Crude Oil Price: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे दिन तेजी देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने को लेकर बनी अनिश्चितता ने तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान के सामने रखी गई कड़ी मांगों के बाद दोनों देशों के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों को झटका लगा है। इसका सीधा असर ग्लोबल ऑयल मार्केट पर दिखाई दिया और ब्रेंट क्रूड तथा WTI दोनों की कीमतों में रातोंरात करीब 5 फीसदी की तेजी आई।
मंगलवार, 11 अगस्त के एशियाई कारोबार में भी कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सिलसिला जारी रहा। ब्रेंट क्रूड 87 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बंद होने के बाद 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर की ओर बढ़ता नजर आया। वहीं, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI करीब 82 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहा।
लगातार तीसरे दिन चढ़ा कच्चा तेल
कच्चे तेल की कीमतों में यह तेजी ऐसे समय आई है जब बाजार पहले से ही होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंतित है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां से तेल की आवाजाही प्रभावित होने का मतलब दुनिया के कई हिस्सों में सप्लाई को लेकर दबाव बढ़ना है।
सोमवार के कारोबार में ब्रेंट क्रूड और WTI दोनों में लगभग 5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। इसके बाद मंगलवार की शुरुआत में भी कीमतों पर मजबूती बनी रही। ब्रेंट क्रूड 87 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बंद होने के बाद 90 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर की तरफ बढ़ रहा था।
WTI भी 82 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता रहा। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर होर्मुज से तेल की सामान्य आवाजाही जल्द बहाल नहीं होती है तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों पर और दबाव देखने को मिल सकता है।
ट्रंप की मांगों से क्यों बढ़ी चिंता?
कच्चे तेल में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बढ़ी अनिश्चितता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ भविष्य की बातचीत को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को निर्देश दिया है कि वे आगे होने वाली सभी बातचीत में नई मांगों को मजबूती से रखें।
ट्रंप ने यह भी कहा कि उनकी पिछली बैठकों में मुआवजे का मुद्दा कभी नहीं उठाया गया था। हालांकि, ईरान के पुनर्वास और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर का फंड उस 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) का हिस्सा बताया गया है, जिस पर ट्रंप ने जून में फ्रांस में हुए G7 शिखर सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षर किए थे।
इस घटनाक्रम ने बाजार में यह आशंका बढ़ा दी कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जल्द किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच सकती। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की संभावना भी फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है।
ईरान ने होर्मुज को लेकर क्या कहा?
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा है कि ईरान और ओमान इस महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग के भविष्य के प्रशासन को लेकर द्विपक्षीय बातचीत कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका ईरानी बंदरगाहों से अपनी नौसैनिक नाकेबंदी नहीं हटाता, तब तक जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना संभव नहीं होगा।
यही बयान तेल बाजार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की बड़ी मात्रा का परिवहन होता है। यदि यहां से जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक सामान्य नहीं होती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ सकती है।
होर्मुज से बेहद कम संख्या में गुजर रहे जहाज
‘एनर्जी एस्पेक्ट्स’ की फाउंडर और मार्केट इंटेलिजेंस डायरेक्टर अमृता सेन ने ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य से केवल करीब पांच जहाज गुजर रहे हैं।
यह संख्या जून में हुए MoU के बाद दर्ज किए गए करीब 14 जहाजों के दैनिक औसत से काफी कम है। यानी भले ही क्षेत्र में बातचीत के जरिए समाधान खोजने की कोशिशें चल रही हों, लेकिन समुद्री मार्ग से ऊर्जा आपूर्ति अभी सामान्य स्थिति में नहीं लौटी है।
तेल बाजार में कीमतें सिर्फ वर्तमान सप्लाई पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि भविष्य में सप्लाई बाधित होने की आशंका भी कीमतों को प्रभावित करती है। यही वजह है कि होर्मुज से कम जहाजों की आवाजाही ने बाजार में चिंता बढ़ाई है।
ग्लोबल इन्वेंट्री में कमी भी बनी चिंता
TD Securities में कमोडिटी स्ट्रैटेजी के ग्लोबल हेड बार्ट मेलेक के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में कच्चे तेल में तेज ‘शॉर्ट कवरिंग’ देखने को मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि जलडमरूमध्य अभी भी बंद है, ग्लोबल इन्वेंट्री में भारी कमी आई है और तेल का फ्लो सामान्य स्तर के आसपास भी नहीं है। ऐसे माहौल में वे ब्रेंट क्रूड को मौजूदा स्तर से 10-15 डॉलर ऊपर ट्रेड करते हुए देख सकते हैं।
अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो ब्रेंट क्रूड आने वाले समय में 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर की ओर भी दोबारा बढ़ सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही कब सामान्य होती है।
क्या फिर 100 डॉलर के पार जा सकता है क्रूड?
कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी के बीच बाजार की नजर अब 90 डॉलर के स्तर पर है। ब्रेंट अगर इस स्तर के ऊपर मजबूती से टिकता है तो अगले चरण में 95 डॉलर और फिर 100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, 100 डॉलर के पार जाने के लिए सिर्फ भू-राजनीतिक तनाव पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए लंबे समय तक सप्लाई बाधित रहना, ग्लोबल इन्वेंट्री में और गिरावट आना तथा तेल की मांग मजबूत बने रहना भी जरूरी होगा।
दूसरी ओर, अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में प्रगति होती है और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही सामान्य होने लगती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी पर ब्रेक लग सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है और इससे रुपये तथा चालू खाते पर भी दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, पेट्रोल और डीजल की घरेलू कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों का असर तुरंत और पूरी तरह दिखाई देना जरूरी नहीं है। घरेलू ईंधन की कीमतें कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करती हैं, जिनमें टैक्स, रिफाइनिंग लागत, डॉलर-रुपया विनिमय दर और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति शामिल हैं।
लेकिन अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो भारत के लिए ऊर्जा आयात की लागत बढ़ने का जोखिम जरूर बढ़ जाएगा।
महंगे क्रूड से महंगाई का जोखिम
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से माल ढुलाई महंगी हो सकती है और इसका असर कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स, केमिकल, पेंट, टायर और कई अन्य उद्योगों की लागत को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए लंबे समय तक क्रूड महंगा रहने की स्थिति में महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बनने की संभावना रहती है।
दूसरी तरफ, यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बहुत ज्यादा रहती है तो केंद्रीय बैंकों के लिए भी ब्याज दरों से जुड़े फैसले अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
आगे किन बातों पर रहेगी बाजार की नजर?
आने वाले दिनों में कच्चे तेल के बाजार के लिए कुछ घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। सबसे पहले अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की दिशा पर नजर रहेगी। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या और तेल की वास्तविक सप्लाई भी बाजार के लिए अहम संकेत होगी।
इसके साथ ही निवेशक अमेरिकी कच्चे तेल के भंडार, वैश्विक तेल मांग, प्रमुख तेल उत्पादक देशों की उत्पादन नीति और डॉलर की चाल पर भी नजर रखेंगे।
अगर भू-राजनीतिक तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य होने के संकेत मिलते हैं तो हाल की तेजी में मुनाफावसूली हो सकती है। वहीं, यदि तनाव और बढ़ता है तथा होर्मुज के जरिए तेल की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
Crude Oil Price: फिलहाल तेजी का जोखिम बरकरार
कुल मिलाकर, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे दिन आई तेजी ने बाजार का ध्यान फिर से सप्लाई रिस्क और भू-राजनीतिक तनाव की तरफ खींच दिया है। ब्रेंट क्रूड का 90 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ना इस बात का संकेत है कि बाजार फिलहाल अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति को गंभीरता से ले रहा है।
ट्रंप की कड़ी मांगों के बाद समझौते की उम्मीदों में कमी आई है। वहीं, होर्मुज से जहाजों की कम आवाजाही और ग्लोबल इन्वेंट्री में गिरावट ने कीमतों के लिए सपोर्ट बढ़ाया है। यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं होती है तो ब्रेंट में मौजूदा स्तर से और तेजी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, क्रूड ऑयल एक बेहद अस्थिर कमोडिटी है और भू-राजनीतिक घटनाक्रम में अचानक बदलाव से कीमतों की दिशा भी तेजी से बदल सकती है। इसलिए निवेशकों और कारोबारियों को सिर्फ एक दिन की तेजी के आधार पर निर्णय लेने के बजाय सप्लाई, मांग और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर लगातार नजर रखनी चाहिए।
डिस्क्लेमर: newsjagran.in पर प्रकाशित बाजार संबंधी विचार और जानकारी विशेषज्ञों एवं उपलब्ध बाजार आंकड़ों पर आधारित हैं। ये निवेश की सलाह नहीं हैं। कच्चे तेल, कमोडिटी या किसी अन्य वित्तीय उत्पाद में निवेश/ट्रेडिंग से पहले अपने प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें।


