सोने की तरह चांदी के गहनों पर हॉलमार्किंग अनिवार्य क्यों नहीं हो पा रही है? BIS ने बाजार की जटिलता, कर्मचारियों की कमी और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चुनौतियों का खुलासा किया है। जानिए खरीदारों पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
चांदी की हॉलमार्किंग को अनिवार्य बनाने में क्या हैं सबसे बड़ी चुनौतियां?
नई दिल्ली। भारत में सोने के आभूषणों पर हॉलमार्किंग अब एक स्थापित व्यवस्था बन चुकी है, लेकिन चांदी के गहनों और कलाकृतियों के मामले में स्थिति अभी अलग है। केंद्र सरकार और ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) लंबे समय से चांदी के उत्पादों पर भी अनिवार्य हॉलमार्किंग लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं। हालांकि, बाजार की जटिल संरचना, सीमित परीक्षण केंद्रों और संसाधनों की कमी जैसी कई चुनौतियों के कारण यह प्रक्रिया अपेक्षा से धीमी गति से आगे बढ़ रही है।
हाल ही में BIS के महानिदेशक संजय गर्ग ने स्वीकार किया कि चांदी के बाजार की प्रकृति सोने की तुलना में कहीं अधिक जटिल है। यही वजह है कि सरकार किसी जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय पूरे सिस्टम की तैयारी का आकलन कर रही है।
चांदी का बाजार सोने से क्यों अलग है?
सोने के आभूषणों का कारोबार अपेक्षाकृत संगठित माना जाता है। बड़े ज्वेलर्स, निर्धारित कैरेट मानक और व्यापक हॉलमार्किंग नेटवर्क के कारण इस क्षेत्र को रेगुलेट करना आसान रहा है। इसके विपरीत चांदी का बाजार काफी बिखरा हुआ है।
देशभर में लाखों छोटे दुकानदार, स्थानीय कारीगर और पारंपरिक बाजार चांदी के आभूषणों और कलाकृतियों की बिक्री करते हैं। इसके अलावा चांदी के बर्तन, धार्मिक वस्तुएं, सजावटी उत्पाद और यहां तक कि चांदी का फर्नीचर भी बाजार का हिस्सा हैं। इतनी विविधता के कारण एक समान हॉलमार्किंग व्यवस्था लागू करना चुनौतीपूर्ण बन जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिना पर्याप्त तैयारी के हॉलमार्किंग अनिवार्य कर दी जाती है तो छोटे व्यापारियों और कारीगरों पर अतिरिक्त लागत का बोझ पड़ सकता है।
HUID नंबर क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
सितंबर 2025 से चांदी की वस्तुओं पर HUID (Hallmark Unique Identification) नंबर लागू किया गया है। यह एक यूनिक कोड होता है, जिसकी मदद से ग्राहक किसी भी हॉलमार्क किए गए उत्पाद की जानकारी सत्यापित कर सकते हैं।
BIS Care App के जरिए ग्राहक यह जांच सकते हैं कि उत्पाद वास्तव में प्रमाणित है या नहीं। इससे नकली या कम शुद्धता वाले उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने में मदद मिलती है।
उपभोक्ता संगठनों का मानना है कि HUID व्यवस्था चांदी के बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, जब तक इसे व्यापक स्तर पर लागू नहीं किया जाता, तब तक इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा।
हालमार्किंग सेंटरों की कमी भी बड़ी बाधा
BIS के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में चांदी की वस्तुओं के परीक्षण और हॉलमार्किंग के लिए लगभग 230 मान्यता प्राप्त केंद्र कार्यरत थे। हालांकि भारत जैसे विशाल देश के लिए यह संख्या अभी भी सीमित मानी जाती है।
ग्रामीण और छोटे शहरों में ज्वेलर्स को अक्सर हॉलमार्किंग केंद्रों तक पहुंचने में कठिनाई होती है। यदि सरकार भविष्य में चांदी की हॉलमार्किंग को अनिवार्य बनाती है, तो हजारों नए व्यापारियों को इस व्यवस्था से जोड़ना होगा। इसके लिए परीक्षण केंद्रों की संख्या बढ़ाना आवश्यक माना जा रहा है।
BIS में कर्मचारियों की कमी क्यों चिंता का विषय है?
