नई दिल्ली: सोना लंबे समय से निवेशकों के लिए सुरक्षित निवेश (Safe Haven Asset) माना जाता रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, युद्ध, महंगाई और वित्तीय संकट के दौर में निवेशक अक्सर सोने का रुख करते हैं। लेकिन साल 2026 में तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें अपने उच्चतम स्तर से करीब 25 फीसदी तक फिसल चुकी हैं। यदि यह गिरावट जारी रहती है तो वर्ष 2013 के बाद यह सोने का सबसे कमजोर सालाना प्रदर्शन साबित हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोरी के बावजूद भारतीय बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में मजबूती देखने को मिल रही है। एमसीएक्स और सर्राफा बाजार दोनों में तेजी दर्ज की गई है। ऐसे में निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह गिरावट आगे भी जारी रहेगी या फिर यह लंबी अवधि के निवेशकों के लिए खरीदारी का अवसर है।
क्यों दबाव में है सोना?
साल की शुरुआत में वैश्विक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण सोने की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था। निवेशकों ने जोखिम वाले एसेट्स से पैसा निकालकर सोने में निवेश बढ़ाया था। हालांकि हाल के हफ्तों में हालात बदलने लगे हैं।
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और युद्धविराम की उम्मीदों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। इसी के साथ कच्चे तेल की कीमतों में भी नरमी आई है। पहले जहां ब्रेंट क्रूड 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, वहीं अब यह 100 डॉलर से नीचे कारोबार कर रहा है।
तेल की कीमतों में नरमी का सीधा असर महंगाई की उम्मीदों पर पड़ता है। जब निवेशकों को लगता है कि महंगाई नियंत्रित रहेगी तो वे सोने की बजाय बॉन्ड, इक्विटी और अन्य ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं।
ब्याज दरों ने बढ़ाया दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि सोने में गिरावट का सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर ऊंची ब्याज दरें हैं। यूरोपीय सेंट्रल बैंक सहित कई केंद्रीय बैंक महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सख्त मौद्रिक नीति अपना रहे हैं।
जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो सरकारी बॉन्ड और फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट्स अधिक आकर्षक हो जाते हैं। दूसरी ओर सोना कोई ब्याज या डिविडेंड नहीं देता। ऐसे में निवेशकों के लिए सोना रखने की अवसर लागत (Opportunity Cost) बढ़ जाती है।
यही वजह है कि पिछले कुछ महीनों में बड़े संस्थागत निवेशकों ने सोने में अपनी हिस्सेदारी घटाई है और दूसरे एसेट क्लास में निवेश बढ़ाया है।
क्या प्रॉफिट बुकिंग भी है गिरावट की वजह?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वैश्विक परिस्थितियां ही नहीं बल्कि निवेशकों की प्रॉफिट बुकिंग भी सोने पर दबाव का बड़ा कारण बनी है।
पिछले वर्ष सोने ने शानदार रिटर्न दिया था और कई निवेशकों ने रिकॉर्ड मुनाफा कमाया था। ऐसे में इस साल बड़ी संख्या में निवेशकों ने अपने मुनाफे को सुरक्षित करने के लिए बिकवाली की।
जब किसी एसेट में लगातार कई महीनों तक तेजी आती है तो उसके बाद प्रॉफिट बुकिंग सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है। वर्तमान गिरावट को भी काफी हद तक इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
भारतीय निवेशकों पर कितना असर?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट के बावजूद भारतीय निवेशकों को अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ है। इसकी मुख्य वजह रुपये की कमजोरी है।
जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है तो आयातित सोने की कीमत पर उसका प्रभाव पड़ता है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का पूरा फायदा घरेलू बाजार तक नहीं पहुंच पाता।
विशेषज्ञों का कहना है कि यही वजह है कि भारत में सोने की कीमतें वैश्विक कीमतों की तुलना में अधिक स्थिर बनी हुई हैं। इसके अलावा शादी-ब्याह और त्योहारों के सीजन से पहले ज्वेलरी डिमांड भी कीमतों को सहारा दे सकती है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
टाटा म्यूचुअल फंड का मानना है कि निकट भविष्य में सोने की कीमतें एक सीमित दायरे में रह सकती हैं। शॉर्ट टर्म में 5 फीसदी तक का उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है, लेकिन लंबी अवधि का दृष्टिकोण अभी भी सकारात्मक बना हुआ है।
फंड हाउस के अनुसार, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, भू-राजनीतिक जोखिम, बढ़ता सरकारी कर्ज और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे कई कारक अभी भी सोने को समर्थन दे सकते हैं।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेशकों को गिरावट के दौरान घबराकर अपनी पूरी होल्डिंग नहीं बेचनी चाहिए। यदि पोर्टफोलियो में सोने का हिस्सा बहुत अधिक हो गया है तो सीमित रीबैलेंसिंग की जा सकती है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह समय धैर्य रखने का है।
एक्सपर्ट्स की क्या राय है?
एनरिच मनी के सीईओ आर पोनमुडी का कहना है कि निवेशकों को सोने से पूरी तरह बाहर निकलने की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार, 2025 की तेज रैली के बाद कुछ प्रॉफिट बुकिंग स्वाभाविक थी और हालिया करेक्शन ने बाजार में मौजूद अतिरिक्त सट्टेबाजी को काफी हद तक समाप्त कर दिया है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान स्तरों पर सोने का मूल्यांकन पहले की तुलना में अधिक संतुलित दिखाई देता है। इसलिए लंबी अवधि के निवेशक चरणबद्ध तरीके से निवेश जारी रख सकते हैं।
क्या यह खरीदारी का मौका है?
इतिहास बताता है कि सोने में बड़ी गिरावट के बाद अक्सर लंबी अवधि के निवेशकों को अच्छे अवसर मिले हैं। हालांकि किसी भी निवेश का फैसला केवल कीमतों की गिरावट के आधार पर नहीं करना चाहिए।
यदि आपका निवेश लक्ष्य 5 से 10 साल का है और आप पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखना चाहते हैं तो मौजूदा गिरावट को चरणबद्ध खरीदारी के अवसर के रूप में देखा जा सकता है। वहीं अल्पकालिक निवेशकों को बाजार में बढ़ती अस्थिरता को ध्यान में रखते हुए सावधानी बरतनी चाहिए।
निष्कर्ष
सोने की कीमतों में आई हालिया गिरावट ने निवेशकों को चिंता में जरूर डाला है, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इसे लंबी अवधि के लिए नकारात्मक संकेत नहीं मान रहे हैं। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, केंद्रीय बैंकों की नीतियां और भू-राजनीतिक घटनाक्रम आने वाले महीनों में सोने की दिशा तय करेंगे।
ऐसे में घबराकर निवेश से बाहर निकलने की बजाय अपने वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम क्षमता के अनुसार रणनीति बनाना ज्यादा समझदारी होगी। लंबी अवधि के निवेशकों के लिए सोना अभी भी पोर्टफोलियो का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रह सकता है।


