भारत में सोना सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि परंपरा, सुरक्षा और निवेश—तीनों का मिश्रण है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक, हर अवसर पर सोना खरीदा जाता है और पीढ़ियों तक संभालकर रखा जाता है। लेकिन यही सोना देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक “निष्क्रिय संपत्ति” (idle asset) भी बन जाता है, क्योंकि यह घरों और मंदिरों में बंद रहता है और आर्थिक गतिविधियों में शामिल नहीं हो पाता।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए Gem and Jewellery Council of India (GJC) ने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है—मौजूदा Gold Monetisation Scheme (GMS) को पूरी तरह डिजिटल सिस्टम में बदला जाए, ताकि घरों में पड़े करीब 25,000 टन सोने को बैंकिंग सिस्टम में लाया जा सके और उससे लोगों को ब्याज भी मिले।
यह प्रस्ताव केवल एक नीति बदलाव नहीं, बल्कि भारत के वित्तीय ढांचे में एक संभावित बड़ा बदलाव हो सकता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह योजना क्या है, इसमें क्या बदलाव प्रस्तावित हैं, और इसका असर आम लोगों और देश की अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ेगा।
भारत के पास कितना “छुपा हुआ” सोना है?

ग्लोबल संस्थाओं के अनुमान के मुताबिक, भारत में घरों और मंदिरों में लगभग 25,000 टन सोना जमा है। यह मात्रा इतनी बड़ी है कि इसे अगर आर्थिक प्रणाली में शामिल किया जाए, तो यह देश की जीडीपी के बड़े हिस्से के बराबर मूल्य पैदा कर सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता है, लेकिन अपनी जरूरत का अधिकांश सोना आयात करता है। यानी एक तरफ देश में भारी मात्रा में सोना पड़ा है, और दूसरी तरफ हर साल अरबों डॉलर का सोना विदेश से खरीदा जाता है।
यहीं से Gold Monetisation Scheme का महत्व सामने आता है।
Gold Monetisation Scheme: उद्देश्य और हकीकत
भारत सरकार ने 2015 में Gold Monetisation Scheme शुरू की थी। इसका उद्देश्य था कि लोग अपने घरों में रखा सोना बैंकों में जमा करें और उसके बदले ब्याज कमाएं। बैंक इस सोने को रिफाइन करके ज्वैलर्स या इंडस्ट्री को दे सकते थे, जिससे नए सोने के आयात की जरूरत कम हो।
लेकिन यह योजना अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई।
इसके पीछे कई कारण रहे:
- लोगों का भावनात्मक लगाव (गहनों को पिघलाने का डर)
- जटिल प्रक्रिया और सीमित पहुंच
- कम जागरूकता
- ज्वैलर्स और बैंकों के बीच समन्वय की कमी
इसी वजह से अब GJC इस योजना को पूरी तरह बदलने की बात कर रहा है।
GJC का डिजिटल मॉडल: क्या बदलेगा?
GJC का प्रस्ताव पारंपरिक मॉडल से बिल्कुल अलग है। इसमें फोकस “डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन” पर है।
इस नए मॉडल के तहत:
- ग्राहकों का फिजिकल गोल्ड (गहने, सिक्के, बिस्किट) डिजिटल बैलेंस में बदला जाएगा
- यह बैलेंस बैंक अकाउंट की तरह ट्रैक होगा
- सोना बेचे बिना उस पर ब्याज मिलेगा
- ज्वैलर्स, रिफाइनर्स और बैंक—तीनों को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जाएगा
इस पूरी प्रक्रिया में टेक्नोलॉजी का बड़ा रोल होगा, जिससे पारदर्शिता और ट्रैकिंग बेहतर होगी।
‘डीमैट गोल्ड’ का कॉन्सेप्ट: समझिए आसान भाषा में
जैसे शेयर बाजार में स्टॉक्स को डीमैट अकाउंट में रखा जाता है, वैसे ही इस प्रस्ताव में सोने को भी डिजिटल फॉर्म में रखने की बात की गई है।
मान लीजिए आपके पास 100 ग्राम सोना है। इस स्कीम के तहत:
- आपका सोना बैंक या अधिकृत ज्वैलर के पास जमा होगा
- उसकी शुद्धता (purity) जांची जाएगी
- उसके बराबर डिजिटल गोल्ड बैलेंस आपके अकाउंट में दिखेगा
- आपको उस पर ब्याज मिलेगा
इससे आपका सोना सुरक्षित भी रहेगा और कमाई भी करेगा।
ज्वैलर्स की भूमिका क्यों अहम है?
