नई दिल्ली: जब ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ था, तब दुनिया भर के ऊर्जा विशेषज्ञों और निवेशकों को डर था कि वैश्विक तेल बाजार में अभूतपूर्व संकट पैदा हो जाएगा। कई विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर से लेकर 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। उस समय यह चिंता पूरी तरह जायज भी थी, क्योंकि दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है।
हालांकि तीन महीने से अधिक समय गुजर जाने के बाद तस्वीर उम्मीद से काफी अलग दिखाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें समय-समय पर बढ़ीं जरूर, लेकिन अधिकांश अवधि में वे 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे ही बनी रहीं। मौजूदा समय में भी कीमतें उन भयावह अनुमानों से काफी दूर हैं, जिन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी और महंगाई के नए दौर की चेतावनी दी थी।
इसका मतलब यह नहीं है कि संकट नहीं आया, बल्कि यह कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और तेल उत्पादक देशों ने कई वैकल्पिक उपायों के जरिए उस बड़े झटके के प्रभाव को सीमित करने में सफलता हासिल की। भारत, चीन, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई और रूस जैसे देशों की रणनीतियों ने मिलकर वैश्विक तेल बाजार को संतुलित बनाए रखा।
होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख तेल उत्पादक देश जैसे सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और ईरान अपने निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से भेजते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा किसी न किसी रूप में इस मार्ग पर निर्भर रहता है। ऐसे में जब यह रास्ता बंद हुआ तो बाजार को लगा कि लाखों बैरल प्रतिदिन तेल की आपूर्ति अचानक रुक जाएगी। यही वजह थी कि कई निवेशकों और ट्रेडिंग हाउसों ने कीमतों में विस्फोटक बढ़ोतरी की भविष्यवाणी की थी।
लेकिन वास्तविकता में कई ऐसे कारक सामने आए जिन्होंने इस संकट को पूर्ण आपूर्ति आपदा बनने से रोक दिया।
पहला बड़ा कारण: अमेरिका बना दुनिया का सबसे बड़ा संकटमोचक
ईरान पर हमले और होर्मुज संकट के बाद अमेरिका ने तेजी से अपनी ऊर्जा रणनीति को सक्रिय किया। दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश होने के कारण अमेरिका के पास उत्पादन बढ़ाने और अतिरिक्त भंडार बाजार में उतारने की क्षमता थी।
मई के दौरान अमेरिकी कच्चे तेल और ईंधन का निर्यात पिछले वर्ष के औसत स्तर से लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन अधिक रहा। इसके अलावा अमेरिकी प्रशासन ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) से भी रिकॉर्ड स्तर पर तेल जारी किया।
ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि अमेरिका यह कदम नहीं उठाता तो वैश्विक बाजार में आपूर्ति की कमी कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी। अमेरिकी तेल कंपनियों ने भी उच्च कीमतों का लाभ उठाते हुए उत्पादन बढ़ाया, जिससे बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध रही।
दूसरा बड़ा कारण: चीन की मांग में अप्रत्याशित गिरावट
दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश चीन इस संकट के दौरान तेल बाजार का सबसे बड़ा संतुलनकारी कारक साबित हुआ।
मई में चीन के तेल आयात में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके पीछे कई कारण रहे। चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री लगातार बढ़ रही है, जिससे पेट्रोल और डीजल की मांग पर दबाव पड़ा है।
इसके अलावा चीन ने कोयले से रसायन बनाने वाली परियोजनाओं में भी निवेश बढ़ाया है। इससे तेल आधारित फीडस्टॉक की आवश्यकता कम हुई। चीन की धीमी आर्थिक गतिविधियों और कमजोर औद्योगिक मांग ने भी तेल खपत को सीमित रखा।
यदि चीन सामान्य स्तर पर तेल खरीद रहा होता तो आज वैश्विक तेल कीमतें कहीं अधिक ऊंचाई पर दिखाई दे सकती थीं।
तीसरा बड़ा कारण: भारत ने बढ़ाई रूसी तेल की खरीद
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। ऐसे में उसकी खरीद रणनीति का वैश्विक बाजार पर बड़ा असर पड़ता है।
होर्मुज संकट के दौरान भारत ने रियायती रूसी तेल का आयात तेजी से बढ़ाया। मई में भारत ने रूस से लगभग 17.6 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा, जो फरवरी के मुकाबले 63 प्रतिशत अधिक था।
रूसी तेल पर उपलब्ध छूट ने भारतीय रिफाइनरियों को सस्ता कच्चा तेल उपलब्ध कराया। इससे भारत की ऊर्जा लागत नियंत्रित रही और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ा।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की यह रणनीति केवल घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार की स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हुई।
चौथा बड़ा कारण: वैकल्पिक सप्लाई रूट और शिपिंग नेटवर्क
कई लोगों को लगा था कि होर्मुज बंद होने का मतलब तेल निर्यात पूरी तरह ठप हो जाना है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सऊदी अरब ने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के माध्यम से तेल को सीधे लाल सागर तक पहुंचाना शुरू किया। वहीं यूएई ने फुजैराह पोर्ट के जरिए खाड़ी क्षेत्र के बाहर तेल निर्यात जारी रखा।
इसके अलावा विभिन्न वैकल्पिक समुद्री मार्गों और विशेष शिपिंग व्यवस्थाओं के माध्यम से कुछ मात्रा में तेल परिवहन जारी रहा। बाजार को पूरी तरह आपूर्ति से वंचित नहीं होने दिया गया।
यही कारण है कि जिस संकट को आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा सप्लाई शॉक कहा जा रहा था, वह वास्तविक कीमतों में उतना बड़ा विस्फोट नहीं ला सका जितना अनुमान लगाया गया था।
क्या 300 डॉलर प्रति बैरल की भविष्यवाणी पूरी तरह गलत थी?
