नई दिल्ली, 13 अप्रैल: Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ा कानूनी सवाल सामने आया है—क्या अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून इस संकट को सुलझा सकता है? एक प्रमुख समुद्री कानून विशेषज्ञ के अनुसार, इसका जवाब फिलहाल “नहीं” के करीब है, क्योंकि United States और Iran दोनों ही United Nations Convention on the Law of the Sea (UNCLOS) के पक्षकार नहीं हैं।
यही कारण है कि मौजूदा विवाद में कानून से ज्यादा “geopolitics” हावी नजर आ रही है, जिससे स्थिति और जटिल बन गई है।
क्या है UNCLOS और क्यों है महत्वपूर्ण?
UNCLOS, जिसे 1982 में अपनाया गया था, समुद्री सीमाओं, अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों और जहाजों की आवाजाही से जुड़े नियम तय करता है। इसी के तहत “transit passage” और “innocent passage” जैसे महत्वपूर्ण अधिकार परिभाषित किए गए हैं।
लेकिन समस्या यह है कि:
- अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन इसे ratify नहीं किया
- ईरान भी इसका पक्षकार नहीं है
इसका मतलब यह हुआ कि दोनों देश इस संधि के नियमों को मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं।
विशेषज्ञ की राय: “Might is Right” की स्थिति
Proshanto K Mukherjee, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के विशेषज्ञ हैं, ने इस स्थिति को “might is right” यानी ताकत के आधार पर फैसले लेने वाली स्थिति बताया।
उनके अनुसार, चूंकि दोनों देश UNCLOS के दायरे में नहीं आते, इसलिए वे अपने हित के अनुसार कदम उठा सकते हैं—चाहे वह नौसैनिक नाकाबंदी हो या जहाजों की जांच।
Strait of Hormuz: कानून से ज्यादा रणनीति
Strait of Hormuz केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है। दुनिया के लगभग 20% तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है।
ऐसे में यहां होने वाला हर कदम:
- अंतरराष्ट्रीय बाजार को प्रभावित करता है
- तेल की कीमतों को बदलता है
- वैश्विक व्यापार को प्रभावित करता है
इसलिए यहां कानून से ज्यादा रणनीतिक और सैन्य फैसले हावी हो जाते हैं।
Oman की भूमिका: एक और जटिलता
Oman इस जलमार्ग के दूसरे किनारे पर स्थित है और वह UNCLOS का सदस्य है। इसका मतलब है कि किसी भी बातचीत या समाधान में ओमान की भूमिका अहम हो सकती है।
यह स्थिति और जटिल हो जाती है क्योंकि:
- एक पक्ष UNCLOS में है (Oman)
- दो मुख्य पक्ष (US और Iran) इसके बाहर हैं
जहाजों की सुरक्षा: बड़ा सवाल
हाल के घटनाक्रम में यह भी सामने आया है कि इस क्षेत्र में समुद्री खतरों—जैसे पानी में बारूदी सुरंग (mines)—की आशंका बढ़ गई है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है:
क्या जहाज इस जोखिम के बावजूद इस मार्ग से गुजरेंगे?
यदि जहाज इस रास्ते से बचने लगते हैं, तो:
- व्यापार धीमा होगा
- लागत बढ़ेगी
- वैकल्पिक मार्गों पर दबाव बढ़ेगा
टोल वसूली और नया विवाद
एक और दिलचस्प पहलू यह है कि कुछ जहाजों से इस मार्ग के इस्तेमाल के लिए “टोल” लिया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूरी तरह कानूनी ढांचे से बाहर की व्यवस्था है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि United States इस टोल को लेकर ईरान के साथ किसी तरह का समझौता करने की कोशिश कर सकता है।
यदि ऐसा होता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून से हटकर एक नया मॉडल होगा, जो भविष्य में और विवाद पैदा कर सकता है।
क्या ICJ और ITLOS समाधान दे सकते हैं?
इस पूरे विवाद में कानूनी समाधान के रूप में दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सामने आती हैं:
- International Court of Justice
- International Tribunal for the Law of the Sea
विशेषज्ञों के अनुसार:
- ICJ अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायिक मंच है
- ITLOS विशेष रूप से समुद्री कानून से जुड़े मामलों में विशेषज्ञता रखता है
लेकिन यहां भी एक बड़ी चुनौती है—दोनों पक्षों की सहमति के बिना इन मंचों पर फैसला लागू कराना मुश्किल होता है।
वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था पर असर
इस संकट का असर केवल कानूनी या राजनीतिक नहीं है, बल्कि आर्थिक भी है।
मुख्य प्रभाव:
- शिपिंग लागत में वृद्धि
- तेल कीमतों में अस्थिरता
- सप्लाई चेन में बाधा
यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बन सकती है, खासकर उन देशों के लिए जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है क्योंकि:
- वह अपने तेल का बड़ा हिस्सा आयात करता है
- Strait of Hormuz उसके लिए प्रमुख मार्ग है
यदि यहां स्थिति बिगड़ती है, तो:
- ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं
- महंगाई बढ़ सकती है
- व्यापार प्रभावित हो सकता है
निष्कर्ष
Strait of Hormuz में चल रहा संकट यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून हमेशा पर्याप्त नहीं होता, खासकर तब जब बड़े देश उसके दायरे में न हों। UNCLOS की सीमाएं इस मामले में साफ दिखाई दे रही हैं।
ऐसे में समाधान का रास्ता केवल कानून से नहीं, बल्कि कूटनीति, बातचीत और वैश्विक सहयोग से ही निकल सकता है। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक यह संकट “law vs power” के बीच संतुलन की एक जटिल कहानी बना रहेगा।
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