नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में पिछले कुछ दिनों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अमेरिका-ईरान तनाव कम होने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य होने से वैश्विक तेल सप्लाई को लेकर बनी चिंता कम हुई है। इसका असर सीधे कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है और ब्रेंट क्रूड एक बार फिर युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर के आसपास पहुंच गया है।
तेल की कीमतों में आई इस नरमी का सबसे बड़ा फायदा भारत की सरकारी और निजी रिफाइनिंग कंपनियों को मिल सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आने वाले महीनों में क्रूड की कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं तो जुलाई-सितंबर तिमाही में भारतीय रिफाइनरीज के मुनाफे में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसी बीच रूस ने भी अपने कच्चे तेल पर फिर से डिस्काउंट देना शुरू कर दिया है, जबकि ईरान युद्ध के दौरान वह प्रीमियम वसूल रहा था।
युद्ध से पहले के स्तर पर लौटा कच्चा तेल
गुरुवार को बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर करीब 72 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। जून की शुरुआत में यह औसतन 99 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी, जबकि मार्च से मई के बीच तीन महीनों तक कीमतें औसतन 109 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई थीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने के बाद वहां फंसे बड़ी संख्या में तेल टैंकर अब अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। इससे बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ने की संभावना है, जिसके कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
रूस ने फिर शुरू किया डिस्काउंट
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के साथ रूस ने भी भारतीय खरीदारों के लिए फिर से डिस्काउंट देना शुरू कर दिया है। युद्ध के दौरान सप्लाई जोखिम बढ़ने के कारण रूस अपने तेल पर अतिरिक्त प्रीमियम वसूल रहा था। अब बाजार सामान्य होने के साथ भारतीय रिफाइनरीज को पहले की तुलना में कम कीमत पर रूसी तेल मिलने की उम्मीद है।
भारत पहले से ही रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में डिस्काउंट की वापसी भारतीय कंपनियों के लिए लागत घटाने का बड़ा अवसर साबित हो सकती है।
भारतीय रिफाइनरीज को कैसे होगा फायदा?
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां फिलहाल उस कच्चे तेल को प्रोसेस कर रही हैं जिसे उन्होंने ऊंची कीमतों पर खरीदा था। जैसे-जैसे कम कीमत वाला नया तेल रिफाइनरियों तक पहुंचेगा, उनकी रिफाइनिंग लागत घटेगी और मार्जिन बेहतर होंगे।
यदि सरकार पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बदलाव नहीं करती और मार्च में घोषित 10 रुपये प्रति लीटर फ्यूल टैक्स कटौती को वापस नहीं लेती, तो सितंबर तिमाही में रिफाइनिंग कंपनियों की कमाई में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि कम लागत पर खरीदे गए कच्चे तेल और स्थिर खुदरा ईंधन कीमतों का संयोजन रिफाइनिंग कंपनियों के लिए सबसे लाभकारी स्थिति बनाता है।
ईरानी तेल की वापसी भी बढ़ाएगी सप्लाई
बाजार की नजर अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते पर भी बनी हुई है। यदि ईरानी तेल फिर से बड़े पैमाने पर वैश्विक बाजार में लौटता है, तो सप्लाई और बढ़ सकती है। इसके अलावा यूएई की उत्पादन रणनीति और रूस की लगातार सप्लाई भी कीमतों को नियंत्रित रखने में भूमिका निभा सकती है।
हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर अंतिम फैसला आने तक बाजार में कुछ अनिश्चितता बनी रहेगी।
चीन के अगले कदम पर टिकी नजर
दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक चीन पिछले दो महीनों से अपनी खरीदारी में कमी कर रहा है। इसकी वजह से वैश्विक बाजार में मांग अपेक्षाकृत कमजोर रही और कीमतों पर दबाव बना रहा।
लेकिन यदि चीन अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) को भरने के लिए बड़े पैमाने पर खरीद शुरू करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग अचानक बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें फिर से ऊपर जा सकती हैं।
खाड़ी देशों से फिर बढ़ेगी खरीद
भारतीय रिफाइनरीज केवल रूस ही नहीं बल्कि इराक, सऊदी अरब, कुवैत और कतर जैसे पारंपरिक सप्लायर्स से भी टर्म कॉन्ट्रैक्ट के तहत खरीद बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं।
कई रिफाइनिंग कंपनियां पहले ही नए ऑर्डर और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था शुरू कर चुकी हैं। बाकी कंपनियां भी अगले कुछ सप्ताह में पश्चिम एशिया से सामान्य स्तर पर तेल आयात शुरू कर सकती हैं।
क्या आम लोगों को मिलेगा फायदा?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने का असर तुरंत पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर नहीं दिखता। भारत में ईंधन की कीमतें सरकारी टैक्स, रिफाइनिंग लागत, फ्रेट और मार्केटिंग मार्जिन जैसे कई कारकों पर निर्भर करती हैं।
हालांकि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं और सरकार चाहे तो भविष्य में उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है।
आगे क्या रहेगा बाजार का फोकस?
आने वाले दिनों में निवेशकों और तेल कंपनियों की नजर इन प्रमुख घटनाओं पर रहेगी—
- होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सामान्य होती है या नहीं।
- अमेरिका-ईरान समझौते का अंतिम स्वरूप क्या रहता है।
- रूस और ईरान के तेल पर प्रतिबंधों में कोई बदलाव होता है या नहीं।
- चीन कच्चे तेल की खरीद बढ़ाता है या नहीं।
- ओपेक+ देशों की अगली उत्पादन नीति क्या रहती है।
अगर इन मोर्चों पर सप्लाई सामान्य बनी रहती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कुछ समय तक दबाव में रह सकती हैं, जिसका सबसे बड़ा फायदा भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को मिलेगा।