इस बार के प्रस्ताव में ज्वैलर्स को केंद्र में रखा गया है। पहले की योजना में बैंकों की भूमिका ज्यादा थी, लेकिन ज्वैलर्स का जुड़ाव सीमित था।
अब GJC चाहता है कि ज्वैलर्स को रेगुलेटेड डिजिटल नेटवर्क से जोड़ा जाए। इसका फायदा यह होगा कि:
- ग्राहक अपने भरोसेमंद ज्वैलर के जरिए स्कीम में जुड़ सकेंगे
- प्रक्रिया आसान और सुलभ बनेगी
- ज्वैलर्स को भी नए बिजनेस अवसर मिलेंगे
अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
अगर यह योजना सफल होती है, तो इसका असर सिर्फ निवेशकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
1. गोल्ड इंपोर्ट में कमी
भारत हर साल बड़ी मात्रा में सोना आयात करता है। अगर घरेलू सोना ही बाजार में आ जाए, तो आयात घट सकता है।
2. करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) में सुधार
कम आयात का मतलब है कि देश का विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा।
3. बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी
सोना बैंकिंग सिस्टम में आने से वित्तीय संस्थानों के पास अतिरिक्त संसाधन होंगे।
4. निवेशकों को फायदा
लोग अपने सोने को बेचे बिना उस पर रिटर्न कमा सकेंगे—यह एक बड़ा बदलाव होगा।
क्या चुनौतियां अभी भी हैं?
हालांकि यह प्रस्ताव आकर्षक लगता है, लेकिन कुछ चुनौतियां अभी भी सामने हैं।
सबसे बड़ी चुनौती है—लोगों का भरोसा जीतना। भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं, भावनात्मक संपत्ति भी है। लोग अपने गहनों को बैंकिंग सिस्टम में देने से हिचकते हैं।
दूसरी चुनौती है—इंफ्रास्ट्रक्चर और रेगुलेशन। इस डिजिटल सिस्टम को लागू करने के लिए मजबूत तकनीकी ढांचा और सख्त निगरानी की जरूरत होगी।
तीसरी चुनौती—ब्याज दर। अगर रिटर्न आकर्षक नहीं होगा, तो लोग स्कीम में भाग नहीं लेंगे।
क्या यह भारत के लिए गेम-चेंजर बन सकता है?
अगर सही तरीके से लागू किया जाए, तो यह योजना भारत के लिए वैसी ही क्रांति ला सकती है जैसी म्यूचुअल फंड या डिजिटल पेमेंट्स ने लाई है।
सोचिए—अगर 25,000 टन में से सिर्फ 10% सोना भी सिस्टम में आ जाए, तो यह हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि पैदा कर सकता है।
निष्कर्ष
Gold Monetisation Scheme को डिजिटल बनाने का प्रस्ताव केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कदम है। यह भारत की उस पुरानी समस्या को हल करने की कोशिश है, जहां बड़ी मात्रा में संपत्ति उपयोग में नहीं आ पाती।
अब सबकी नजर सरकार, Reserve Bank of India और वित्त मंत्रालय के अगले कदम पर होगी। अगर यह योजना सही तरीके से लागू होती है, तो यह न सिर्फ निवेशकों के लिए बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
आखिरकार, असली सवाल यही है—क्या भारत अपने घरों में बंद पड़े सोने को “डेड एसेट” से “इनकम जनरेटिंग एसेट” में बदल पाएगा? आने वाले समय में इसका जवाब साफ हो जाएगा।
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