संजय गर्ग के अनुसार, BIS में हॉलमार्किंग से संबंधित पूरे काम की निगरानी करने वाली टीम बेहद छोटी है। उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था को संचालित करने में केवल कुछ स्थायी अधिकारी हैं, जबकि अधिकांश कार्य आउटसोर्सिंग और निजी एजेंसियों के सहयोग से किया जाता है।
किसी भी अनिवार्य व्यवस्था को सफल बनाने के लिए निगरानी, निरीक्षण और शिकायत निवारण तंत्र मजबूत होना जरूरी होता है। यदि कर्मचारियों की संख्या पर्याप्त नहीं होगी तो नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन मुश्किल हो सकता है।
यही कारण है कि BIS पहले बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक क्षमता को मजबूत करना चाहता है।
चांदी की हॉलमार्किंग में कितनी प्रगति हुई है?
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि स्वैच्छिक व्यवस्था के बावजूद चांदी की हॉलमार्किंग में लगातार वृद्धि हुई है।
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान लाखों चांदी की वस्तुओं की हॉलमार्किंग की गई। इससे संकेत मिलता है कि ज्वेलर्स और उपभोक्ता दोनों इस व्यवस्था को स्वीकार कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रुझान जारी रहता है तो आने वाले वर्षों में सरकार चरणबद्ध तरीके से चांदी की हॉलमार्किंग को भी अनिवार्य बना सकती है।
गोल्ड हॉलमार्किंग मॉडल से क्या सीख मिलती है?
भारत में वर्ष 2021 से गोल्ड हॉलमार्किंग को अनिवार्य किया गया था। शुरुआत में इसे चुनिंदा जिलों में लागू किया गया और बाद में इसका दायरा लगातार बढ़ाया गया।
अब देश के 380 जिलों में गोल्ड हॉलमार्किंग अनिवार्य है और 60 करोड़ से अधिक सोने के आभूषणों पर हॉलमार्किंग की जा चुकी है। यह दिखाता है कि सही तैयारी और चरणबद्ध क्रियान्वयन के जरिए बड़े बदलाव सफलतापूर्वक लागू किए जा सकते हैं।
इसी मॉडल को चांदी के क्षेत्र में भी अपनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए बाजार की संरचना को ध्यान में रखते हुए अलग रणनीति बनानी होगी।
खरीदारों के लिए इसका क्या मतलब है?
जब तक चांदी की हॉलमार्किंग पूरी तरह अनिवार्य नहीं होती, तब तक ग्राहकों को खरीदारी के समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि उपभोक्ता हॉलमार्क किए गए उत्पादों को प्राथमिकता दें और जहां संभव हो HUID नंबर की जांच अवश्य करें।
हॉलमार्किंग से न केवल शुद्धता की पुष्टि होती है, बल्कि भविष्य में पुनर्विक्रय के समय भी बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
निष्कर्ष
चांदी के गहनों और कलाकृतियों पर अनिवार्य हॉलमार्किंग लागू करने का लक्ष्य उपभोक्ताओं के हित में है, लेकिन इसके सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां मौजूद हैं। BIS के अनुसार बाजार की जटिलता, सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर, परीक्षण केंद्रों की संख्या और कर्मचारियों की कमी जैसे मुद्दों का समाधान जरूरी है। यही वजह है कि सरकार जल्दबाजी के बजाय चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। यदि तैयारी पूरी होती है, तो आने वाले वर्षों में चांदी का बाजार भी सोने की तरह अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बन सकता है।


