नई दिल्ली। अनिल अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (Reliance Infrastructure) एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह कोई नया प्रोजेक्ट या वित्तीय परिणाम नहीं, बल्कि कंपनी के शेयरों पर लागू ट्रेडिंग प्रतिबंध हैं। कंपनी ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE), बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और बाजार नियामक SEBI से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि उसके शेयरों पर लागू मौजूदा प्रतिबंधों की समीक्षा की जाए।
कंपनी का दावा है कि इन प्रतिबंधों की वजह से 7 लाख से अधिक खुदरा और छोटे निवेशकों के हित प्रभावित हो रहे हैं। रिलायंस इंफ्रा का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था के कारण शेयर का वास्तविक बाजार मूल्य सामने नहीं आ पा रहा है और निवेशकों के लिए अपने निवेश का उचित प्रबंधन करना मुश्किल हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के शेयर फिलहाल विशेष निगरानी व्यवस्था के तहत सीमित ट्रेडिंग नियमों के दायरे में हैं। कंपनी के अनुसार मौजूदा नियमों के तहत उसके शेयरों में सप्ताह में केवल एक बार ट्रेडिंग की अनुमति है और कीमत में अधिकतम 5 प्रतिशत की ही बढ़त या गिरावट संभव है।
कंपनी का तर्क है कि यह व्यवस्था असामान्य परिस्थितियों में निवेशकों की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी, लेकिन अब इसके नकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगे हैं। कंपनी का कहना है कि इस तरह के प्रतिबंधों के कारण शेयर की कीमत बाजार की वास्तविक मांग और आपूर्ति के आधार पर तय नहीं हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शेयर का मूल्यांकन तभी सही तरीके से हो सकता है जब उसमें पर्याप्त ट्रेडिंग वॉल्यूम और निवेशकों की सक्रिय भागीदारी हो। यदि खरीद-बिक्री सीमित हो जाए तो कीमतों का स्वाभाविक निर्धारण प्रभावित हो सकता है।
कंपनी ने निवेशकों का मुद्दा क्यों उठाया?
रिलायंस इंफ्रा ने अपने ज्ञापन में सबसे अधिक जोर खुदरा निवेशकों के हितों पर दिया है। कंपनी के अनुसार उसके 7 लाख से अधिक सार्वजनिक शेयरधारक हैं, जिनमें बड़ी संख्या छोटे निवेशकों की है।
कंपनी का कहना है कि जब शेयर लगातार लोअर सर्किट या सीमित दायरे में फंस जाता है तो निवेशकों के लिए समय पर अपने शेयर बेचना मुश्किल हो जाता है। कई बार निवेशक अपनी जरूरत के समय शेयर बेचने में सक्षम नहीं होते, क्योंकि ट्रेडिंग अवसर बहुत सीमित होते हैं।
रिलायंस इंफ्रा का तर्क है कि यदि किसी शेयर में पर्याप्त तरलता (Liquidity) नहीं होगी तो उसका उचित मूल्य निर्धारित नहीं हो पाएगा। इससे बाजार की पारदर्शिता और दक्षता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
ASM Framework क्या होता है?
कंपनी ने अपने आवेदन में अतिरिक्त निगरानी उपाय (Additional Surveillance Measure – ASM) ढांचे का भी उल्लेख किया है। ASM का उपयोग एक्सचेंज उन शेयरों पर करते हैं जिनमें असामान्य मूल्य उतार-चढ़ाव या अत्यधिक सट्टेबाजी की आशंका होती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य निवेशकों को जोखिम के प्रति सतर्क करना और अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना होता है। हालांकि, कंपनियां कई बार यह तर्क देती हैं कि लंबे समय तक ऐसे प्रतिबंध बने रहने से शेयर की सामान्य ट्रेडिंग प्रभावित होती है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि ASM जैसी व्यवस्थाएं निवेशक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समय-समय पर उनकी समीक्षा भी जरूरी होती है ताकि किसी कंपनी के शेयर में अनावश्यक बाधाएं न बनी रहें।
NCLAT के फैसले का भी दिया हवाला
रिलायंस इंफ्रा ने अपने आवेदन में राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के फैसले का भी उल्लेख किया है। कंपनी का कहना है कि NCLAT द्वारा कंपनी के खिलाफ दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) पर रोक लगाए जाने के बावजूद शेयरों पर प्रतिबंध जारी हैं।
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके संचालन का नियंत्रण अभी भी निदेशक मंडल के पास है और किसी समाधान पेशेवर (Resolution Professional) ने कंपनी का प्रबंधन अपने हाथ में नहीं लिया है। इसलिए कंपनी का मानना है कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए प्रतिबंधों की समीक्षा की जानी चाहिए।
हाल में कैसा रहा शेयर का प्रदर्शन?
दिलचस्प बात यह है कि प्रतिबंधों के बावजूद रिलायंस इंफ्रा के शेयरों में हाल के दिनों में तेजी देखने को मिली है। NSE के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले सप्ताह कंपनी का शेयर 21 प्रतिशत से अधिक उछला। शुक्रवार के कारोबार में भी शेयर में अपर सर्किट लगा।
हालांकि शेयर अभी भी अपने 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर 423.40 रुपये से काफी नीचे कारोबार कर रहा है। मौजूदा स्तरों पर कंपनी का बाजार पूंजीकरण लगभग 3,340 करोड़ रुपये के आसपास है।
यह स्थिति बताती है कि निवेशकों के बीच कंपनी को लेकर रुचि बनी हुई है, लेकिन सीमित ट्रेडिंग व्यवस्था के कारण सामान्य मूल्य खोज (Price Discovery) की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
यदि एक्सचेंज और SEBI कंपनी की मांग पर विचार करते हैं और प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो शेयर में सामान्य ट्रेडिंग गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इससे तरलता में सुधार हो सकता है और निवेशकों को खरीद-बिक्री के अधिक अवसर मिल सकते हैं।
हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी नियामकीय निर्णय का आधार निवेशक सुरक्षा, बाजार की स्थिरता और नियमों का पालन होता है। इसलिए केवल कंपनी की मांग के आधार पर प्रतिबंध हटना तय नहीं माना जा सकता।
निवेशकों को कंपनी से जुड़े किसी भी निर्णय पर नजर रखनी चाहिए और केवल खबरों के आधार पर निवेश निर्णय लेने से बचना चाहिए।
आगे क्या होगा?
अब बाजार की नजर NSE, BSE और SEBI की प्रतिक्रिया पर रहेगी। यदि नियामक संस्थाएं कंपनी की दलीलों को उचित मानती हैं तो ट्रेडिंग नियमों में बदलाव संभव है। दूसरी ओर यदि मौजूदा जोखिमों को देखते हुए प्रतिबंध जारी रखे जाते हैं तो शेयर पर वर्तमान व्यवस्था लागू रह सकती है।
फिलहाल यह मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाता है कि निवेशक सुरक्षा और बाजार की तरलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले दिनों में इस पर होने वाला निर्णय रिलायंस इंफ्रा के लाखों निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।


