अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की उम्मीद बढ़ने के बाद निवेशकों ने राहत की सांस ली, जिसका असर सीधे तेल बाजार पर दिखाई दिया। ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी WTI क्रूड दोनों करीब दो हफ्ते के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए। इस गिरावट के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का वह बयान माना जा रहा है जिसमें उन्होंने कहा कि ईरान के साथ समझौते पर “काफी हद तक बातचीत पूरी हो चुकी है।”
दो हफ्ते के निचले स्तर पर पहुंचा कच्चा तेल
समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार सुबह अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 4.55% टूटकर 98.83 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 4.73% गिरकर 92.03 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। दोनों बेंचमार्क 7 मई के बाद पहली बार इतने निचले स्तर पर फिसले हैं।
तेल बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब पिछले कई हफ्तों से पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई थी। निवेशकों को डर था कि अगर संघर्ष लंबा चला तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। लेकिन अब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ने की खबरों ने बाजार की धारणा बदल दी है।
ट्रंप के बयान ने बदला बाजार का मूड
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सप्ताहांत में कहा कि अमेरिका, ईरान और कुछ अन्य देशों के बीच एक समझौते पर “काफी हद तक बातचीत पूरी हो चुकी है।” उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित समझौता ज्ञापन (MoU) के जरिए होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा पूरी तरह खोला जा सकता है। हालांकि बाद में ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने वार्ताकारों को किसी भी समझौते में जल्दबाजी नहीं करने की सलाह दी है। इससे संकेत मिला कि बातचीत अभी जारी है और अंतिम समझौते में समय लग सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के शुरुआती बयान ने बाजार में अचानक राहत का माहौल बनाया, जिसके बाद ट्रेडर्स ने तेजी से तेल की खरीद कम की और मुनाफावसूली शुरू कर दी।
क्यों इतना महत्वपूर्ण है होर्मुज जलमार्ग?
Strait of Hormuz दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा समुद्री मार्ग माना जाता है। वैश्विक स्तर पर सप्लाई होने वाले तेल और LNG का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। संघर्ष शुरू होने से पहले दुनिया के लगभग 20% तेल निर्यात और बड़ी मात्रा में LNG शिपमेंट इसी मार्ग से भेजे जाते थे।
अगर यह जलमार्ग पूरी तरह सामान्य हो जाता है तो तेल सप्लाई का दबाव कम होगा, शिपिंग लागत घट सकती है, बीमा खर्च कम हो सकता है, ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौट सकती है इसी उम्मीद ने तेल बाजार को नीचे धकेल दिया।
भारत के लिए क्यों अहम है यह गिरावट?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे रहती हैं तो पेट्रोल-डीजल कीमतों पर दबाव कम हो सकता है सरकार को राहत मिल सकती है, महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी, रुपये पर दबाव कम हो सकता है एयरलाइन, पेंट, टायर और लॉजिस्टिक्स कंपनियों को फायदा मिल सकता है हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ एक दिन की गिरावट से भारत में तुरंत पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं होगा। इसके लिए कीमतों में लगातार नरमी जरूरी होगी।
सप्लाई को लेकर चिंता अभी खत्म नहीं
बाजार में राहत जरूर दिख रही है लेकिन जोखिम अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। मध्य पूर्व में कई ऊर्जा सुविधाएं अब भी प्रभावित हैं और तेल आपूर्ति सामान्य होने में समय लग सकता है।
एमएसटी मार्की (MST Marquee) के विश्लेषक Saul Kavonic ने कहा कि शांति समझौते की उम्मीद ने बाजार को राहत दी है, लेकिन जमीन पर स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में महीनों लग सकते हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि शिपिंग नेटवर्क को सामान्य होने में समय लगेगा, तेल भंडारण और सप्लाई चेन को दोबारा स्थिर करना होगा क्षतिग्रस्त ऊर्जा ढांचे की मरम्मत जरूरी होगी यानी निकट भविष्य में तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
ईरान के यूरेनियम पर बड़ा दावा
इस बीच The New York Times की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान प्रस्तावित समझौते के तहत अपने एनरिच्ड यूरेनियम भंडार को छोड़ने के लिए तैयार हो गया है। अगर यह समझौता आगे बढ़ता है तो यह पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार दोनों के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौता हो जाता है तो:
- तेल सप्लाई में बड़ा सुधार आ सकता है
- वैश्विक महंगाई दबाव कम हो सकता है
- ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौट सकती है
- निवेशकों का भरोसा मजबूत हो सकता है
अब आगे क्या?
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान वार्ता पर टिकी हुई है। अगर आने वाले दिनों में समझौते को लेकर और सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी देखी जा सकती है। लेकिन यदि बातचीत किसी बड़े विवाद में फंसती है तो बाजार फिर से तेजी पकड़ सकता है।
ऊर्जा बाजार के लिए आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम माने जा रहे हैं क्योंकि यही तय करेंगे कि तेल 100 डॉलर के ऊपर टिकेगा या फिर नीचे फिसलना शुरू करेगा।
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