कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सोमवार को केंद्र सरकार की विदेश नीति पर कड़ा हमला बोला, यह कहते हुए कि हाल के घटनाक्रमों ने पाकिस्तान को फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता (renewed global acceptance) दिला दी है — जो उनकी मानें तो भारत की कूटनीतिक विफलता का परिणाम है।
पाकिस्तान की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता — कांग्रेस की चिंता
जयराम रमेश ने कहा कि पाकिस्तान, जो कई दशकों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग‑थलग रहा है, अब नई कूटनीतिक स्थिति में है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार की विदेश नीति और रणनीति ने पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर फिर से स्वीकार्यता और सम्मान पाने में मदद की है — और यह भारत की वैश्विक छवि और सुरक्षा हितों के लिए खतरा बन सकता है।
उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में, जहां भारत बड़े वैश्विक नेताओं तथा शक्तियों के बीच कूटनीतिक संबंधों का दावा करता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के स्वीकार्य बनने से यह संकेत मिलता है कि भारत की रणनीति में गंभीर दोष हैं।
क्या कहा जयराम रमेश ने?
जयराम रमेश ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान अब ऐसे दौर में पहुंच गया है जहाँ उसे वैश्विक मंच पर “नई स्वीकृति” मिल रही है — यह वह स्थिति है जिसमें पहले पाकिस्तान लंबे समय तक अलग‑थलग रहा करता था। उन्होंने कहा कि यह बदलाव मोदी सरकार की विदेश नीति की बड़ी विफलता को दर्शाता है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अब दूसरे देशों द्वारा समर्थन या भूमिका प्राप्त होती दिख रही है, जबकि भारत की कूटनीति अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पाई।
उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और अन्य प्रमुख वैश्विक शक्तियों के प्रधानमंत्रियों के समय, पाकिस्तान को अलग‑थलग रखा गया था — जैसे 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय अलगाव। लेकिन अब वर्तमान स्थिति ने उस अलगाव को बदल दिया है, जो जयराम रमेश के अनुसार भारत के कूटनीतिक प्रयासों की विफलता का संकेत है।
मोदी सरकार की विदेश नीति पर विपक्षी सवाल
जयराम रमेश की आलोचना broader विपक्षी चिंताओं के साथ मेल खाती है कि वर्तमान विदेश नीति में व्यक्तित्व‑आधारित प्राथमिकताएँ और “ब्रोकर देश” संवेदनाएँ बढ़ रही हैं। इसी क्रम में कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता पहले भी प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को “व्यक्तिगत और कम प्रभावी” बताते हुए आलोचना कर चुके हैं।
ये आरोप पश्चिम एशियाई संकट और वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की भूमिका को लेकर उभरते राजनीतिक तनाव के बीच आए हैं। विपक्ष का कहना है कि विदेश नीति के मुद्दों का खुलकर बहस होना चाहिए ताकि राष्ट्रीय हितों की रक्षा और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा मजबूत रहे।
सरकार की स्थिति और जवाब
हालाँकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि भारत स्वतंत्र, संतुलित और प्रभावी कूटनीति का पालन कर रहा है, तथा देश के हितों और सुरक्षात्मक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर विदेश नीति तैयार की जा रही है। सरकार ने यह भी बताया है कि भारत पश्चिम एशिया समेत विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विदेश नीति को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है और आवश्यक कदम उठा रहा है।
भारत की विदेश नीति का उद्देश्य हमेशा से राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना रहा है, और सरकार का कहना है कि इस दिशा में निरंतर प्रयास जारी हैं।
कूटनीति और भविष्य की चुनौतियाँ
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए विदेशी नीति पर राजनीतिक बहस, आलोचना और समीक्षा होना सामान्य है। कूटनीति के फैसले अक्सर अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और घरेलू परिस्थितियों पर आधारित होते हैं, और जब कोई पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान किसी वैश्विक भूमिका में दिखता है, तो उस पर प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है।
विदेश नीति पर बहस का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इससे रणनीति की समीक्षा, नए दृष्टिकोण और बेहतर परिणाम की दिशा में बदलाव संभव होता है।
निष्कर्ष
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर कड़ी टिप्पणियाँ की हैं, यह कहते हुए कि हाल के कूटनीतिक बदलावों ने पाकिस्तान को वैश्विक स्वीकार्यता दिलाई है — और यह भारत की विदेश नीति की कमजोरी को दर्शाता है। इसमें विपक्ष और सरकार के बीच एक व्यापक राजनीतिक बहस उभर रही है, जो राष्ट्रीय हित और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा को लेकर महत्वपूर्ण है।
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Author: Namam Sharma
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Namam Sharma NewsJagran में बिज़नेस और फाइनेंस खबरों को कवर करते हैं।
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