नई दिल्ली: दुनिया इस समय ऊर्जा बाजार में भारी अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत को लेकर एक बड़ा बयान सामने आया है। रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) इगोर सेचिन ने कहा है कि अगले एक दशक में वैश्विक तेल मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा अकेले भारत से आएगा।
सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में बोलते हुए सेचिन ने भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार का सबसे महत्वपूर्ण विकास केंद्र बताया। उनका कहना है कि जिस समय विकसित देशों में तेल की मांग स्थिर या घट रही है, उसी समय भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण ऊर्जा खपत का नया इंजन बन रहा है।
क्यों बढ़ रही है भारत में तेल की मांग?
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। बीते एक दशक में देश में सड़क नेटवर्क, हवाई यात्रा, लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और शहरीकरण में तेज विस्तार हुआ है। इसका सीधा असर ऊर्जा खपत पर दिखाई दे रहा है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुमानों के अनुसार वर्ष 2035 तक भारत की तेल खपत करीब 80 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। वर्तमान स्तर की तुलना में यह लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि होगी। दिलचस्प बात यह है कि इसी अवधि में वैश्विक तेल मांग में केवल 5 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।
यानी दुनिया भर में तेल की अतिरिक्त मांग जितनी बढ़ेगी, उसका लगभग आधा हिस्सा भारत से आएगा। यही वजह है कि वैश्विक तेल उत्पादक देशों और कंपनियों की नजर अब भारत पर केंद्रित होती जा रही है।
भारत की आबादी, बढ़ता मध्यम वर्ग, निजी वाहनों की संख्या में वृद्धि और औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार आने वाले वर्षों में तेल की मांग को लगातार बढ़ाने वाले प्रमुख कारक होंगे।
वैश्विक तेल बाजार में भारत का बढ़ता प्रभाव
कुछ वर्ष पहले तक वैश्विक तेल बाजार में अमेरिका, चीन और यूरोप की भूमिका सबसे अधिक मानी जाती थी। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। चीन की आर्थिक वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी हुई है जबकि यूरोप और कई विकसित देशों में ऊर्जा दक्षता तथा इलेक्ट्रिक वाहनों के कारण तेल की मांग सीमित हो रही है।
इसके विपरीत भारत अभी भी विकास के उस चरण में है जहां बुनियादी ढांचे, निर्माण गतिविधियों और परिवहन क्षेत्र में भारी निवेश हो रहा है। यही कारण है कि तेल उत्पादक देश भारत को भविष्य का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार मान रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत लगातार 6 से 7 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर बनाए रखता है तो ऊर्जा खपत में बढ़ोतरी का यह अनुमान भी और ऊपर जा सकता है।
रूस से सस्ते तेल ने भारत को कितना फायदा पहुंचाया?
रोसनेफ्ट के CEO इगोर सेचिन ने अपने भाषण में रूस से भारत और चीन को हुई तेल आपूर्ति का भी जिक्र किया। उनके अनुसार अप्रैल 2022 के बाद रूस से मिलने वाले तेल ने भारत और चीन को 40 अरब डॉलर से अधिक का संयुक्त आर्थिक लाभ पहुंचाया है।
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण रूस ने एशियाई बाजारों को रियायती दरों पर तेल बेचना शुरू किया था। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए रूसी कच्चे तेल का आयात काफी बढ़ा दिया।
इसका फायदा भारतीय रिफाइनरियों को मिला। कम कीमत पर कच्चा तेल मिलने से रिफाइनिंग मार्जिन बेहतर हुए और देश को ऊर्जा आयात बिल नियंत्रित रखने में मदद मिली। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत को रियायती रूसी तेल नहीं मिलता तो घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों पर कहीं अधिक दबाव दिखाई देता।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है भारत के लिए अहम?
सेचिन ने अपने संबोधन में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी चेतावनी दी। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
भारत अपनी तेल जरूरतों का अधिकांश हिस्सा आयात करता है और उसका बड़ा भाग पश्चिम एशियाई देशों से आता है। ऐसे में यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी प्रकार की सैन्य या राजनीतिक बाधा आती है तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है।
सप्लाई बाधित होने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इससे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और अन्य ऊर्जा उत्पाद महंगे हो सकते हैं। साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।
खाद्य और उर्वरक कीमतों पर भी पड़ सकता है असर
ऊर्जा संकट का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहता। इगोर सेचिन ने कहा कि उर्वरक बाजार पहले से दबाव में है और वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में उर्वरकों की कीमतों में करीब 60 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है।
यदि तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होती है तो उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इससे कृषि क्षेत्र पर असर पड़ेगा और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
भारत जैसे देश, जहां बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, ऐसे किसी भी वैश्विक झटके के प्रति अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा विषय बन चुकी है।
भारत के सामने क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि भारत तेजी से ऊर्जा खपत बढ़ाने वाला देश बन रहा है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।
पहली चुनौती आयात निर्भरता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। दूसरी चुनौती कीमतों में वैश्विक उतार-चढ़ाव है, जिस पर भारत का सीधा नियंत्रण नहीं है। तीसरी चुनौती ऊर्जा परिवर्तन की है, जहां एक तरफ तेल की मांग बढ़ रही है तो दूसरी तरफ देश को नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को भी बढ़ावा देना है।
सरकार इसी कारण सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बायोफ्यूल और इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम पर जोर दे रही है। इसके बावजूद आने वाले कई वर्षों तक तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों का प्रमुख स्रोत बना रहेगा।
भारत बन रहा है ऊर्जा बाजार का केंद्र
रूस की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में शामिल रोसनेफ्ट के CEO का बयान इस बात का संकेत है कि वैश्विक ऊर्जा उद्योग भारत को भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण बाजार के रूप में देख रहा है। अगले दस वर्षों में जब दुनिया की तेल मांग की वृद्धि का बड़ा हिस्सा भारत से आने वाला हो, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनियों, तेल उत्पादक देशों और निवेशकों के लिए नई दिल्ली का महत्व लगातार बढ़ने वाला है।
भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल उपभोक्ता आधार और ऊर्जा की बढ़ती जरूरतें उसे वैश्विक तेल बाजार का निर्णायक खिलाड़ी बना रही हैं। आने वाले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा, तेल आयात रणनीति और वैकल्पिक ईंधन नीतियां भारत की आर्थिक प्रगति में बेहद अहम भूमिका निभाएंगी।


