बढ़कर 295 मिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकती है।
देश में सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन तेजी से बढ़ रहा है, CNG और PNG नेटवर्क विस्तार कर रहे हैं, उर्वरक उद्योग की गैस जरूरत लगातार बढ़ रही है, गैस आधारित बिजली उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है ऐसे में लॉन्ग-टर्म सप्लाई लाइन भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है।
किन देशों से मिल सकती है गैस?
इस पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए भारत को केवल ओमान ही नहीं बल्कि यूएई, सऊदी अरब, कतर, ईरान, तुर्कमेनिस्तान जैसे गैस समृद्ध देशों से भी सप्लाई मिलने की संभावना बताई जा रही है। इन देशों के पास संयुक्त रूप से करीब 2,500 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस भंडार मौजूद है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह प्रोजेक्ट सफल होता है तो भारत को स्पॉट LNG मार्केट की महंगी खरीद पर निर्भरता कम करनी पड़ सकती है।
LNG बाजार में क्यों बढ़ी चिंता?
भारत की करीब दो-तिहाई LNG सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रूट से आती है। लेकिन पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण इस रूट पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है।
इसका असर वैश्विक गैस बाजार पर भी दिखाई दे रहा है:
- ग्लोबल सप्लाई में लगभग 20% गिरावट
- LNG कीमतों में तेजी
- एशियाई बाजार में स्पॉट गैस महंगी
- भारतीय कंपनियों की इंपोर्ट लागत बढ़ी
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तनाव लंबा चला तो भारत में बिजली उत्पादन और औद्योगिक लागत भी बढ़ सकती है।
गैस स्टोरेज बढ़ाने पर भी फोकस
सरकार केवल पाइपलाइन प्रोजेक्ट पर ही नहीं बल्कि घरेलू गैस स्टोरेज क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रही है।
फिलहाल भारत के पास 22 से 24 LNG स्टोरेज टैंक, कुल 2 से 2.5 बिलियन क्यूबिक मीटर स्टोरेज क्षमता सिर्फ 10 से 12 दिन की गैस खपत जितना रिजर्व मौजूद है।
इसके मुकाबले चीन गैस स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर चुका है और उसकी क्षमता 80 बिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत अब भविष्य के ऊर्जा संकट से बचने के लिए स्ट्रैटजिक गैस रिजर्व, अतिरिक्त LNG टर्मिनल, अंडरग्राउंड स्टोरेज, लॉन्ग-टर्म पाइपलाइन जैसे विकल्पों पर तेजी से काम कर रहा है।
भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए कितना अहम?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट केवल गैस सप्लाई तक सीमित नहीं है। यह भारत की लंबी अवधि की एनर्जी सिक्योरिटी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
अगर भारत को खाड़ी देशों से सीधे पाइपलाइन के जरिए स्थिर गैस सप्लाई मिलती है तो:
- LNG इंपोर्ट लागत घट सकती है
- स्पॉट मार्केट पर निर्भरता कम होगी
- उद्योगों को स्थिर कीमतें मिल सकती हैं
- उर्वरक और बिजली क्षेत्र को राहत मिल सकती है
- ऊर्जा संकट के समय सप्लाई सुरक्षा बढ़ेगी
हालांकि इतनी गहराई में पाइपलाइन निर्माण तकनीकी और वित्तीय रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। इसलिए इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में पांच से सात साल लग सकते हैं।
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