पश्चिम बंगाल में कथित अवैध कोयला खनन और तस्करी के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई ने एक बार फिर बड़े स्तर पर फैले आर्थिक अपराध नेटवर्क को उजागर किया है। एजेंसी ने 15 अप्रैल 2026 को इस मामले में ₹159.51 करोड़ की संपत्तियों को अटैच किया, जिससे इस केस में अब तक जब्त कुल संपत्ति का आंकड़ा ₹482.22 करोड़ तक पहुंच गया है।
इस पूरे मामले के केंद्र में कथित तौर पर Anup Majee उर्फ ‘लाला’ का नाम सामने आया है, जिसे इस अवैध नेटवर्क का प्रमुख संचालक बताया जा रहा है। जांच में जो खुलासे हुए हैं, वे केवल कोयला चोरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें फर्जी बिलिंग, हवाला नेटवर्क और डिजिटल माध्यम से रिश्वत के जटिल सिस्टम का इस्तेमाल सामने आया है।
कैसे काम करता था पूरा कोयला सिंडिकेट?
ED की जांच के अनुसार, यह कोई साधारण अवैध खनन मामला नहीं था, बल्कि एक संगठित और बहुस्तरीय आपराधिक नेटवर्क था।
इस नेटवर्क की कार्यप्रणाली कुछ इस तरह थी:
अवैध खनन के जरिए कोयला निकाला जाता था और फिर उसे पश्चिम बंगाल के विभिन्न औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचाया जाता था। कई कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने जानबूझकर इस अवैध कोयले को नकद में खरीदा, ताकि इसकी असली पहचान छुपाई जा सके और इसे वैध व्यापार के रूप में दिखाया जा सके।
इस प्रक्रिया में फर्जी टैक्स इनवॉइस और नकली ट्रांसपोर्ट दस्तावेजों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया, जिससे पूरा लेन-देन कानूनी दिखे।
‘लाला पैड’ क्या है? फर्जी चालान का डिजिटल-जुगाड़ मॉडल
इस घोटाले का सबसे चौंकाने वाला पहलू है तथाकथित ‘लाला पैड’ सिस्टम।
यह एक तरह का फर्जी ट्रांसपोर्ट चालान था, जो:
- गैर-मौजूद कंपनियों के नाम पर जारी किया जाता था
- ट्रकों के लिए नकली टैक्स इनवॉइस के रूप में इस्तेमाल होता था
लेकिन असली खेल इसके साथ जुड़ी डिजिटल तकनीक में था।
ट्रांसपोर्टर को एक ₹10 या ₹20 का नोट दिया जाता था। वह उस नोट को ट्रक के नंबर प्लेट के साथ पकड़कर उसकी फोटो खींचता और सिंडिकेट के ऑपरेटर को भेजता। इसके बाद यह फोटो WhatsApp के जरिए संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जाती थी।
इसका मतलब यह था कि:
- रास्ते में पुलिस या प्रशासन को पहले से सूचना मिल जाती थी
- ट्रकों को रोका नहीं जाता था
- अगर रोका गया, तो तुरंत छोड़ दिया जाता था
यह एक तरह का “डिजिटल पास” बन चुका था, जो पूरी व्यवस्था को बायपास करने में मदद करता था।
हवाला नेटवर्क और काले धन की सफाई
ED की जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरे नेटवर्क में हवाला सिस्टम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया।
इसमें:
- नकद लेन-देन बिना बैंकिंग चैनल के किया जाता था
- पहचान के लिए करेंसी नोट के सीरियल नंबर का उपयोग होता था
- पैसे को अलग-अलग चैनलों के जरिए घुमाकर वैध दिखाया जाता था
यह प्रक्रिया “Proceeds of Crime” को सफेद करने के लिए अपनाई जाती थी, जिससे जांच एजेंसियों को असली स्रोत का पता लगाना मुश्किल हो जाए।
किन कंपनियों पर आई आंच?
जांच के दौरान कुछ प्रमुख औद्योगिक कंपनियों के नाम भी सामने आए हैं, जिन पर आरोप है कि उन्होंने इस अवैध कोयले की खरीद में भूमिका निभाई।
इनमें शामिल हैं:
- Shyam Sel and Power Limited
- Shyam Ferro Alloys Limited
ये कंपनियां श्याम ग्रुप का हिस्सा हैं, जिसका संचालन Sanjay Agarwal और Brij Bhushan Agarwal से जुड़ा बताया जा रहा है।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित कंपनियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया और जांच का अंतिम निष्कर्ष अभी आना बाकी है।
₹482 करोड़ की संपत्ति अटैच: क्या संकेत देता है यह आंकड़ा?
अब तक इस मामले में ED द्वारा कुल ₹482.22 करोड़ की संपत्तियां अटैच की जा चुकी हैं। इसमें:
- कॉर्पोरेट बॉन्ड
- वैकल्पिक निवेश फंड (AIFs)
- अन्य वित्तीय निवेश
शामिल हैं।
यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि यह केवल स्थानीय स्तर का घोटाला नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक नेटवर्क का हिस्सा है, जिसमें उद्योग, प्रशासन और संगठित अपराध का संभावित गठजोड़ शामिल हो सकता है।
प्रशासन और कानून व्यवस्था पर उठते सवाल
इस मामले में सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या स्थानीय प्रशासन और पुलिस तंत्र की जानकारी के बिना यह नेटवर्क इतने लंबे समय तक चल सकता था?
ED की रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि:
- कुछ स्थानीय प्रशासनिक तत्वों की भूमिका संदिग्ध हो सकती है
- सिस्टम में खामियों का फायदा उठाया गया
- डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग कर निगरानी से बचा गया
यह पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
व्यापक प्रभाव: अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर असर
अवैध कोयला खनन केवल आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि इसका पर्यावरण और समाज पर भी गंभीर असर पड़ता है।
- सरकार को राजस्व का नुकसान
- पर्यावरणीय क्षति
- स्थानीय समुदायों पर नकारात्मक प्रभाव
- वैध उद्योगों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा
इस तरह के नेटवर्क देश की आर्थिक व्यवस्था को भी कमजोर करते हैं।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल का यह कोयला घोटाला केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि एक जटिल और संगठित आर्थिक अपराध का उदाहरण है, जिसमें तकनीक, वित्त और प्रशासनिक खामियों का इस्तेमाल किया गया।
‘लाला पैड’ जैसे सिस्टम यह दिखाते हैं कि अपराधी किस तरह नए-नए तरीके अपनाकर कानून से बचने की कोशिश करते हैं। ED की कार्रवाई से इस नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा सामने आया है, लेकिन यह साफ है कि जांच अभी लंबी चलेगी।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या इस मामले में जुड़े सभी पहलुओं की पूरी सच्चाई सामने आएगी और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी या नहीं।
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