भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से बदली है, उसका सबसे बड़ा और सबसे दिखाई देने वाला उदाहरण अब स्मार्टफोन सेक्टर बन चुका है। खासकर Apple के iPhone का भारत से निर्यात जिस स्तर तक पहुंच गया है, उसने पारंपरिक निर्यात सेक्टर्स—जैसे हीरे, ईंधन और दवाइयों—को भी पीछे छोड़ दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में भारत से iPhone निर्यात ₹2 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है, जो न केवल एक रिकॉर्ड है बल्कि भारत की औद्योगिक रणनीति की सफलता का ठोस संकेत भी है।
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे सरकार की Production Linked Incentive Scheme (PLI) योजना, वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव, और कंपनियों की “चीन+1” रणनीति जैसे कई बड़े फैक्टर काम कर रहे हैं। इस पूरी कहानी को समझना जरूरी है, क्योंकि यह केवल एक कंपनी की सफलता नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक ट्रांसफॉर्मेशन का संकेत है।
कैसे ₹0 से ₹2 लाख करोड़ तक पहुंचा iPhone निर्यात

अगर हम पिछले पांच वर्षों का डेटा देखें, तो तस्वीर बेहद दिलचस्प नजर आती है। कुछ साल पहले तक भारत से iPhone निर्यात लगभग नगण्य था। लेकिन PLI स्कीम लागू होने के बाद इसमें विस्फोटक वृद्धि देखने को मिली।
FY22 में जहां निर्यात करीब ₹9,351 करोड़ था, वहीं FY23 में यह बढ़कर ₹44,000 करोड़ से ज्यादा हो गया। FY24 में यह ₹85,000 करोड़ के पार पहुंचा और FY25 में लगभग ₹1.5 लाख करोड़ हो गया। अब FY26 में यह आंकड़ा ₹2 लाख करोड़ के पार चला गया है।
इस तरह महज 4-5 सालों में भारत दुनिया के बड़े iPhone एक्सपोर्ट हब में बदल गया है। यह ग्रोथ किसी एक साल की नहीं, बल्कि लगातार बनी हुई ट्रेंड का हिस्सा है।
कुल स्मार्टफोन निर्यात में iPhone का दबदबा
FY26 में भारत से कुल स्मार्टफोन निर्यात लगभग ₹2.6 लाख करोड़ (करीब 29.4 अरब डॉलर) रहा। इसमें iPhone की हिस्सेदारी करीब 75% यानी ₹2 लाख करोड़ से अधिक है।
इसका मतलब साफ है—भारत का स्मार्टफोन निर्यात अब काफी हद तक Apple-ड्रिवन हो चुका है। यह एक तरफ मजबूत अवसर दिखाता है, लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी उठाता है कि क्या भारत को अन्य ब्रांड्स और सेगमेंट्स में भी उतनी ही मजबूती लानी चाहिए?
हीरे, ईंधन और दवाइयों को पीछे छोड़ने का मतलब
भारत पारंपरिक रूप से जिन सेक्टर्स में मजबूत रहा है—जैसे डायमंड कटिंग, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और फार्मास्यूटिकल्स—उनकी तुलना में iPhone का निर्यात अब सबसे ऊपर पहुंच गया है।
- ऑटोमोटिव डीजल फ्यूल का निर्यात लगभग 14.5 अरब डॉलर
- डायमंड निर्यात करीब 11.2 अरब डॉलर
- दवाइयां लगभग 10 अरब डॉलर
इन सभी को पीछे छोड़कर iPhone का निर्यात 22 अरब डॉलर से ज्यादा पहुंच गया है। इसका मतलब यह है कि भारत का निर्यात ढांचा धीरे-धीरे लो-वैल्यू से हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग की ओर शिफ्ट हो रहा है।
PLI स्कीम: गेम-चेंजर कैसे बनी?
