पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास सप्लाई बाधाओं और इंटरनेशनल क्रूड ऑयल मार्केट में तेज उतार-चढ़ाव ने दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को हिला दिया है। कई देशों में ईंधन की कीमतें 40% से लेकर 100% तक बढ़ चुकी हैं। लेकिन भारत में इसी अवधि के दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर करीब 5% की ही बढ़ोतरी हुई। यही वजह है कि भारत का मॉडल अब वैश्विक स्तर पर चर्चा में है।
हालांकि, हाल के दिनों में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए हैं। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने 15, 19 और 23 मई को चरणबद्ध तरीके से कीमतों की समीक्षा की। इसके बाद पेट्रोल लगभग 4.74 रुपये प्रति लीटर और डीजल करीब 4.82 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ। लेकिन अगर इसकी तुलना दुनिया के बड़े देशों से की जाए तो भारत में बढ़ोतरी काफी सीमित रही।
आखिर दुनिया में ईंधन संकट क्यों बढ़ा?
दुनिया की लगभग 20% तेल सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से गुजरती है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने से इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ब्रेंट क्रूड कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंचा। इसके अलावा शिपिंग कॉस्ट बढ़ी, इंश्योरेंस प्रीमियम महंगा हुआ, डॉलर मजबूत हुआ, तेल आयात करने वाले देशों की लागत बढ़ गई भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए ग्लोबल कीमतों का असर सीधे घरेलू बाजार पर पड़ता है। इसके बावजूद सरकार ने टैक्स कटौती और कीमत नियंत्रण के जरिए झटका सीमित रखने की कोशिश की।
किन देशों में सबसे ज्यादा बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम?
दुनिया के कई देशों में ईंधन कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला। खास बात यह रही कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी इससे बच नहीं पाईं।
पेट्रोल-डीजल कीमतों में बढ़ोतरी का वैश्विक आंकड़ा
| देश | पेट्रोल | डीजल |
|---|---|---|
| म्यांमार | 90%+ | 112%+ |
| मलेशिया | 56%+ | 71%+ |
| पाकिस्तान | 55% | 45% |
| अमेरिका | 44.5% | 48.1% |
| ब्रिटेन | 19%+ | 34%+ |
| फ्रांस | 21% | 31% |
| नेपाल | 38%+ | 59% |
| श्रीलंका | 38%+ | 41%+ |
| चीन | 21%+ | 24% |
| दक्षिण कोरिया | 19% | 26% |
| भारत | लगभग 5% | लगभग 5.3% |
यह आंकड़े दिखाते हैं कि भारत ने दुनिया की तुलना में काफी कम वृद्धि होने दी।
भारत ने कीमतों को कैसे कंट्रोल किया?
भारत में कीमतों को सीमित रखने के पीछे सबसे बड़ा कारण केंद्र सरकार की टैक्स रणनीति रही। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार एक्साइज ड्यूटी में कटौती की।
एक्साइज ड्यूटी कटौती बनी सबसे बड़ा हथियार
केंद्र सरकार ने 2021 के बाद से कई चरणों में पेट्रोल और डीजल पर टैक्स कम किए। मार्च 2026 में भी होर्मुज संकट से पहले पेट्रोल और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर तक एक्साइज कटौती की गई थी। अगर यह कटौती नहीं होती तो आज भारत में पेट्रोल की कीमतें कई शहरों में 120-130 रुपये प्रति लीटर तक जा सकती थीं।
OMCs ने 76 दिनों तक कीमतें क्यों नहीं बढ़ाईं?
IOC, BPCL और HPCL जैसी सरकारी तेल कंपनियों ने करीब 76 दिनों तक घरेलू कीमतों को स्थिर रखा। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव जारी था। विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे तीन बड़े कारण थे:
1. महंगाई को कंट्रोल रखना
अगर ईंधन महंगा होता है तो ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ती है, दूध-सब्जी महंगी होती है, लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ता है, CPI Inflation ऊपर जाता है सरकार नहीं चाहती थी कि महंगाई दोबारा तेज हो।
2. चुनावी और आर्थिक दबाव
ऊंचे पेट्रोल-डीजल दाम सीधे जनता पर असर डालते हैं। इसलिए सरकार ने तेल कंपनियों पर कुछ समय तक दबाव absorb करने का मॉडल अपनाया।
3. टैक्स बफर
केंद्र और कई राज्यों ने टैक्स से मिलने वाले हिस्से में समायोजन कर कीमतों को सीमित रखने की कोशिश की।
अमेरिका और यूरोप भारत से क्यों पीछे रह गए?
अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसी अर्थव्यवस्थाओं में ईंधन कीमतों में तेज उछाल के पीछे कई कारण रहे वहां टैक्स स्ट्रक्चर अलग है, सरकारें सीधे सब्सिडी कम देती हैं, बाजार आधारित मूल्य निर्धारण ज्यादा स्वतंत्र है, डॉलर मजबूत होने के बावजूद रिफाइनिंग लागत बढ़ी अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें कई राज्यों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। वहीं यूरोप में रूस-यूक्रेन संकट और ऊर्जा सप्लाई बाधाओं का असर पहले से बना हुआ था।
पाकिस्तान और श्रीलंका में हालात ज्यादा खराब क्यों हुए?
पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में विदेशी मुद्रा संकट ने स्थिति और खराब कर दी।
पाकिस्तान
डॉलर की भारी कमी, IMF दबाव, सब्सिडी हटानी पड़ी, रुपये की कमजोरी इन वजहों से पेट्रोल 55% तक महंगा हुआ।
श्रीलंका
आर्थिक संकट, विदेशी भंडार की कमी, आयात बाधित, सरकारी वित्तीय दबाव इससे वहां ईंधन की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला।
भारत को आगे किन खतरों से सावधान रहना होगा?
हालांकि भारत ने अभी तक स्थिति संभाल ली है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है।
सबसे बड़े रिस्क
1. ब्रेंट क्रूड 110-120 डॉलर पहुंचना
अगर पश्चिम एशिया संकट और बढ़ता है तो कच्चा तेल और महंगा हो सकता है।
2. डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी
रुपया कमजोर होने पर आयात लागत और बढ़ जाती है।
3. शिपिंग लागत बढ़ना
होर्मुज स्ट्रेट में बाधा बढ़ने से तेल लाने का खर्च तेजी से बढ़ सकता है।
4. OMCs का Margin Pressure
अगर कंपनियां लगातार नुकसान झेलती हैं तो आगे फिर कीमत बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
आम आदमी पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर ईंधन कीमतें आगे बढ़ती हैं तो असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा।
किन चीजों पर असर पड़ेगा?
दूध, सब्जियां, राशन, ऑनलाइन डिलीवरी, कैब किराया, बस किराया, एयर टिकट, FMCG उत्पाद भारत में लॉजिस्टिक्स लागत का बड़ा हिस्सा डीजल आधारित ट्रांसपोर्ट पर निर्भर करता है। इसलिए ईंधन महंगा होने का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखता है।
क्या आगे फिर बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया तनाव लंबा चला, क्रूड 110 डॉलर पार गया, रुपये में और कमजोरी आई तो भारत में फिर कीमत समीक्षा हो सकती है। हालांकि सरकार फिलहाल महंगाई को कंट्रोल में रखने की रणनीति पर काम कर रही है। इसलिए अचानक बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम मानी जा रही है।
निष्कर्ष
दुनिया के कई देशों में जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतें 40% से 100% तक बढ़ीं, वहीं भारत ने टैक्स कटौती, OMC प्रबंधन और नियंत्रित मूल्य रणनीति के जरिए बढ़ोतरी को करीब 5% तक सीमित रखा। लेकिन वैश्विक संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। इसलिए आने वाले महीनों में कच्चे तेल, डॉलर और पश्चिम एशिया की स्थिति पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
Also Read:


