भारत की सीफूड इंडस्ट्री पिछले कुछ वर्षों में देश की सबसे तेजी से बढ़ती निर्यात इंडस्ट्रीज में शामिल रही है। खासकर झींगा (श्रिम्प) निर्यात ने भारत को दुनिया के प्रमुख समुद्री खाद्य निर्यातकों की सूची में मजबूती से खड़ा किया है। पिछले वित्त वर्ष में रिकॉर्ड निर्यात, नए बाजारों में प्रवेश और अमेरिकी टैरिफ जैसी चुनौतियों से उबरने के बाद ऐसा लग रहा था कि भारतीय सीफूड सेक्टर लगातार विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है। लेकिन इसी बीच एक ऐसी चुनौती सामने आई है जिसने उद्योग, निर्यातकों और सरकार सभी की चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और जापान जैसे प्रमुख बाजारों में भारतीय झींगा खेपों (Consignments) के रिजेक्शन की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसकी मुख्य वजह बैन किए गए एंटीबायोटिक्स के अवशेष (Residues) पाए जाना है। यह समस्या केवल कुछ निर्यातकों तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि यह भारतीय सीफूड उद्योग की वैश्विक विश्वसनीयता और भविष्य की विकास रणनीति के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
रिकॉर्ड एक्सपोर्ट के बाद अचानक क्यों बढ़ी चिंता?
वित्त वर्ष 2025-26 भारतीय सीफूड निर्यात उद्योग के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ। केंद्र सरकार और मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (MPEDA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात बढ़कर 8.46 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 73,890 करोड़ रुपये के बराबर है।
निर्यात की मात्रा भी बढ़कर करीब 19.7 लाख टन तक पहुंच गई। यह उपलब्धि इसलिए और महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि इससे पहले उद्योग को अमेरिकी व्यापार नीतियों और बढ़े हुए टैरिफ के कारण गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।
अमेरिका लंबे समय से भारतीय समुद्री उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के कुल सीफूड निर्यात में अमेरिका का हिस्सा 2.71 अरब डॉलर से अधिक था। यानी कुल निर्यात का एक-तिहाई से भी ज्यादा हिस्सा अमेरिकी बाजार पर निर्भर था।
जब अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय समुद्री उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाए, तब उद्योग विशेषज्ञों को आशंका थी कि भारतीय निर्यात में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। विशेष रूप से आंध्र प्रदेश जैसे राज्य प्रभावित हो सकते थे, जहां से भारत के अधिकांश श्रिम्प निर्यात होते हैं।
लेकिन उद्योग ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया।
अमेरिका पर निर्भरता घटाकर नए बाजारों में बनाई जगह
निर्यातकों ने अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई। सरकार ने भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई।
ऑस्ट्रेलिया ने आठ वर्षों के प्रतिबंध के बाद आंध्र प्रदेश से बिना छिलके वाले प्रॉन्स के आयात को फिर से अनुमति दी। यूरोपीय संघ के साथ नियामकीय स्तर पर लगातार संवाद से भारतीय उत्पादों को बेहतर बाजार पहुंच मिली। रूस और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी भारतीय समुद्री उत्पादों की मांग बढ़ी।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि चीन को भारतीय सीफूड निर्यात मूल्य के आधार पर लगभग 22.7 प्रतिशत बढ़ा। वहीं यूरोपीय संघ को निर्यात करीब 38 प्रतिशत तक बढ़ गया।
इन नए बाजारों ने अमेरिकी मांग में आई कमी की भरपाई करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप भारत का समुद्री खाद्य निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
झींगा बना भारत के समुद्री निर्यात की सबसे बड़ी ताकत
भारतीय समुद्री निर्यात में फ्रोजन श्रिम्प की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। कुल निर्यात आय में अकेले फ्रोजन श्रिम्प का योगदान 5.5 अरब डॉलर से अधिक रहा।
आंध्र प्रदेश इस उद्योग का केंद्र बना हुआ है। राज्य ने वित्त वर्ष 2025-26 में 55.39 लाख टन एक्वाकल्चर उत्पादन दर्ज किया। भारत के कुल झींगा निर्यात में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सा इसी राज्य का रहा।
यही वजह है कि झींगा उद्योग से जुड़ी किसी भी समस्या का असर पूरे भारतीय समुद्री निर्यात क्षेत्र पर पड़ता है।
सरकार का लक्ष्य: पांच साल में 30 अरब डॉलर का निर्यात
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा कि भारत अगले पांच वर्षों में सीफूड निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। यह मौजूदा स्तर से लगभग 2.5 गुना वृद्धि होगी।
