कई बार जिंदगी में सफलता का रास्ता उम्र नहीं, बल्कि फैसला तय करता है। बिहार के एक छोटे से गांव में जन्मे अनिल कुमार चौरसिया की कहानी इसी बात का प्रमाण है। उन्होंने करीब 30 साल तक देश की विभिन्न चीनी मिलों में नौकरी की, लेकिन 50 साल की उम्र पार करने के बाद ऐसा निर्णय लिया जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। आज वह बिहार में स्थापित एक बड़े इथेनॉल प्लांट के मालिक हैं और उनकी कंपनी का वैल्यूएशन लगभग ₹200 करोड़ तक पहुंच चुका है।
अनिल कुमार चौरसिया वर्तमान में ईएसएस एनर्जी (ESS Energy) के प्रमोटर, मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ हैं। लेकिन यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। आर्थिक रूप से कमजोर किसान परिवार में जन्म लेने वाले अनिल को अपनी पढ़ाई से लेकर करियर तक हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा।
बिहार के छोटे गांव से शुरू हुआ सफर

अनिल कुमार चौरसिया का जन्म बिहार के वैशाली जिले के छोटी युसूफपुर गांव में हुआ था। यह गांव उस समय बुनियादी सुविधाओं के मामले में काफी पिछड़ा माना जाता था। उनकी शुरुआती शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई।
गांव में हाई स्कूल नहीं था, इसलिए उन्हें दूसरे गांव जाकर पढ़ाई करनी पड़ी। वर्ष 1983 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। उस दौर में ग्रामीण इलाकों में करियर गाइडेंस जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। परिवार और गांव के लोगों के पास भी सीमित जानकारी थी कि आगे क्या पढ़ाई की जाए।
किसी परिचित की सलाह पर उन्होंने बिहार पॉलिटेक्निक संयुक्त प्रवेश परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में सफलता हासिल कर ली। इसके बाद पूर्णिया सरकारी पॉलिटेक्निक संस्थान से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा किया।
डिप्लोमा और बीटेक के बाद भी नहीं मिली नौकरी
डिप्लोमा पूरा होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि नौकरी जल्दी मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा हासिल की।
नौकरी की तलाश के दौरान उन्होंने लगातार नई तकनीकें सीखीं और अपनी स्किल्स को बेहतर बनाया। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और वर्ष 1994 में उन्हें बिरला समूह की मोतिहारी शुगर मिल में इंजीनियर के रूप में पहली नौकरी मिली।
यह नौकरी उनके जीवन का पहला बड़ा मोड़ साबित हुई। यहां उन्होंने सिर्फ कर्मचारी की तरह नहीं बल्कि मालिकाना सोच के साथ काम किया। यही सोच आगे चलकर उन्हें उद्योगपति बनाने वाली थी।
नौकरी लगते ही हो गई शादी

नौकरी मिलने के बाद उनके जीवन में दूसरा बड़ा बदलाव आया। वर्ष 1995 में उनकी शादी भागलपुर की संध्या कुमारी से हुई।
अनिल बताते हैं कि उस समय बिहार में अच्छी नौकरी का मतलब सामाजिक सम्मान भी था। शादी के बाद उन्होंने अपने करियर पर और अधिक ध्यान दिया और लगातार बेहतर अवसरों की तलाश जारी रखी।
उन्होंने मंझौलिया शुगर मिल, गोपालगंज शुगर मिल्स और बाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध सिंभावली शुगर मिल में काम किया। समय के साथ उनकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और वह कंपनी के शीर्ष प्रबंधन तक पहुंच गए।
असिस्टेंट मैनेजर से प्रेसिडेंट बनने तक का सफर
सिंभावली शुगर मिल में उन्होंने असिस्टेंट मैनेजर के रूप में शुरुआत की थी। लेकिन अपने अनुभव, नेतृत्व क्षमता और तकनीकी समझ के दम पर उन्होंने लगातार तरक्की हासिल की।
करीब दो दशकों तक कंपनी में काम करने के बाद वह प्रेसिडेंट जैसे शीर्ष पद तक पहुंच गए। उनके पास शानदार वेतन, सुविधाएं और उद्योग में मजबूत पहचान थी।
लेकिन इसके बावजूद उनके मन में कहीं न कहीं अपना व्यवसाय शुरू करने की इच्छा बनी हुई थी।
पत्नी की एक बात ने बदल दी पूरी जिंदगी

