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₹28,000 करोड़ तक का नुकसान! कार्ट में खुद जुड़ रहे प्रोडक्ट, छिपे चार्ज और ट्रिक्स से कैसे-कितना पैसा गंवा रहे भारतीय?

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 7:19 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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नई दिल्ली। ऑनलाइन शॉपिंग ने लोगों की जिंदगी को पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। अब कपड़ों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, किराना सामान और हवाई टिकट तक सब कुछ कुछ क्लिक में घर पहुंच जाता है। लेकिन इस सुविधा के पीछे एक ऐसा डिजिटल जाल भी तेजी से फैल रहा है, जो हर साल करोड़ों भारतीयों की जेब पर भारी पड़ रहा है। इसे “डार्क पैटर्न” कहा जाता है।

Contents
क्या होता है डार्क पैटर्न?हर महीने कितने पैसे गंवा रहे हैं ग्राहक?छिपे शुल्क क्यों बन रहे सबसे बड़ी समस्या?कार्ट में खुद कैसे जुड़ जाते हैं प्रोडक्ट?लोग पहचानते हैं फिर भी क्यों फंस जाते हैं?शिकायत करने पर कितना मिलता है समाधान?किन सेक्टरों में सबसे ज्यादा खतरा?भारत सरकार और नियामकों की नजरआम उपभोक्ता खुद को कैसे बचाएं?डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा

मार्केट रिसर्च फर्म Datum Intelligence की हालिया रिपोर्ट ‘Dark Patterns in India’ के अनुसार, देश के ऑनलाइन उपभोक्ताओं को इन भ्रामक डिजिटल तकनीकों की वजह से हर साल करीब 25,000 करोड़ से 28,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा है। रिपोर्ट बताती है कि भारत के लगभग 30.4 करोड़ ऑनलाइन खरीदारों में से 88 प्रतिशत किसी न किसी रूप में डार्क पैटर्न का शिकार हो रहे हैं।

यह आंकड़ा सिर्फ वित्तीय नुकसान की कहानी नहीं बताता, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता विश्वास किस तरह प्रभावित हो रहा है।

क्या होता है डार्क पैटर्न?

डार्क पैटर्न ऐसे डिजिटल डिजाइन और इंटरफेस होते हैं जिन्हें जानबूझकर इस तरह बनाया जाता है कि उपभोक्ता वह फैसला ले ले जो सामान्य परिस्थितियों में शायद नहीं लेता। इनका मुख्य उद्देश्य ग्राहक से अधिक पैसा खर्च करवाना, अतिरिक्त डेटा हासिल करना या किसी सेवा के लिए मजबूर करना होता है।

उदाहरण के तौर पर कई बार ग्राहक किसी वेबसाइट पर एक उत्पाद खरीदने जाता है और भुगतान के अंतिम चरण में अचानक अतिरिक्त शुल्क जुड़ जाते हैं। कई बार कार्ट में बिना अनुमति कोई अतिरिक्त उत्पाद जोड़ दिया जाता है। कुछ प्लेटफॉर्म सीमित समय का फर्जी ऑफर दिखाकर ग्राहक पर तुरंत खरीदारी का दबाव बनाते हैं।

उपभोक्ता को यह महसूस कराया जाता है कि यदि उसने तुरंत निर्णय नहीं लिया तो वह किसी बड़े लाभ से वंचित रह जाएगा। यही मनोवैज्ञानिक दबाव डार्क पैटर्न का सबसे बड़ा हथियार है।

हर महीने कितने पैसे गंवा रहे हैं ग्राहक?

रिपोर्ट के अनुसार, डार्क पैटर्न से प्रभावित प्रत्येक ग्राहक औसतन 78 से 87 रुपये प्रति माह का नुकसान उठा रहा है। पहली नजर में यह रकम छोटी लग सकती है, लेकिन जब इसे करोड़ों उपभोक्ताओं पर लागू किया जाता है तो यह आंकड़ा सालाना 25,000 करोड़ से 28,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।

भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ई-कॉमर्स बाजारों में शामिल है। ऐसे में यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म पारदर्शिता नहीं अपनाते हैं तो यह नुकसान आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक नुकसान रिपोर्ट में बताए गए आंकड़ों से भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि कई उपभोक्ता छोटे नुकसान को पहचान ही नहीं पाते।

छिपे शुल्क क्यों बन रहे सबसे बड़ी समस्या?

Datum Intelligence की रिपोर्ट के मुताबिक, 63 प्रतिशत ऑनलाइन उपभोक्ताओं ने भुगतान प्रक्रिया के दौरान छिपे हुए शुल्क का सामना किया। यह आंकड़ा 2024 में 52 प्रतिशत था, जो दर्शाता है कि समस्या लगातार बढ़ रही है।

ऑनलाइन ट्रैवल बुकिंग में यह समस्या सबसे ज्यादा देखने को मिली। कई बार ग्राहक को शुरुआत में कम कीमत दिखाई जाती है लेकिन अंतिम भुगतान के समय टैक्स, प्लेटफॉर्म शुल्क, सुविधा शुल्क और अन्य चार्ज जोड़ दिए जाते हैं।

इस रणनीति को “ड्रिप प्राइसिंग” कहा जाता है। इसमें वास्तविक कीमत धीरे-धीरे सामने लाई जाती है ताकि ग्राहक बीच में खरीदारी छोड़ने के बजाय भुगतान पूरा कर दे।

कार्ट में खुद कैसे जुड़ जाते हैं प्रोडक्ट?

