भारत पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, लेकिन इसके बावजूद देश से रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का निर्यात लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और सप्लाई चेन में आई रुकावटों ने भारतीय रिफाइनरियों के लिए कई नए विदेशी बाजार खोल दिए हैं। इटली, स्पेन और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों के साथ-साथ सिंगापुर, तंजानिया और दक्षिण अफ्रीका को भारत से पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की सप्लाई में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है।
हाइलाइट्स
- पश्चिम एशिया संकट से भारतीय रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की मांग बढ़ी
- इटली और स्पेन को पेट्रोलियम एक्सपोर्ट में जबरदस्त उछाल
- सिंगापुर भारत के प्रमुख पेट्रोलियम एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन में शामिल
- तंजानिया और दक्षिण अफ्रीका भी टॉप डेस्टिनेशन की सूची में आए
- यूरोप में भारतीय रिफाइंड फ्यूल की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी
भारत के लिए क्यों बढ़ी पेट्रोलियम एक्सपोर्ट की मांग?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88% हिस्सा आयात करता है। इसके बाद देश की रिफाइनरियां कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों में बदलती हैं। इन रिफाइंड प्रोडक्ट्स का एक बड़ा हिस्सा घरेलू बाजार में इस्तेमाल होता है, जबकि कुछ मात्रा विदेशों को निर्यात की जाती है।
पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी। कच्चे तेल की कीमतें करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। कई देशों को पारंपरिक सप्लायरों से पर्याप्त मात्रा में पेट्रोलियम उत्पाद नहीं मिल पा रहे थे। ऐसे में भारतीय रिफाइनरियों ने इन बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई।
इसका सीधा असर भारत के पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के निर्यात पर देखने को मिला।
इटली को पेट्रोलियम एक्सपोर्ट में 200 गुना से ज्यादा उछाल
भारत से इटली को होने वाले पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में सबसे बड़ा उछाल देखने को मिला है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इटली को पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का निर्यात पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में करीब 2 मिलियन डॉलर था। इस साल की समान अवधि में यह बढ़कर लगभग 478 मिलियन डॉलर पहुंच गया।
यानी सिर्फ एक साल में निर्यात मूल्य में 200 गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है।
यह आंकड़ा बताता है कि यूरोप के देशों में भारतीय रिफाइनरियों से मिलने वाले पेट्रोलियम उत्पादों की मांग किस तेजी से बढ़ी है।
स्पेन को निर्यात 63 गुना बढ़ा
स्पेन भी भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों के लिए तेजी से उभरता हुआ बाजार बन गया है।
पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत ने स्पेन को करीब 4 मिलियन डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात किए थे। इस साल पहली तिमाही में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 252 मिलियन डॉलर हो गया।
इस तरह स्पेन को पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट लगभग 63 गुना बढ़ गया।
यूरोप के इन देशों में भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती मांग को पश्चिम एशिया में सप्लाई व्यवधान से जोड़कर देखा जा रहा है।
फ्रांस में भी बढ़ी भारतीय तेल उत्पादों की हिस्सेदारी
फ्रांस को भारत के कुल निर्यात में पेट्रोलियम उत्पादों की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है। पिछले साल जहां यह हिस्सेदारी लगभग नगण्य थी, वहीं अब यह करीब 15% तक पहुंच गई है।
स्पेन में भी पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी लगभग 15% के आसपास पहुंच गई है।
इसका मतलब है कि भारत से इन देशों को होने वाले कुल एक्सपोर्ट में पेट्रोलियम उत्पाद अब एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
सिंगापुर बना बड़ा डेस्टिनेशन
एशिया में सिंगापुर भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक बनकर उभरा है।
आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून 2025 में सिंगापुर को भारत के कुल निर्यात में रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की हिस्सेदारी करीब 40% थी। इस साल यह बढ़कर करीब दो-तिहाई हो गई।
सिंगापुर को भारत ने करीब 4.3 अरब डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात किए। इसके साथ ही वह भारतीय तेल उत्पादों के प्रमुख एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन में सबसे ऊपर पहुंच गया है।