सरकार का मानना है कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में विकसित देशों के साथ किए गए कई मुक्त व्यापार समझौते (FTA) भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा करेंगे।
लेकिन सरकार केवल निर्यात की मात्रा बढ़ाने पर ध्यान नहीं दे रही। अब फोकस वैल्यू एडिशन पर भी है।
वर्तमान में भारत के केवल लगभग 12 प्रतिशत समुद्री उत्पादों में ही उल्लेखनीय वैल्यू एडिशन होता है। अधिकांश उत्पाद प्राथमिक अवस्था में निर्यात कर दिए जाते हैं और बाद में चीन, वियतनाम, चिली तथा इक्वाडोर जैसे देशों में उनकी प्रोसेसिंग होती है।
यही कारण है कि सरकार रेडी-टू-ईट उत्पाद, ब्रांडेड समुद्री खाद्य और हाई-वैल्यू प्रोसेसिंग को बढ़ावा देना चाहती है।
जश्न के बीच आया सबसे बड़ा झटका
इसी सकारात्मक माहौल के बीच भारतीय नियामक एजेंसियों के सामने एक गंभीर समस्या आई।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की जांच में पता चला कि कई झींगा फार्मों में ऐसे एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा रहा था जिन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध है।
इनमें प्रमुख रूप से क्लोरैम्फेनिकॉल (Chloramphenicol) और नाइट्रोफ्यूरान (Nitrofuran) शामिल हैं।
अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे बाजार इन पदार्थों के प्रति जीरो-टॉलरेंस नीति अपनाते हैं। यानी इनका अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर भी पाया जाना निर्यात खेप को रिजेक्ट कराने के लिए पर्याप्त है।
रिपोर्ट के अनुसार चार राज्यों में 40 से अधिक झींगा फार्मों में प्रदूषण की समस्या पाई गई। इनमें लगभग 74 प्रतिशत फार्म आंध्र प्रदेश में स्थित थे। इसके बाद ओडिशा, पश्चिम बंगाल और गुजरात का स्थान रहा।
इसी वजह से कुछ बाजारों में भारतीय झींगा खेपों का रिजेक्शन रेट 43 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिसने उद्योग को झटका दिया है।
क्यों खतरनाक हैं ये एंटीबायोटिक्स?
क्लोरैम्फेनिकॉल पर दुनिया के कई देशों में प्रतिबंध है क्योंकि यह इंसानों में अप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है।
इसी प्रकार नाइट्रोफ्यूरान समूह की दवाओं के अवशेष पशु ऊतकों में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोधों में इनके संभावित कैंसरकारी प्रभावों को लेकर चिंताएं जताई गई हैं।
यही कारण है कि विकसित देशों के खाद्य सुरक्षा नियामक इन पदार्थों के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाते हैं।
भारत की वर्षों की मेहनत पर पड़ सकता है असर
भारतीय सीफूड उद्योग ने पिछले कई वर्षों में वैश्विक खरीदारों का भरोसा जीतने के लिए भारी निवेश किया है।
MPEDA, एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (EIC) और अन्य एजेंसियों ने ट्रेसेबिलिटी सिस्टम, रेजिड्यू मॉनिटरिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और रोग प्रबंधन पर व्यापक कार्यक्रम चलाए हैं।
यूरोपीय संघ जैसे बाजारों ने वर्षों की निगरानी और सुधारों के बाद भारतीय उद्योग को अतिरिक्त मंजूरियां दी थीं।
यदि एंटीबायोटिक अवशेषों से जुड़ी घटनाएं लगातार बढ़ती हैं तो यह भरोसा कमजोर हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय खरीदार केवल एक-दो मामलों को नहीं देखते बल्कि पूरे देश की अनुपालन संस्कृति (Compliance Culture) का मूल्यांकन करते हैं।
बढ़ सकती है लागत और जांच
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रिजेक्शन की घटनाएं जारी रहीं तो विदेशी बाजार भारतीय उत्पादों की अतिरिक्त जांच शुरू कर सकते हैं।
इससे कंटेनरों की क्लियरेंस में देरी होगी। अतिरिक्त लैब टेस्ट कराने पड़ सकते हैं। निर्यातकों की लागत बढ़ेगी और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत इस समय उन्हीं प्रीमियम बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है जहां खाद्य सुरक्षा के मानक सबसे कठोर हैं।
आगे क्या करना होगा?
सरकार ने राज्यों को पशु दवा विक्रेताओं की निगरानी बढ़ाने, मार्च 2025 में लगाए गए प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने और उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
लेकिन केवल कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार फार्म स्तर पर जागरूकता बढ़ानी होगी, दवा उपयोग की निगरानी करनी होगी, सप्लाई चेन ट्रेसेबिलिटी मजबूत करनी होगी और गुणवत्ता नियंत्रण को पूरी तरह डिजिटल बनाना होगा।
भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर सकता है और टैरिफ जैसी चुनौतियों से उबर सकता है। अब अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय समुद्री उत्पाद गुणवत्ता के सबसे ऊंचे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भी खरे उतरें।
यही तय करेगा कि 30 अरब डॉलर के निर्यात का सपना हकीकत बनता है या नहीं।