सरकार की PLI स्कीम का उद्देश्य साफ था—भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और कंपनियों को प्रोडक्शन के आधार पर इंसेंटिव देना।
इस स्कीम के तहत कंपनियों को जितना ज्यादा उत्पादन और निर्यात, उतना ज्यादा लाभ। इसका सीधा असर यह हुआ कि वैश्विक कंपनियों ने भारत में बड़े पैमाने पर निवेश शुरू किया।
Apple ने भी अपने कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स—जैसे Foxconn, Pegatron—के जरिए भारत में उत्पादन बढ़ाया। तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में बड़े प्लांट्स स्थापित किए गए, जहां अब लाखों यूनिट्स का उत्पादन हो रहा है।
‘चीन+1’ रणनीति और भारत का फायदा
कोविड-19 के बाद और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के साथ कंपनियों ने अपनी सप्लाई चेन को चीन से बाहर diversify करना शुरू किया। इसे ‘China+1 strategy’ कहा जाता है।
भारत इस रणनीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभरा है। बेहतर नीतियां, बड़ा घरेलू बाजार, और कुशल श्रमबल—इन तीनों ने मिलकर भारत को एक आकर्षक विकल्प बना दिया।
Apple जैसे ब्रांड के लिए भारत सिर्फ एक मैन्युफैक्चरिंग बेस नहीं, बल्कि एक बड़ा कंज्यूमर मार्केट भी है। इसलिए यहां निवेश करना कंपनी के लिए दोहरा फायदा देता है।
रोजगार और इकोनॉमी पर असर
iPhone मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के बढ़ने का असर सिर्फ एक्सपोर्ट नंबर तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है।
- हजारों प्रत्यक्ष रोजगार (फैक्ट्रियों में)
- लाखों अप्रत्यक्ष रोजगार (लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन, सर्विस सेक्टर)
- राज्यों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट
तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में इलेक्ट्रॉनिक्स क्लस्टर तेजी से विकसित हो रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय विकास को भी गति मिल रही है।
क्या जोखिम भी हैं?
हालांकि यह सफलता प्रभावशाली है, लेकिन कुछ जोखिम भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है।
सबसे बड़ा जोखिम है—एक ही कंपनी पर अत्यधिक निर्भरता। अगर किसी कारण से Apple अपनी रणनीति बदलता है या उत्पादन किसी अन्य देश में शिफ्ट करता है, तो इसका असर भारत के निर्यात पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, वैल्यू एडिशन का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अभी भी कई कंपोनेंट्स विदेश से आयात किए जाते हैं। अगर भारत को वास्तविक लाभ बढ़ाना है, तो उसे सेमीकंडक्टर्स, चिप्स और हाई-एंड कंपोनेंट्स में भी आत्मनिर्भर बनना होगा।
आगे का रास्ता: क्या भारत बन सकता है ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब?
iPhone निर्यात की यह सफलता एक शुरुआत है, अंत नहीं। अगर भारत इसी दिशा में आगे बढ़ता है, तो वह सिर्फ स्मार्टफोन ही नहीं, बल्कि अन्य हाई-टेक सेक्टर्स में भी ग्लोबल हब बन सकता है।
सरकार अब सेमीकंडक्टर मिशन, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और डिफेंस प्रोडक्शन जैसे क्षेत्रों पर भी जोर दे रही है। अगर इन क्षेत्रों में भी इसी तरह की सफलता मिलती है, तो भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई ऊंचाई मिल सकती है।
निष्कर्ष
₹2 लाख करोड़ के पार पहुंचा iPhone निर्यात केवल एक आंकड़ा नहीं है—यह भारत के बदलते आर्थिक मॉडल का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सही नीतियों, वैश्विक अवसरों और उद्योग के सहयोग से भारत हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।
अब असली चुनौती इस गति को बनाए रखने और इसे व्यापक बनाने की है—ताकि भारत केवल एक ‘मैन्युफैक्चरिंग बेस’ नहीं, बल्कि एक पूर्ण टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम बन सके।
Also Read:


