Crude Oil Price Today: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार उछाल देखने को मिल रहा है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) पहली बार हालिया दौर में 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी 84-85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंताओं ने तेल बाजार में जबरदस्त तेजी ला दी है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी इसका असर दिखाई दे सकता है।
Highlights
- ब्रेंट क्रूड $91 प्रति बैरल के पार पहुंचा।
- WTI क्रूड 84-85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
- अमेरिका-ईरान तनाव से तेल सप्लाई पर बढ़ा खतरा।
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग प्रभावित होने की आशंका।
- भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने की संभावना।
Brent Crude में क्यों आई इतनी बड़ी तेजी?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ रही तनातनी ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि ट्रेडर्स भविष्य की संभावित कमी को देखते हुए अभी से तेल की खरीद बढ़ा रहे हैं, जिससे कीमतों में तेजी बनी हुई है।
Strait of Hormuz पर बढ़ी चिंता
दुनिया की लगभग 20% कच्चे तेल की सप्लाई हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरती है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस क्षेत्र में सुरक्षा जोखिम बढ़ने से कई शिपिंग कंपनियां सतर्क हो गई हैं और जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा है। यदि यहां लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
एक सप्ताह में 10% से ज्यादा बढ़ीं कीमतें
पिछले एक सप्ताह के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मौजूदा हालात नहीं सुधरे तो ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक भी पहुंच सकता है।
तेल बाजार में फिलहाल निवेशकों का फोकस मिडिल ईस्ट की स्थिति और प्रमुख तेल उत्पादक देशों की अगली रणनीति पर बना हुआ है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इसके संभावित प्रभाव इस प्रकार हो सकते हैं—
- पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना।
- परिवहन लागत बढ़ने से सामान महंगा हो सकता है।
- महंगाई (Inflation) पर दबाव बढ़ सकता है।
- एविएशन, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की लागत बढ़ सकती है।
- सरकार पर ईंधन टैक्स और सब्सिडी को लेकर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। इसमें डॉलर-रुपया विनिमय दर, टैक्स, फ्रेट कॉस्ट, रिफाइनिंग मार्जिन और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा असर
ऊंची तेल कीमतें केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहतीं। इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। महंगा कच्चा तेल उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ाता है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है। कई देशों के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने का फैसला भी कर सकते हैं, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित होने का जोखिम रहता है।
आगे क्या रहेगा बाजार का रुख?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में बाजार की दिशा पूरी तरह मिडिल ईस्ट के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। यदि अमेरिका-ईरान तनाव और बढ़ता है या हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो ब्रेंट क्रूड 95-100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। वहीं यदि हालात सामान्य होते हैं और सप्लाई बहाल रहती है, तो कीमतों में कुछ राहत देखने को मिल सकती है।


