नई दिल्ली। अक्सर कहा जाता है कि एक परीक्षा का रिजल्ट किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी तय नहीं कर सकता। भारत के दिग्गज उद्योगपति और फार्मा सेक्टर के सबसे सफल उद्यमियों में शामिल डॉ. मुरली के. डीवी की कहानी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। एक समय ऐसा था जब वे 12वीं की परीक्षा में दो बार फेल हो गए थे। परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी और 13 भाई-बहनों वाले बड़े परिवार में सबसे छोटे होने के कारण उनके सामने कई चुनौतियां थीं। लेकिन आज वही व्यक्ति भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में शामिल है और उनकी कंपनी Divi’s Laboratories का बाजार पूंजीकरण करीब ₹1.76 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है।
फोर्ब्स के अनुसार डॉ. मुरली डीवी की कुल संपत्ति लगभग 10 अरब डॉलर यानी ₹83,000 करोड़ से अधिक है। वे भारत के शीर्ष अरबपतियों में शामिल हैं और हैदराबाद के सबसे धनी कारोबारियों में गिने जाते हैं।
आंध्र प्रदेश के छोटे गांव से शुरू हुआ सफर
डॉ. मुरली के. डीवी का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता दिव्य सत्यनारायण सरकारी सेवा में कार्यरत थे। परिवार बड़ा था और संसाधन सीमित थे। ऐसे माहौल में शिक्षा हासिल करना भी आसान नहीं था।
स्कूल और कॉलेज के शुरुआती दिनों में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सबसे बड़ी चुनौती तब आई जब वे 12वीं की परीक्षा में लगातार दो बार असफल हो गए। आमतौर पर ऐसी असफलता के बाद कई लोग अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं, लेकिन मुरली डीवी ने हार नहीं मानी।
12वीं में फेल होने के बाद भी नहीं छोड़ी पढ़ाई
लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने फार्मेसी क्षेत्र को चुना और बैचलर ऑफ फार्मेसी (B.Pharma) में दाखिला लिया। शुरुआती दौर में यहां भी संघर्ष जारी रहा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से शानदार प्रदर्शन किया।
उन्होंने B.Pharma और M.Pharma दोनों में गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद फार्मास्युटिकल साइंसेज में पीएचडी पूरी की। यह उपलब्धि उस व्यक्ति के लिए बेहद खास थी जिसे कभी 12वीं में असफल छात्र माना जाता था।
अमेरिका में सीखा वैश्विक फार्मा कारोबार
1970 के दशक के मध्य में डॉ. मुरली डीवी अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने फार्मास्युटिकल उद्योग में काम करते हुए रिसर्च, मैन्युफैक्चरिंग और अंतरराष्ट्रीय बिजनेस का गहरा अनुभव हासिल किया।
करीब 15 वर्षों तक अमेरिका में काम करने के दौरान उन्होंने समझा कि दवा उद्योग में गुणवत्ता, तकनीक और विश्वसनीय सप्लाई चेन कितनी महत्वपूर्ण होती है। यही अनुभव आगे चलकर उनके बिजनेस साम्राज्य की नींव बना।
भारत लौटकर शुरू की नई पारी
अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने कुछ वर्षों तक भारतीय फार्मा उद्योग में काम किया। इस दौरान उन्होंने उद्योग की जरूरतों और संभावनाओं को करीब से समझा।
इसके बाद 12 अक्टूबर 1990 को उन्होंने हैदराबाद में Divi’s Research Centre की स्थापना की, जो आगे चलकर Divi’s Laboratories के नाम से दुनिया भर में मशहूर हुई।
कंपनी की शुरुआत बेहद छोटे स्तर पर हुई थी। शुरुआती दिनों में कंपनी में केवल लगभग 100 कर्मचारी थे और उसका मुख्य फोकस रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर था। पहले कई वर्षों तक कंपनी ने केवल तकनीक और गुणवत्ता सुधार पर काम किया।
कैसे बनी ₹1.76 लाख करोड़ की कंपनी?
