नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन में बाधा के बीच कच्चे तेल की कीमतें $126 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इसी के साथ एक और बड़ी चिंता सामने आई है—United States का स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) तेजी से घट रहा है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, पिछले सप्ताह अमेरिकी रिजर्व में 7.12 मिलियन बैरल की गिरावट दर्ज की गई, जो अक्टूबर 2022 के बाद सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट है। यह लगातार पांचवां सप्ताह है जब रिजर्व घटा है—एक ऐसा ट्रेंड जो बाजार में असामान्य दबाव की ओर इशारा करता है।
क्या है Strategic Petroleum Reserve और क्यों अहम है?
US Department of Energy के तहत संचालित Strategic Petroleum Reserve दुनिया का सबसे बड़ा आपातकालीन तेल भंडार है। इसे 1970 के दशक के तेल संकट के बाद बनाया गया था ताकि किसी भी आपूर्ति संकट के दौरान देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके।
आम तौर पर SPR का उपयोग तभी किया जाता है जब बाजार में भारी असंतुलन हो—जैसे युद्ध, प्राकृतिक आपदा या सप्लाई शॉक। लेकिन अभी जो स्थिति है, वह अलग है।
रिजर्व का लगातार गिरना यह संकेत देता है कि अमेरिका सिर्फ emergency के लिए नहीं, बल्कि global demand को पूरा करने के लिए भी अपने भंडार का उपयोग कर रहा है।
पांच हफ्तों में 17 मिलियन बैरल की गिरावट—क्या यह सामान्य है?
पिछले पांच हफ्तों में SPR करीब 17 मिलियन बैरल घटकर 398 मिलियन बैरल रह गया है। यह स्तर पिछले साल अप्रैल के बाद सबसे कम है।
इसके साथ ही commercial crude stock में भी 6.08 मिलियन बैरल की गिरावट दर्ज की गई है। यानी सिर्फ emergency reserve ही नहीं, बल्कि regular supply chain भी दबाव में है।
यह ट्रेंड बताता है कि global oil demand अचानक बढ़ी है, जबकि supply उतनी तेजी से नहीं बढ़ पा रही।
असली वजह: Hormuz Strait संकट और एक्सपोर्ट में उछाल
इस पूरे संकट की जड़ पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है। खासकर Strait of Hormuz—जहां से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है—वहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने से वैश्विक सप्लाई पर सीधा असर पड़ा है।
ऐसी स्थिति में दुनिया के कई देशों ने अमेरिकी तेल की ओर रुख किया है।
नतीजा?
अमेरिका का crude oil export इतिहास में पहली बार 14 मिलियन बैरल प्रतिदिन के पार पहुंच गया है।
यानी अमेरिका अब सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के लिए भी “backup supplier” बन गया है।
पेट्रोल और डीजल के स्टॉक भी गिर रहे—महंगाई का खतरा
यह संकट सिर्फ crude oil तक सीमित नहीं है। पेट्रोल और डिस्टिलेट (diesel) के स्टॉक में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है।
पेट्रोल का स्टॉक 6.08 मिलियन बैरल घटा है, जबकि डिस्टिलेट में 4.49 मिलियन बैरल की गिरावट आई है।
इसका सीधा मतलब है कि refined fuel की supply भी tight हो रही है।
अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो अमेरिका में fuel prices बढ़ेंगे—और इसका असर global inflation पर भी पड़ेगा।
अमेरिका खुद जोखिम लेकर दुनिया को सप्लाई दे रहा है
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका अपने strategic reserves का इस्तेमाल करके global market को stabilize करने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन यह strategy risk-free नहीं है।
अगर आने वाले महीनों में geopolitical tension और बढ़ता है और supply पूरी तरह disrupt हो जाती है, तो अमेरिका के पास emergency buffer कम हो जाएगा।
यानी short-term में दुनिया को राहत मिल रही है, लेकिन long-term में risk बढ़ रहा है।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा crude oil import करते हैं, इस स्थिति से सीधे प्रभावित होते हैं।
अगर global oil prices $120+ पर बने रहते हैं, तो:
- पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे
- ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ेगी
- खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर पड़ेगा
- inflation (महंगाई) बढ़ सकती है
हालांकि भारत ने हाल के महीनों में sourcing diversify की है—रूस, ब्राजील और अन्य देशों से तेल खरीदकर risk कम करने की कोशिश की है।
लेकिन global price shock से पूरी तरह बच पाना मुश्किल है।
क्या यह 2022 जैसा नया ऑयल संकट बन सकता है?
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं और SPR का इस्तेमाल किया गया था।
लेकिन मौजूदा स्थिति उससे अलग है।
इस बार समस्या सिर्फ supply disruption नहीं है—बल्कि demand भी काफी मजबूत है, खासकर एशिया और यूरोप में।
अगर दोनों चीजें (high demand + low supply) साथ चलती रहीं, तो oil market में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रह सकती है।
आगे क्या?
अगले कुछ हफ्तों में तीन चीजें तय करेंगी कि बाजार किस दिशा में जाएगा:
पहला, क्या Hormuz Strait पूरी तरह खुलता है या नहीं
दूसरा, क्या अमेरिका अपने exports को कम करता है
तीसरा, OPEC+ देश production बढ़ाते हैं या नहीं
अगर सप्लाई सुधरती है, तो कीमतों में राहत मिल सकती है।
लेकिन अगर तनाव बढ़ता है, तो $130-$150 प्रति बैरल का स्तर भी संभव है।
निष्कर्ष

United States के crude reserves में गिरावट और export में record उछाल यह दिखाता है कि global oil market इस समय असंतुलन की स्थिति में है।
यह सिर्फ एक देश का डेटा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है—energy security अब सबसे बड़ा geopolitical और economic मुद्दा बन चुका है।
आने वाले समय में यह तय करेगा कि महंगाई, growth और global stability किस दिशा में जाएगी।
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