दुनिया इस समय कई तरह के संघर्षों, युद्धों और अनिश्चितताओं से गुजर रही है। ऐसे माहौल में हर देश अपनी-अपनी रणनीति के जरिए हालात को संभालने की कोशिश कर रहा है। लेकिन भारत एक अलग रास्ता दिखाता नजर आ रहा है—एक ऐसा रास्ता जो सिर्फ ताकत या राजनीति पर नहीं, बल्कि संस्कृति, शांति और मानवता के मूल्यों पर आधारित है।
इसी संदर्भ में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की महानिदेशक के. नंदिनी सिंगला ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उनका कहना है कि आज के दौर में भारतीय मूल्य और सभ्यता की सोच पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गई है।
ICCR के 77वें स्थापना दिवस पर क्या कहा गया?
दिल्ली के आजाद भवन में ICCR के 77वें स्थापना दिवस से पहले आयोजित एक प्रेस वार्ता में के. नंदिनी सिंगला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत हमेशा से शांति, सद्भाव और सार्वभौमिक भाईचारे का समर्थक रहा है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि जब दुनिया युद्ध और तनाव से जूझ रही हो, तब भारत की सोच—जो सभी को साथ लेकर चलने की बात करती है—एक संतुलित और सकारात्मक दिशा दिखाती है।
सिंगला का यह बयान सिर्फ एक औपचारिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि यह भारत की उस गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है, जो सदियों से दुनिया को एक परिवार मानने की सोच पर आधारित रही हैं।
‘वसुधैव कुटुम्बकम’ सिर्फ शब्द नहीं, एक विचारधारा
सिंगला ने अपने बयान में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह कोई घिसा-पिटा वाक्य नहीं है, बल्कि एक ऐसा विचार है जिसे दुनिया का हर व्यक्ति महसूस कर सकता है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का अर्थ है—पूरी पृथ्वी एक परिवार है। इस विचार के अनुसार, कोई भी देश या समाज दूसरों को नुकसान पहुंचाकर खुद तरक्की नहीं कर सकता। सभी की भलाई में ही अपनी भलाई छिपी होती है।
आज जब देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और टकराव बढ़ रहे हैं, यह सोच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल सहयोग और समझदारी से ही संभव है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की भूमिका
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाई है। चाहे G20 की अध्यक्षता हो या वैश्विक मुद्दों पर संतुलित रुख, भारत ने हमेशा संवाद और सहयोग को प्राथमिकता दी है।
भारत की विदेश नीति में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि वह किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना चाहता है। यही कारण है कि भारत की बात को आज दुनिया गंभीरता से सुन रही है।
ICCR जैसे संस्थान इस दिशा में अहम भूमिका निभाते हैं। यह संस्था दुनिया के विभिन्न देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करती है और भारतीय मूल्यों को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने का काम करती है।
सांस्कृतिक कूटनीति: भारत की सॉफ्ट पावर
आज के दौर में केवल सैन्य ताकत ही किसी देश की शक्ति नहीं होती, बल्कि उसकी संस्कृति, विचारधारा और मूल्यों की भी उतनी ही अहमियत होती है। इसे ही ‘सॉफ्ट पावर’ कहा जाता है।
भारत की सॉफ्ट पावर उसकी प्राचीन सभ्यता, योग, आयुर्वेद, लोकतांत्रिक परंपराओं और विविधता में एकता जैसे मूल्यों से आती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ इसी सॉफ्ट पावर का सबसे मजबूत उदाहरण है।
ICCR इन मूल्यों को दुनिया तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके जरिए भारत न केवल अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है, बल्कि अन्य देशों के साथ विश्वास और सहयोग के रिश्ते भी बनाता है।
क्यों बढ़ रही है भारतीय विचारधारा की प्रासंगिकता?
आज की दुनिया कई चुनौतियों का सामना कर रही है—जैसे युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक तनाव। ऐसे में एक ऐसी सोच की जरूरत है जो विभाजन नहीं, बल्कि एकता की बात करे।
भारतीय विचारधारा इसी दिशा में एक समाधान प्रस्तुत करती है। यह हमें सिखाती है कि विकास केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सबके लिए होना चाहिए। यह सोच दीर्घकालिक शांति और स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।
के. नंदिनी सिंगला का बयान इसी बात को रेखांकित करता है कि भारत के पास दुनिया को देने के लिए केवल आर्थिक या राजनीतिक ताकत ही नहीं, बल्कि एक मानवीय दृष्टिकोण भी है।
निष्कर्ष
ICCR के स्थापना दिवस के मौके पर दिया गया यह बयान एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—कि वैश्विक तनाव के इस दौर में भारत की सांस्कृतिक और मानवीय सोच पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम’ केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक समाधान है, जो दुनिया को एक बेहतर और शांतिपूर्ण दिशा में ले जा सकता है। भारत की यही पहचान और यही ताकत उसे वैश्विक मंच पर अलग बनाती है।
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