1995 में कंपनी ने अपना पहला बड़ा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शुरू किया। इसके बाद उत्पादन क्षमता बढ़ती गई और कंपनी को वैश्विक ग्राहकों से ऑर्डर मिलने लगे।
साल 2003 में Divi’s Laboratories शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई। इसके बाद कंपनी ने तेजी से विस्तार किया और आज यह दुनिया की प्रमुख API (Active Pharmaceutical Ingredients) निर्माता कंपनियों में शामिल है।
वर्तमान में कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब ₹1.76 लाख करोड़ है और इसमें 10,000 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। कंपनी की आय का बड़ा हिस्सा निर्यात से आता है और उसके उत्पाद दुनिया के कई देशों में भेजे जाते हैं।
क्या बनाती है Divi’s Laboratories?
कई लोग सोचते हैं कि कंपनी सीधे दवाइयां बनाती होगी, लेकिन वास्तव में Divi’s Laboratories मुख्य रूप से API और इंटरमीडिएट्स का उत्पादन करती है।
API वह महत्वपूर्ण कच्चा पदार्थ होता है जिसका उपयोग दवाओं के निर्माण में किया जाता है। दुनिया की बड़ी फार्मा कंपनियां अपनी दवाओं के लिए ऐसे उच्च गुणवत्ता वाले API सप्लायर पर निर्भर रहती हैं।
यही कारण है कि Divi’s Laboratories वैश्विक फार्मा सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
चीन को क्यों देती है कड़ी टक्कर?
वैश्विक API बाजार में लंबे समय तक चीन का दबदबा रहा है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर की कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही हैं।
कोविड महामारी और सप्लाई चेन संकट के बाद कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत की ओर रुख किया। Divi’s Laboratories इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ उठाने वाली कंपनियों में शामिल रही।
कंपनी की गुणवत्ता, समय पर सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन ने इसे वैश्विक ग्राहकों का भरोसेमंद साझेदार बना दिया है। यही वजह है कि आज इसे चीन की कंपनियों के मजबूत विकल्प के रूप में देखा जाता है।
डॉ. मुरली डीवी की संपत्ति कितनी है?
फोर्ब्स के अनुसार डॉ. मुरली डीवी की कुल संपत्ति करीब 10 अरब डॉलर यानी ₹83,000 करोड़ से अधिक है। वे भारत के शीर्ष 25 सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं।
उनकी संपत्ति का सबसे बड़ा स्रोत Divi’s Laboratories में उनकी हिस्सेदारी है। कंपनी के शेयरों में लगातार वृद्धि ने उनकी नेटवर्थ को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
परिवार भी संभाल रहा है कारोबार
आज Divi’s Laboratories केवल एक व्यक्ति की कंपनी नहीं रह गई है। कंपनी के संचालन में परिवार की अगली पीढ़ी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
उनके बेटे डॉ. सचिंद्र किरण डीवी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं, जबकि बेटी नीलिमा प्रसाद डीवी भी कंपनी के नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
डॉ. मुरली डीवी की कहानी से क्या सीख मिलती है?
डॉ. मुरली डीवी की सफलता यह साबित करती है कि शुरुआती असफलताएं किसी व्यक्ति की अंतिम पहचान नहीं होतीं। 12वीं में दो बार फेल होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, लगातार सीखते रहे और अपने अनुभव को अवसर में बदल दिया।
उनकी कहानी उन लाखों छात्रों और युवाओं के लिए प्रेरणा है जो किसी परीक्षा, नौकरी या व्यवसाय में असफल होने के बाद निराश हो जाते हैं। सही दिशा, धैर्य और मेहनत के दम पर असफलताओं को भी सफलता की सीढ़ी बनाया जा सकता है।
आज एक छोटे गांव से निकलकर वैश्विक फार्मा उद्योग में अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. मुरली डीवी भारत के सबसे सफल उद्यमियों में गिने जाते हैं। उनकी यात्रा यह बताती है कि सपने बड़े हों और मेहनत लगातार हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं रहती।
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