पहले नीदरलैंड, यूएई, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजार इस सूची में प्रमुख स्थान रखते थे, लेकिन हालिया बदलावों ने तस्वीर बदल दी है।
तंजानिया को निर्यात में तेल उत्पादों की हिस्सेदारी 77%
अफ्रीकी देश तंजानिया भी भारत के लिए तेजी से महत्वपूर्ण बाजार बन रहा है।
जून तिमाही के अंत तक तंजानिया को भारत के कुल निर्यात में पेट्रोलियम उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 77% हो गई। एक साल पहले यह आंकड़ा लगभग 59% था।
भारत ने तंजानिया को करीब 2.2 अरब डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात किए।
तंजानिया के अलावा दक्षिण अफ्रीका भी भारत के प्रमुख निर्यात बाजारों की सूची में शामिल हुआ है। इससे पता चलता है कि भारतीय रिफाइनरियों के लिए अफ्रीकी बाजार भी तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।
श्रीलंका को भी बढ़ी पेट्रोलियम सप्लाई
भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में भी भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है।
आंकड़ों के अनुसार, श्रीलंका को होने वाले भारत के कुल निर्यात में पेट्रोलियम उत्पादों की हिस्सेदारी एक साल में बढ़कर करीब 32% हो गई, जो पहले लगभग आधी थी।
श्रीलंका जैसे नजदीकी बाजारों के लिए भारत से पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई लॉजिस्टिक्स के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। क्षेत्रीय सप्लाई में बदलाव होने पर भारतीय रिफाइनरियां इन बाजारों को तेजी से सप्लाई कर सकती हैं।
नीदरलैंड को निर्यात में 41% की गिरावट
जहां कई नए बाजारों में भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की मांग बढ़ी है, वहीं कुछ पारंपरिक बाजारों में निर्यात कमजोर भी हुआ है।
नीदरलैंड इसका प्रमुख उदाहरण है। भारत का पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात इस बाजार में करीब 41% घटकर 2 अरब डॉलर रह गया।
इस बदलाव से पता चलता है कि पश्चिम एशिया संकट के बाद भारतीय पेट्रोलियम निर्यात का भूगोल तेजी से बदल रहा है। पहले जिन बाजारों का हिस्सा बड़ा था, वहां से कुछ मांग दूसरे देशों की ओर शिफ्ट हुई है।
युद्ध ने बदला ग्लोबल पेट्रोलियम ट्रेड का समीकरण
पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। यहां किसी भी बड़े संघर्ष का असर केवल कच्चे तेल की कीमतों पर नहीं पड़ता, बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई पर भी पड़ता है।
युद्ध के दौरान जब कुछ सप्लाई रूट और ट्रेड फ्लो प्रभावित हुए, तब तेल आयात करने वाले देशों ने वैकल्पिक सप्लायरों की तलाश शुरू की। भारत की बड़ी रिफाइनिंग क्षमता ने उसे इस स्थिति में फायदा पहुंचाया।
भारत कच्चा तेल विदेशों से खरीदकर उसे बड़े पैमाने पर रिफाइन करता है। इसके बाद तैयार पेट्रोलियम उत्पादों को घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी भेजा जाता है।
यही वजह है कि संकट के दौरान भारत यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई देशों के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक सप्लायर बनकर उभरा।
भारत के लिए कितना बड़ा मौका?
पश्चिम एशिया संकट ने भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों के सामने नए बाजार खोलने का काम किया है। खासकर यूरोप में इटली, स्पेन और फ्रांस जैसे बाजारों में भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती मांग लंबे समय में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि पेट्रोलियम उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय कारोबार कच्चे तेल की कीमत, रिफाइनिंग मार्जिन, शिपिंग लागत, टैक्स और वैश्विक मांग जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
इसलिए मौजूदा एक्सपोर्ट उछाल को स्थायी ट्रेंड मानने से पहले आने वाली तिमाहियों के आंकड़ों पर नजर रखना जरूरी होगा।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में पैदा हुए संकट ने वैश्विक तेल बाजार का समीकरण बदल दिया है। इसका एक बड़ा फायदा भारत के पेट्रोलियम एक्सपोर्ट सेक्टर को मिला है। इटली, स्पेन और फ्रांस जैसे यूरोपीय बाजारों में भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है, जबकि सिंगापुर और तंजानिया जैसे बाजार अब भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन चुके हैं।
अगर वैश्विक सप्लाई चेन में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है, तो भारतीय रिफाइनरियों को इन नए बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का और मौका मिल सकता है।


