Crude Crisis: होर्मुज बंद, फिर भी नहीं फूटा तेल बम; अमेरिका के रिकॉर्ड एक्सपोर्ट और चीन की चाल ने बदल दिया पूरा खेल
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में चल रही जंग के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य तीन महीने से अधिक समय से बंद है। इसे आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा तेल संकट माना जा रहा है क्योंकि दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। दशकों से ऊर्जा विशेषज्ञ चेतावनी देते रहे हैं कि यदि कभी होर्मुज स्ट्रेट बंद हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू लेंगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगेगा।
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद भी कुछ ऐसा ही अनुमान लगाया गया था। कई एनालिस्ट्स ने कहा था कि ब्रेंट क्रूड 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट रही। शुरुआती उछाल के बाद तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे बनी हुई हैं। शुक्रवार को तो ब्रेंट क्रूड गिरकर 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया।
सवाल यह है कि जब दुनिया की सबसे अहम तेल आपूर्ति लाइन बंद है तो फिर तेल बाजार में घबराहट क्यों नहीं दिख रही? इसके पीछे अमेरिका, चीन, वैकल्पिक सप्लाई रूट्स और कथित गुप्त तेल प्रवाह की बड़ी भूमिका बताई जा रही है।
होर्मुज बंद होने से कितना बड़ा नुकसान हुआ?

28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से अनुमानित तौर पर करीब एक अरब बैरल कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। युद्ध से पहले पश्चिम एशिया से प्रतिदिन लगभग 15 मिलियन बैरल तेल वैश्विक बाजार तक पहुंचता था।
विशेषज्ञों का मानना था कि इतनी बड़ी सप्लाई रुकने पर बाजार में भारी कमी पैदा होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि दुनिया के कई देशों ने पहले से बड़े रणनीतिक भंडार तैयार कर रखे थे। अमेरिका, चीन और कुछ अन्य देशों ने जरूरत पड़ने पर इन भंडारों से तेल जारी किया, जिससे सप्लाई शॉक का असर सीमित रहा।
ऊर्जा बाजार में यह पहली बार नहीं है जब रणनीतिक भंडारों ने संकट को टालने में भूमिका निभाई हो। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी कई देशों ने इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था।
गुप्त सप्लाई ने संकट को कितना कम किया?
सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के बावजूद बड़ी मात्रा में तेल बाहर निकलता रहा। इसके लिए कथित तौर पर ऐसे टैंकरों का इस्तेमाल किया गया जो अपने ट्रांसपोंडर बंद करके निगरानी से बचते हुए यात्रा कर रहे थे।
जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि मई के अंतिम दो सप्ताह में इस तरह का गुप्त प्रवाह करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा। इसका मतलब यह है कि आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई न देने के बावजूद बड़ी मात्रा में तेल बाजार तक पहुंचता रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मात्रा पूरी कमी की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं थी, लेकिन इससे बाजार में घबराहट और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिली।
पाइपलाइन ने बचाया बड़ा संकट

तेल कंपनियों ने सिर्फ समुद्री रास्तों पर निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक मार्गों का भी इस्तेमाल किया। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
यह पाइपलाइन सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों को लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह से जोड़ती है। इसकी मदद से तेल को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजारे बिना अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार प्रतिदिन लगभग 4.5 मिलियन बैरल तेल वैकल्पिक मार्गों से फारस की खाड़ी के बाहर भेजा गया। इससे सप्लाई चेन को पूरी तरह टूटने से बचाया जा सका।
चीन ने अचानक क्यों घटा दिया आयात?
कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने में चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। यदि उसकी मांग बढ़ती है तो वैश्विक कीमतों पर सीधा असर पड़ता है।
वोर्टेक्सा लिमिटेड के आंकड़ों के अनुसार चीन ने मई में अपने तेल आयात में पिछले वर्ष के औसत की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत कटौती कर दी। इसके बजाय उसने पहले से जमा अपने विशाल भंडार का उपयोग करना शुरू कर दिया।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इस रणनीति ने बाजार में मांग को काफी हद तक कम कर दिया। जब मांग कम हुई तो सप्लाई की कमी का असर भी अपेक्षाकृत कमजोर पड़ गया।
यही वजह है कि कई विशेषज्ञ अब मानते हैं कि तेल बाजार को स्थिर रखने में चीन की भूमिका गुप्त सप्लाई से भी अधिक महत्वपूर्ण रही।
अमेरिका बना दुनिया का सबसे बड़ा संकटमोचक
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण स्विंग सप्लायर बनकर उभरा है। अमेरिकी शेल उत्पादकों ने बढ़ती कीमतों का फायदा उठाते हुए उत्पादन और निर्यात दोनों बढ़ा दिए।
मई में अमेरिका का कच्चे तेल और ईंधन का निर्यात पूरे पिछले वर्ष के औसत से लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन अधिक रहा। अमेरिकी पेट्रोलियम निर्यात का मूल्य मार्च के 27.6 अरब डॉलर से बढ़कर अप्रैल में रिकॉर्ड 36.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
इसका सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ा। अमेरिका से बढ़ी सप्लाई ने पश्चिम एशिया से आई कमी का बड़ा हिस्सा भर दिया और तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने में मदद की।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
यदि ब्रेंट क्रूड 150 या 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाता तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ जाता। इससे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और हवाई ईंधन महंगे हो सकते थे। साथ ही महंगाई भी बढ़ने का खतरा था।
लेकिन फिलहाल कीमतें 90 डॉलर के आसपास बनी हुई हैं। इससे भारत को राहत मिली है। सरकार पर सब्सिडी का अतिरिक्त बोझ नहीं बढ़ा है और तेल कंपनियों पर भी ज्यादा दबाव नहीं आया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो जाता है और होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल जाता है, तो आने वाले महीनों में तेल की कीमतों में और गिरावट देखने को मिल सकती है।
क्या अब खत्म होने वाला है तेल संकट?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान समझौते के लिए तैयार हो गया है और जल्द ही औपचारिक डील पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। बाजार ने इस बयान को सकारात्मक संकेत माना।
इसी उम्मीद में शुक्रवार को तेल बाजार में बड़ी बिकवाली देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड 3.37 प्रतिशत गिरकर 87.33 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड 3.23 प्रतिशत फिसलकर 84.88 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ।
हालांकि ऊर्जा बाजार के जानकार अभी भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और किसी भी नई सैन्य कार्रवाई से कीमतों में फिर उछाल आ सकता है।
निष्कर्ष
तीन महीने से अधिक समय तक होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहने के बावजूद तेल बाजार का पूरी तरह बिखर न जाना वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की मजबूती को दिखाता है। अमेरिका के रिकॉर्ड निर्यात, चीन की कमजोर मांग, रणनीतिक भंडारों के इस्तेमाल, वैकल्पिक पाइपलाइन मार्गों और कथित गुप्त तेल प्रवाह ने मिलकर उस संकट को टाल दिया जिसकी आशंका कई विशेषज्ञ जता रहे थे।
अब दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान वार्ता और होर्मुज जलडमरूमध्य के भविष्य पर है। यदि समझौता हो जाता है तो तेल बाजार को बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन यदि संघर्ष फिर बढ़ता है तो ऊर्जा बाजार में नई उथल-पुथल से इनकार नहीं किया जा सकता।


