प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। वह लगातार सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए हैं। इस उपलब्धि के साथ उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। यह केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि आजादी के बाद भारत की आर्थिक यात्रा को समझने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है।
नेहरू और मोदी दोनों अलग-अलग दौर के नेता रहे हैं। नेहरू ने नवस्वतंत्र भारत की नींव रखी, जबकि मोदी ऐसे भारत का नेतृत्व कर रहे हैं जो दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि दोनों दौरों के बीच भारत आर्थिक रूप से कितना बदल चुका है।
GDP से लेकर वैश्विक प्रभाव तक, भारत की लंबी आर्थिक यात्रा
आजादी के समय भारत मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था था। औद्योगिक उत्पादन सीमित था, विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम था और देश की बड़ी आबादी गरीबी में जीवन गुजार रही थी। आर्थिक इतिहासकारों के अनुसार 1947 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 2.7 लाख करोड़ रुपये के बराबर माना जाता है।
इसके मुकाबले 2026 में भारत की अनुमानित GDP करीब 357 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। यह वृद्धि केवल मुद्रास्फीति का परिणाम नहीं है बल्कि उद्योग, सेवाओं, प्रौद्योगिकी, निर्यात और घरेलू खपत के विस्तार की कहानी भी है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की वर्तमान स्थिति कई दशकों में हुए आर्थिक सुधारों, उदारीकरण और वैश्विक निवेश के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। 1991 के आर्थिक सुधारों से लेकर डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार तक कई महत्वपूर्ण कदमों ने देश की विकास यात्रा को गति दी है।
‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ से दुनिया की सबसे तेज बड़ी अर्थव्यवस्था तक
1950 से 1980 के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि औसतन 3.5 से 4 प्रतिशत के आसपास रही। अर्थशास्त्रियों ने इस धीमी वृद्धि को बाद में “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” नाम दिया। उस समय भारत आयात प्रतिस्थापन, सरकारी नियंत्रण और सीमित निजी निवेश वाली आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर था।
हालांकि उस दौर में देश ने भारी उद्योगों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और वैज्ञानिक संस्थानों की मजबूत नींव भी रखी। यही आधार आगे चलकर तेज आर्थिक विकास का कारण बना।
वर्तमान समय में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य वैश्विक संस्थानों के अनुसार भारत की GDP वृद्धि दर आने वाले वर्षों में भी 6.5 से 7 प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना है। अमेरिका, यूरोप और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में यह काफी मजबूत प्रदर्शन माना जाता है।
शिक्षा और मानव संसाधन में बड़ा विस्तार
नेहरू सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) जैसे संस्थानों की स्थापना शामिल रही। इन संस्थानों ने भारत को वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा नेटवर्क का विस्तार तेजी से हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 के बाद IIT की संख्या 16 से बढ़कर 23 हो गई है। इसी अवधि में IIM की संख्या 13 से बढ़कर 21 और AIIMS की संख्या 7 से बढ़कर 23 तक पहुंच गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, लेकिन इससे देश के अधिक छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा तक पहुंच जरूर मिली है।
बुनियादी ढांचे में आया बड़ा बदलाव
नेहरू काल में भाखड़ा नंगल जैसे बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने और बड़े औद्योगिक परियोजनाएं विकास का प्रतीक थीं। उस दौर में इन्हें आधुनिक भारत के “मंदिर” कहा गया था।
आज विकास का फोकस एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, मेट्रो नेटवर्क, हाई-स्पीड इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर पर दिखाई देता है। भारत का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क, रेलवे विद्युतीकरण और हवाई संपर्क पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है।
डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के बाद UPI जैसी प्रणालियों ने भारत को डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल कर दिया है।
वैश्विक मंच पर बढ़ा भारत का प्रभाव
नेहरू गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और उन्होंने स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की दिशा तय की। उस समय भारत की वैश्विक भूमिका सीमित संसाधनों के बावजूद महत्वपूर्ण मानी जाती थी।
आज भारत G20, BRICS, Quad और कई वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक 19 विदेशी संसदों या विधानसभाओं को संबोधित कर चुके हैं, जबकि नेहरू ने अपने कार्यकाल में तीन विदेशी संसदों को संबोधित किया था।
विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत, रणनीतिक महत्व और वैश्विक निवेश आकर्षित करने की क्षमता को दर्शाता है।
प्रति व्यक्ति आय और जीवन स्तर में सुधार
आर्थिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना केवल GDP नहीं बल्कि लोगों का जीवन स्तर होता है। आजादी के समय भारत की प्रति व्यक्ति आय बेहद कम थी और बड़ी आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित थी।
आज बिजली, बैंकिंग, मोबाइल इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच पहले की तुलना में कहीं अधिक है। हालांकि गरीबी, रोजगार और आय असमानता जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं, लेकिन लंबे समय के आंकड़े जीवन स्तर में महत्वपूर्ण सुधार दिखाते हैं।
क्या केवल एक सरकार को श्रेय देना सही होगा?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति किसी एक सरकार या एक नेता का परिणाम नहीं है। नेहरू काल में स्थापित संस्थानों, बाद के दशकों में हुए आर्थिक सुधारों, उदारीकरण और हाल के डिजिटल एवं बुनियादी ढांचा निवेशों ने मिलकर भारत की विकास यात्रा को आकार दिया है।
इसलिए मोदी और नेहरू की तुलना को राजनीतिक नजरिये से देखने के बजाय भारत की लंबी आर्थिक यात्रा के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ना एक ऐतिहासिक राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, बुनियादी ढांचा और वैश्विक प्रभाव किस तरह बदला है। आज का भारत उस भारत से बिल्कुल अलग है जो 1947 में आजाद हुआ था। फिर भी यह परिवर्तन कई पीढ़ियों, अनेक सरकारों और दशकों की नीतियों का संयुक्त परिणाम है। यही भारत की विकास गाथा की सबसे बड़ी विशेषता है।