ऊर्जा बाजार में भविष्यवाणियां अक्सर सबसे खराब संभावित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जाती हैं। जब होर्मुज बंद हुआ था, तब यह माना गया था कि वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी और प्रमुख उपभोक्ता देश बड़ी मात्रा में तेल खरीदना जारी रखेंगे।
लेकिन वास्तविकता में अमेरिका ने निर्यात बढ़ाया, चीन की मांग घटी, भारत ने रूसी तेल खरीदा और खाड़ी देशों ने वैकल्पिक मार्ग सक्रिय कर दिए। इन घटनाओं ने बाजार के संतुलन को बनाए रखा।
इसी वजह से तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक नहीं पहुंच सकीं।
लेकिन क्या खतरा वास्तव में टल गया है?
यही वह सवाल है जो आज ऊर्जा बाजार को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है।
कमोडिटी विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान स्थिरता अस्थायी हो सकती है। पैसिफिक इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनी (PIMCO) के विश्लेषकों के अनुसार वैश्विक तेल भंडार लगातार घट रहे हैं। अनुमान है कि हर सप्ताह 7 से 8 करोड़ बैरल तेल का स्टॉक कम हो रहा है।
उधर अमेरिका के रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडार भी पिछले दो दशकों के निचले स्तरों के आसपास पहुंच चुके हैं। इसका मतलब यह है कि संकट लंबा खिंचने पर अतिरिक्त सुरक्षा कवच कमजोर पड़ सकता है।
चीन की वापसी से फिर बढ़ सकता है दबाव
ऊर्जा विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता चीन को लेकर है। यदि चीन की अर्थव्यवस्था में तेजी आती है और तेल आयात फिर से सामान्य स्तर पर पहुंचता है तो वैश्विक बाजार में मांग अचानक बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में मौजूदा सीमित आपूर्ति के साथ संतुलन बिगड़ सकता है। तब कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
कई विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में तेल बाजार का सबसे बड़ा निर्धारक कारक चीन की मांग ही होगी।
NewsJagran Analysis
होर्मुज संकट ने यह साबित कर दिया है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीला हो चुका है। अमेरिका की बढ़ती उत्पादन क्षमता, भारत की आयात रणनीति, चीन की बदलती ऊर्जा खपत और खाड़ी देशों के वैकल्पिक निर्यात मार्गों ने मिलकर उस बड़े ऊर्जा झटके को सीमित कर दिया जिसकी आशंका जताई जा रही थी।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि खतरा पूरी तरह समाप्त हो गया है। यदि चीन की मांग दोबारा बढ़ती है, अमेरिका के भंडार और घटते हैं या खाड़ी क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है, तो तेल बाजार में एक नई तेजी देखने को मिल सकती है। इसलिए फिलहाल 300 डॉलर प्रति बैरल की भविष्यवाणी भले गलत साबित हुई हो, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।
तेल की कीमतों का अगला बड़ा रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि भू-राजनीतिक तनाव कितनी जल्दी कम होता है और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की मांग किस दिशा में जाती है। फिलहाल दुनिया ने तेल का महातूफान टाल दिया है, लेकिन ऊर्जा बाजार के सामने चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं।


