भारत की खाद्य तेल पर विदेशी निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का कुल खाद्य तेल आयात बढ़कर 166.51 लाख टन पहुंच गया है। हालांकि चिंता की सबसे बड़ी वजह सिर्फ आयात में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि नेपाल से होने वाली ड्यूटी-फ्री सप्लाई है। पिछले एक साल में नेपाल से खाद्य तेल का आयात 113 फीसदी बढ़ गया है, जिससे घरेलू रिफाइनिंग उद्योग और तिलहन उत्पादकों की चिंता बढ़ने लगी है।
इंडस्ट्री बॉडी सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 161.82 लाख टन खाद्य तेल आयात किया था, जो 2025-26 में बढ़कर 166.51 लाख टन हो गया। भारत पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है।
नेपाल से आयात में 113% की रिकॉर्ड बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल ने वित्त वर्ष 2025-26 में भारत को करीब 7.36 लाख टन खाद्य तेल निर्यात किया, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा केवल 3.45 लाख टन था। यानी सिर्फ एक वर्ष में आयात 113 फीसदी बढ़ गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और नेपाल के बीच दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) समझौते के तहत मिलने वाली ड्यूटी-फ्री सुविधा इस तेजी की प्रमुख वजह है। इस व्यवस्था के कारण नेपाल से रिफाइंड खाद्य तेल भारतीय बाजार में बिना आयात शुल्क के पहुंच रहा है।
उद्योग जगत का मानना है कि यह ट्रेंड जारी रहा तो भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो सकती है।
किन तेलों का सबसे ज्यादा आयात हुआ?
नेपाल से आने वाले खाद्य तेलों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रिफाइंड सोयाबीन तेल की रही। इसके अलावा सूरजमुखी तेल, RBD पामोलीन और रेपसीड ऑयल की भी बड़ी मात्रा भारत पहुंची।
SEA ने अपने विश्लेषण में कहा है कि नेपाल से रिफाइंड तेलों के ड्यूटी-फ्री आयात में तेज बढ़ोतरी ने भारत के कुल खाद्य तेल आयात को ऊपर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
खाद्य तेल बाजार से जुड़े जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में सोयाबीन और सूरजमुखी तेल की मांग तेजी से बढ़ी है। घरेलू उत्पादन इस मांग को पूरा नहीं कर पा रहा, जिसके कारण आयात पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।
हर साल 18 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च कर रहा भारत
भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल उपभोक्ताओं में शामिल है। देश हर साल लगभग 15 से 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करता है, जिसके लिए करीब 18.3 अरब डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग ₹1.5 लाख करोड़ के बराबर बैठती है।
आयात बिल बढ़ने का असर केवल व्यापार घाटे तक सीमित नहीं रहता। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव बढ़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ती हैं, तब भारत को अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।
इसी वजह से सरकार पिछले कुछ वर्षों से खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रही है।
भारतीय कंपनियों की चिंता क्यों बढ़ी?
नेपाल से आने वाले सस्ते और ड्यूटी-फ्री रिफाइंड तेल ने घरेलू रिफाइनिंग उद्योग की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय कंपनियों को कच्चे तेल के आयात, प्रोसेसिंग और अन्य लागतों का सामना करना पड़ता है, जबकि नेपाल से तैयार रिफाइंड तेल अपेक्षाकृत कम कीमत पर भारतीय बाजार में पहुंच रहा है।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो घरेलू रिफाइनर्स के मार्जिन प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर निवेश, उत्पादन क्षमता विस्तार और रोजगार पर भी पड़ सकता है।
कुछ उद्योग संगठनों ने सरकार से इस मुद्दे की समीक्षा करने की मांग भी की है ताकि घरेलू उद्योग और आयात के बीच संतुलन बनाया जा सके।
किसानों पर क्या असर पड़ सकता है?
सस्ते आयात का असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव तिलहन किसानों पर भी पड़ सकता है।
भारत में सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी और अन्य तिलहन फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यदि बाजार में बड़ी मात्रा में सस्ता आयातित तेल उपलब्ध रहेगा तो घरेलू तिलहन की कीमतों पर दबाव आ सकता है।
ऐसी स्थिति में किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने में मुश्किल हो सकती है। यही कारण है कि सरकार तिलहन उत्पादन बढ़ाने और किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए कई योजनाएं चला रही है।
आयात निर्भरता कम करने के लिए क्या कर रही है सरकार?
केंद्र सरकार खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कई मोर्चों पर काम कर रही है। राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन (Oilseeds Mission) और राष्ट्रीय पाम ऑयल मिशन (NMEO-OP) के तहत उत्पादन बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खाद्य तेलों की खपत में संयम बरतने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया था।
सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करना और किसानों को तिलहन उत्पादन के लिए अधिक प्रोत्साहित करना है। हालांकि बढ़ती आबादी और खपत को देखते हुए यह चुनौती आसान नहीं मानी जा रही।
उपभोक्ताओं को फायदा या नुकसान?
नेपाल से बढ़ते आयात का एक सकारात्मक पहलू भी है। अधिक सप्लाई से बाजार में खाद्य तेलों की उपलब्धता बढ़ती है, जिससे कीमतों पर दबाव कम रह सकता है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई बड़ा झटका नहीं आता तो उपभोक्ताओं को खाद्य तेल अपेक्षाकृत नियंत्रित कीमतों पर मिल सकता है। हालांकि कीमतों का अंतिम रुख वैश्विक बाजार, कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर की चाल और कृषि जिंसों के उत्पादन पर भी निर्भर करेगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत आने वाले वर्षों में अपनी खाद्य तेल आयात निर्भरता कम कर पाएगा या विदेशी बाजारों पर उसकी निर्भरता और बढ़ेगी। नेपाल से बढ़ती ड्यूटी-फ्री सप्लाई ने इस बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।
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