ऑनलाइन खरीदारी के दौरान कई उपभोक्ताओं ने शिकायत की कि उनकी अनुमति के बिना अतिरिक्त उत्पाद कार्ट में जोड़ दिए गए। उदाहरण के लिए मोबाइल खरीदते समय स्क्रीन प्रोटेक्टर, बीमा योजना या एक्सटेंडेड वारंटी पहले से चयनित मिलती है।

ग्राहक जल्दी में भुगतान कर देता है और बाद में पता चलता है कि उसने ऐसी सेवा के लिए भी पैसा दिया है जिसकी उसे जरूरत ही नहीं थी।

इसे “Forced Action” या “Pre-selected Options” कहा जाता है। रिपोर्ट में पाया गया कि अध्ययन किए गए 73 प्रतिशत प्लेटफॉर्म पर इस तरह की रणनीतियां मौजूद थीं।

लोग पहचानते हैं फिर भी क्यों फंस जाते हैं?

रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष यह है कि 81 प्रतिशत उपभोक्ता डार्क पैटर्न की पहचान कर सकते हैं। इसके बावजूद 85 प्रतिशत लोग वास्तविक खरीदारी के दौरान इन जालों में फंस जाते हैं।

इसके पीछे मुख्य कारण मानव मनोविज्ञान है। जब ग्राहक किसी वस्तु को खरीदने का निर्णय ले चुका होता है, तब वह प्रक्रिया को जल्दी पूरा करना चाहता है। इसी जल्दबाजी का फायदा डिजिटल प्लेटफॉर्म उठाते हैं।

फर्जी काउंटडाउन टाइमर, “केवल 2 पीस बचे हैं”, “अभी 50 लोग देख रहे हैं” या “ऑफर 5 मिनट में खत्म होगा” जैसे संदेश ग्राहक को जल्द निर्णय लेने के लिए प्रेरित करते हैं।

शिकायत करने पर कितना मिलता है समाधान?

जब उपभोक्ताओं को नुकसान होता है तो उनमें से 53 प्रतिशत संबंधित प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज कराते हैं। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि इनमें से सिर्फ 23 प्रतिशत लोगों को संतोषजनक समाधान मिलता है।

इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ता या तो अपना पैसा गंवा देते हैं या फिर शिकायत प्रक्रिया से निराश होकर मामला छोड़ देते हैं।

यही वजह है कि उपभोक्ता संगठनों और डिजिटल अधिकार विशेषज्ञों ने नियामकीय हस्तक्षेप की मांग तेज कर दी है।

किन सेक्टरों में सबसे ज्यादा खतरा?

रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन ट्रैवल बुकिंग प्लेटफॉर्म, क्विक कॉमर्स ऐप और ई-कॉमर्स वेबसाइटें डार्क पैटर्न के मामले में सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र हैं।

ऑनलाइन ट्रैवल सेक्टर में ड्रिप प्राइसिंग प्रमुख समस्या रही। वहीं क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर फॉल्स अर्जेंसी और त्वरित खरीदारी के लिए दबाव बनाने वाली तकनीकें सबसे अधिक पाई गईं।

ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर अतिरिक्त उत्पाद जोड़ना, सब्सक्रिप्शन को डिफॉल्ट रूप से सक्रिय रखना और कैंसिलेशन को जटिल बनाना आम रणनीतियां रहीं।

भारत सरकार और नियामकों की नजर

भारत सरकार और उपभोक्ता मामलों का विभाग पिछले कुछ वर्षों से डार्क पैटर्न पर नजर बनाए हुए हैं। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने पहले भी कई प्रकार के डार्क पैटर्न को उपभोक्ता अधिकारों के खिलाफ बताया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ई-कॉमर्स कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए और सख्त दिशानिर्देश लागू किए जा सकते हैं।

यदि ऐसा होता है तो उपभोक्ताओं को अधिक पारदर्शी कीमतें और बेहतर शिकायत निवारण प्रणाली मिल सकती है।

आम उपभोक्ता खुद को कैसे बचाएं?

ऑनलाइन खरीदारी करते समय हमेशा अंतिम भुगतान पेज को ध्यान से देखें। किसी भी अतिरिक्त शुल्क की जांच करें। कार्ट में मौजूद प्रत्येक उत्पाद की पुष्टि करें और पहले से चयनित विकल्पों को हटाने की आदत डालें।

फर्जी काउंटडाउन और सीमित स्टॉक जैसे संदेशों के दबाव में निर्णय लेने से बचें। यदि कोई ऑफर वास्तव में आकर्षक है तो उसके बारे में अन्य स्रोतों से भी जानकारी लें।

सब्सक्रिप्शन आधारित सेवाओं के नियम और शर्तें पढ़ना भी जरूरी है ताकि बाद में अनचाहे शुल्क से बचा जा सके।

डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा

डार्क पैटर्न सिर्फ उपभोक्ताओं की जेब पर असर नहीं डालते, बल्कि पूरे डिजिटल कॉमर्स इकोसिस्टम के भरोसे को कमजोर करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 36 से 45 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने ऐसे अनुभवों के बाद किसी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कम कर दिया या उसे पूरी तरह छोड़ दिया।

भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है और सरकार भी डिजिटल भुगतान तथा ऑनलाइन व्यापार को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में पारदर्शिता और उपभोक्ता विश्वास बनाए रखना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।

यदि ई-कॉमर्स कंपनियां अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक भरोसे को प्राथमिकता देती हैं, तो यह न सिर्फ उपभोक्ताओं बल्कि पूरे डिजिटल बाजार के लिए फायदेमंद साबित होगा।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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