अनिल कुमार चौरसिया की सफलता की कहानी में उनकी पत्नी संध्या का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है।
वह बताते हैं कि कई वर्षों तक उन्होंने अपने मन की इच्छा को दबाकर रखा। लेकिन उनकी पत्नी लगातार उन्हें प्रेरित करती रहीं कि केवल नौकरी करने के बजाय अपना उद्योग स्थापित करें।
पत्नी अक्सर उनसे कहती थीं कि जब आपके पास इतना अनुभव है तो दूसरों के लिए काम करने के बजाय खुद का उद्योग क्यों नहीं शुरू करते। यही प्रेरणा धीरे-धीरे उनके भीतर आत्मविश्वास में बदल गई।
आखिरकार वर्ष 2020 में उन्होंने बड़ा फैसला लिया और नौकरी छोड़कर अपना उद्योग शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
इथेनॉल सेक्टर में दिखा भविष्य
शुरुआत में उनका विचार पावर प्लांट लगाने का था। लेकिन उसी दौरान केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लिए।
भारत सरकार का इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा था। अनिल को लगा कि आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में बड़े अवसर पैदा होंगे।
चूंकि वह वर्षों तक शुगर इंडस्ट्री में काम कर चुके थे, इसलिए इथेनॉल उत्पादन की तकनीक और संचालन को अच्छी तरह समझते थे। यही कारण था कि उन्होंने इथेनॉल प्लांट स्थापित करने का फैसला किया।
बिना पूंजी के शुरू किया ₹100 करोड़ का सपना

जब उन्होंने उद्योग लगाने की योजना बनाई, तब उनके पास बड़ी पूंजी नहीं थी। शुरुआती परियोजना लागत लगभग ₹100 करोड़ आंकी गई थी।
उन्होंने बिहार के कैमूर जिले में करीब 12 एकड़ भूमि खरीदी और परियोजना का खाका तैयार किया। सबसे बड़ी चुनौती फंडिंग की थी।
लेकिन उनका अनुभव और उद्योग में बनी विश्वसनीयता काम आई। कुछ निवेशकों ने साझेदारी में निवेश करने की सहमति दी। इसके अलावा बैंक से लगभग ₹70 करोड़ का ऋण भी मिल गया।
दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी उनका साथ दिया। धीरे-धीरे परियोजना आगे बढ़ती गई और उनका सपना हकीकत का रूप लेने लगा।
बिहार लौटकर लगाया उद्योग
अनिल का मानना था कि अगर उद्योग लगाना है तो अपने राज्य में लगाया जाए। उस समय बिहार सरकार उद्योगों को आकर्षित करने के लिए कई प्रोत्साहन योजनाएं चला रही थी।
राज्य की औद्योगिक नीति और निवेश प्रोत्साहन योजनाओं ने उन्हें प्रभावित किया। इसी वजह से उन्होंने बिहार को अपनी परियोजना के लिए चुना।
उनका यह फैसला न केवल व्यक्तिगत सफलता का कारण बना बल्कि स्थानीय रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ।
2025 में शुरू हुआ उत्पादन
फैक्ट्री निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ा और मार्च 2025 में उत्पादन शुरू हो गया। शुरुआती दिनों में प्लांट परीक्षण चरण में रहा, लेकिन जल्द ही व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो गया।
आज यह प्लांट बड़ी मात्रा में इथेनॉल उत्पादन करने में सक्षम है। कंपनी लगभग 200 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध करा रही है, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से इससे सैकड़ों परिवार जुड़े हुए हैं।
अब CBG प्रोजेक्ट पर काम
इथेनॉल प्लांट की सफलता के बाद कंपनी विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है।
अनिल कुमार चौरसिया ने प्लांट के पास अतिरिक्त भूमि भी खरीदी है और अब कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) परियोजना पर काम चल रहा है। यह कदम स्वच्छ ऊर्जा और हरित ईंधन क्षेत्र में कंपनी की मौजूदगी को और मजबूत कर सकता है।
सफलता का सबसे बड़ा संदेश
अनिल कुमार चौरसिया की कहानी बताती है कि सफलता पाने के लिए केवल युवावस्था ही जरूरी नहीं होती। अनुभव, धैर्य और सही समय पर लिया गया साहसी फैसला भी जिंदगी बदल सकता है।
30 साल तक नौकरी करने के बाद उन्होंने जोखिम उठाया और आज वह सैकड़ों लोगों को रोजगार देने वाले उद्योगपति बन चुके हैं। उनकी यात्रा उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों को उम्र या परिस्थितियों के कारण टालते रहते हैं।
कभी गांव में आगे की पढ़ाई की सलाह देने वाला भी कोई नहीं था, लेकिन आज वही व्यक्ति ₹200 करोड़ की कंपनी का नेतृत्व कर रहा है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है कि यदि इरादे मजबूत हों तो सफलता की कोई उम्र नहीं होती।


