Justice B V Nagarathna ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर एक महत्वपूर्ण चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अगर चुनाव कराने वाली संस्था ही चुनाव लड़ने वालों पर निर्भर हो जाए, तो निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल
अपने संबोधन में Justice B V Nagarathna ने कहा:
- Election Commission of India लोकतंत्र का एक अहम स्तंभ है
- यह संस्था चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने की जिम्मेदार है
- लेकिन यदि इसकी संरचनात्मक स्वतंत्रता कमजोर होती है, तो पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है
“निर्भरता से खत्म हो सकती है निष्पक्षता”
उन्होंने स्पष्ट कहा:
- अगर चुनाव कराने वाले ही उम्मीदवारों या सरकार पर निर्भर हों
- तो चुनाव की निष्पक्षता पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है
यह टिप्पणी चुनावी संस्थाओं की स्वतंत्रता पर एक बड़ा संकेत मानी जा रही है।
चुनाव सिर्फ प्रक्रिया नहीं, लोकतंत्र की नींव
Justice B V Nagarathna के अनुसार:
- चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली प्रक्रिया नहीं हैं
- बल्कि यही वह माध्यम हैं, जिससे राजनीतिक सत्ता का गठन होता है
- इसलिए चुनावी प्रक्रिया पर नियंत्रण, असल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पर नियंत्रण है
“संवैधानिक ढांचे का कमजोर होना खतरनाक”
उन्होंने चेतावनी दी कि:
- लोकतंत्र का पतन अचानक नहीं होता
- यह तब होता है जब संस्थाएं एक-दूसरे को संतुलित करना बंद कर देती हैं
उन्होंने कहा:
- चुनाव होते रह सकते हैं
- अदालतें काम करती रह सकती हैं
- संसद कानून बनाती रह सकती है
लेकिन फिर भी:
- अगर संस्थागत संतुलन खत्म हो जाए
- तो असली नियंत्रण खत्म हो जाता है
‘चौथे स्तंभ’ जैसी संस्थाओं का महत्व
उन्होंने उन संस्थाओं की ओर भी ध्यान दिलाया जो:
- पारंपरिक तीन स्तंभ (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) में सीधे नहीं आतीं
- लेकिन लोकतंत्र को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं
जैसे:
- चुनाव आयोग
- वित्तीय और नियामक संस्थाएं
केंद्र-राज्य संबंधों पर भी टिप्पणी
Justice B V Nagarathna ने कहा:
- राज्यों को “subordinate” नहीं, बल्कि “coordinate” माना जाना चाहिए
- सत्ता का संतुलन बराबरी के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए
उन्होंने यह भी कहा कि:
- शासन इस पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि केंद्र और राज्य में कौन सी पार्टी है
निष्कर्ष
Justice B V Nagarathna की यह टिप्पणी लोकतंत्र की मूल संरचना पर एक गंभीर विचार प्रस्तुत करती है।
यह साफ संकेत देती है कि चुनावों की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए संस्थाओं की स्वतंत्रता और संतुलन बेहद जरूरी है।
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