नई दिल्ली। केंद्र सरकार के एक बड़े फैसले ने भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी अचानक बढ़ा दी है। सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के लिए सरकारी बॉन्ड पर लगने वाले लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स, शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन टैक्स और ब्याज आय पर लगने वाले विदहोल्डिंग टैक्स को समाप्त कर दिया है। इसके बाद विदेशी निवेशकों ने जून महीने में भारतीय डेट मार्केट में लगभग 1.9 अरब डॉलर (करीब 17,000 करोड़ रुपये) का निवेश कर दिया।
यह निवेश सिर्फ पांच ट्रेडिंग सेशन में आया है, जो पिछले 16 महीनों में किसी एक महीने में हुआ सबसे बड़ा विदेशी डेट निवेश माना जा रहा है। इससे साफ है कि भारत के बॉन्ड बाजार को लेकर वैश्विक निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।
क्या होते हैं सरकारी बॉन्ड?
सरकारी बॉन्ड (Government Bonds) ऐसे वित्तीय साधन होते हैं जिनके जरिए केंद्र या राज्य सरकारें निवेशकों से पैसा उधार लेती हैं। सरकारें इस राशि का उपयोग इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, कल्याणकारी योजनाओं और अन्य सार्वजनिक खर्चों को पूरा करने के लिए करती हैं।
जब कोई निवेशक सरकारी बॉन्ड खरीदता है तो वह वास्तव में सरकार को एक निश्चित अवधि के लिए पैसा उधार देता है। इसके बदले सरकार निवेशक को तय ब्याज (Coupon Rate) देती है और अवधि पूरी होने पर मूल राशि वापस लौटा देती है।
सरकारी बॉन्ड को सबसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में गिना जाता है क्योंकि इनके पीछे सरकार की गारंटी होती है।
जून में क्यों बढ़ा विदेशी निवेश?
जून 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय डेट सिक्योरिटीज में 1.84 अरब डॉलर का निवेश किया है। तुलना करें तो पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में कुल नेट विदेशी डेट निवेश लगभग 2.07 अरब डॉलर रहा था, जबकि अप्रैल और मई 2026 में यह आंकड़ा सिर्फ 130 मिलियन डॉलर था।
6 जून को सरकार ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए सरकारी बॉन्ड पर:
- LTCG टैक्स समाप्त किया
- STCG टैक्स समाप्त किया
- ब्याज आय पर विदहोल्डिंग टैक्स हटाया
पहले विदेशी निवेशकों को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर 12.5%, शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन पर 30% और ब्याज आय पर लगभग 20% टैक्स देना पड़ता था।
टैक्स हटने के बाद भारतीय बॉन्ड विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक हो गए हैं।
शेयर और बॉन्ड में क्या अंतर है?
बहुत से निवेशक शेयर और बॉन्ड को एक जैसा समझते हैं, जबकि दोनों की प्रकृति पूरी तरह अलग होती है।
| आधार | शेयर | सरकारी बॉन्ड |
|---|---|---|
| स्वामित्व | कंपनी में हिस्सेदारी | सरकार को दिया गया ऋण |
| जोखिम | अधिक | कम |
| रिटर्न | बाजार पर निर्भर | पहले से तय ब्याज |
| पूंजी सुरक्षा | नहीं | अपेक्षाकृत अधिक |
| उतार-चढ़ाव | ज्यादा | कम |
शेयर बाजार में निवेशक कंपनी के प्रदर्शन पर दांव लगाता है, जबकि बॉन्ड में वह निश्चित आय प्राप्त करने के उद्देश्य से निवेश करता है।
भारत को क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से आने वाले वर्षों में अरबों डॉलर का विदेशी निवेश भारतीय बॉन्ड बाजार में आ सकता है। इससे कई फायदे होंगे:
- रुपये को मजबूती मिलेगी।
- विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ेगा।
- सरकार के लिए कर्ज जुटाना आसान होगा।
- बॉन्ड यील्ड पर दबाव कम हो सकता है।
- भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के घाटे को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का भुगतान संतुलन घाटा करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसे में विदेशी पूंजी का यह प्रवाह अर्थव्यवस्था के लिए राहत साबित हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या मायने?
सरकारी बॉन्ड में बढ़ती विदेशी भागीदारी यह संकेत देती है कि वैश्विक निवेशक भारत की अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्तीय प्रबंधन पर भरोसा जता रहे हैं। हालांकि खुदरा निवेशकों के लिए बॉन्ड और शेयर दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है।
यदि कोई निवेशक कम जोखिम और निश्चित आय चाहता है तो सरकारी बॉन्ड बेहतर विकल्प हो सकते हैं, जबकि लंबी अवधि में अधिक रिटर्न की तलाश करने वाले निवेशक शेयर बाजार का रुख कर सकते हैं।
सरकार के टैक्स राहत वाले फैसले ने भारतीय बॉन्ड बाजार को नई रफ्तार दे दी है और आने वाले महीनों में विदेशी निवेश का यह सिलसिला और तेज हो सकता है।


