ईरान और अमेरिका के बीच चल रही उच्च स्तरीय कूटनीतिक वार्ता एक बार फिर ठहराव (stalemate) की स्थिति में पहुंच गई है। इस बीच ईरान के इस्फहान विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर Mohsen Farkhani के बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने दावा किया है कि अमेरिका ने इस बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान से मध्यस्थता (mediation) की गुहार लगाई थी।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया में पहले से ही तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है और वैश्विक शक्तियों के बीच कूटनीतिक खींचतान लगातार बढ़ रही है।
“ईरान को पहले से था अंदाजा कि बातचीत सफल नहीं होगी”
Mohsen Farkhani ने कहा कि ईरान ने इन वार्ताओं में शुरुआत से ही गहरे अविश्वास के साथ हिस्सा लिया था।
उन्होंने कहा:
- ईरानी नेतृत्व को अमेरिकी इरादों पर भरोसा नहीं था
- बातचीत का परिणाम पहले से ही अनुमानित था
- यह ठहराव ईरान के लिए कोई अप्रत्याशित स्थिति नहीं है
उनके अनुसार, यह “नकारात्मक खबर” ईरान के लिए नहीं बल्कि अमेरिका के लिए ज्यादा गंभीर है।
अमेरिका पर सीधा आरोप: लक्ष्य हासिल करने में नाकाम
ईरानी अकादमिक ने दावा किया कि:
- अमेरिका अपने प्रमुख रणनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर सका
- बातचीत में कोई ठोस समझौता नहीं बन पाया
- अमेरिका दबाव बनाकर अपनी शर्तें थोपना चाहता था
उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में अमेरिका को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
पाकिस्तान की भूमिका पर बड़ा विवादित दावा
सबसे चर्चित बयान यह रहा कि अमेरिका ने बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान से मध्यस्थता की गुहार लगाई।
Mohsen Farkhani ने कहा:
“इसीलिए अमेरिका ने पाकिस्तान से इन वार्ताओं में मध्यस्थता करने की गुहार लगाई।”
इस दावे ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हलचल पैदा कर दी है, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
भरोसे की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा
वार्ता विफल होने का मुख्य कारण दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास बताया जा रहा है।
मुख्य मुद्दे:
- ईरान को अमेरिकी नीतियों पर भरोसा नहीं
- अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख में
- दोनों पक्षों की “red lines” एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं
- बातचीत में समान आधार नहीं बन सका
JD Vance का बयान: “समझौता नहीं हो सका”
अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने पुष्टि की कि बातचीत किसी अंतिम समझौते तक नहीं पहुंच सकी।
उन्होंने कहा:
- अमेरिका ने “final and best offer” दिया था
- कुछ मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन अंतिम डील नहीं हुई
- यह स्थिति ईरान के लिए ज्यादा नुकसानदायक हो सकती है
ईरान का पलटवार: “अमेरिका की अत्यधिक मांगें”
ईरानी राज्य मीडिया ने अमेरिका पर आरोप लगाते हुए कहा कि:
- अमेरिका ने बहुत अधिक और सख्त शर्तें रखीं
- ईरान के परमाणु अधिकारों पर दबाव बनाया गया
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक मुद्दों पर विवाद बढ़ा
ईरान का कहना है कि बिना समान आधार के कोई भी समझौता संभव नहीं है।
21 घंटे की मैराथन बातचीत भी नाकाम
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में हुई लगभग 21 घंटे लंबी बातचीत के बावजूद:
- कोई आधिकारिक समझौता नहीं हो सका
- दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहे
- वार्ता बिना निष्कर्ष के समाप्त हो गई
इस बातचीत के बाद अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल वापस लौट गया।
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव
यह कूटनीतिक गतिरोध ऐसे समय में आया है जब:
- पश्चिम एशिया पहले से अस्थिर है
- ऊर्जा आपूर्ति और तेल बाजार पर दबाव है
- वैश्विक व्यापार मार्ग (जैसे Strait of Hormuz) संवेदनशील हैं
- अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में तनाव बढ़ रहा है
निष्कर्ष
अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता एक बार फिर दिखाती है कि दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी समस्या “भरोसे की कमी” है। जहां Mohsen Farkhani अमेरिका की रणनीति और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं अमेरिकी नेतृत्व बातचीत की विफलता का कारण ईरान को बता रहा है।
अब यह देखना होगा कि क्या कोई नया मध्यस्थ इस गतिरोध को खत्म कर पाता है या यह तनाव आगे और बढ़ता है।
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