भारत का जेम्स और ज्वेलरी सेक्टर, जो दशकों से देश के सबसे मजबूत निर्यात क्षेत्रों में गिना जाता है, अब एक दिलचस्प बदलाव के दौर से गुजर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि कुल निर्यात में गिरावट आई है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल बदलाव यह है कि भारत अब एक ही बाजार पर निर्भर रहने के बजाय नई अंतरराष्ट्रीय मार्केट्स की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
Gem and Jewellery Export Promotion Council (GJEPC) के अनुसार, FY26 में भारत का कुल जेम्स और ज्वेलरी एक्सपोर्ट 27.72 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 3.32% कम है। हालांकि रुपये के हिसाब से इसमें हल्की बढ़त दर्ज हुई, जो इस सेक्टर की आंतरिक मजबूती को दिखाती है।
गिरावट क्यों आई? असली वजहें समझना जरूरी है
पहली नजर में यह गिरावट चिंता पैदा कर सकती है, लेकिन इसके पीछे कई वैश्विक और संरचनात्मक कारण हैं।
सबसे बड़ा असर अमेरिका के टैरिफ पॉलिसी बदलाव का रहा। United States लंबे समय से भारत के जेम्स और ज्वेलरी का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। लेकिन बदलती ट्रेड पॉलिसी और बढ़ते शुल्कों ने भारतीय निर्यातकों के लिए प्रतिस्पर्धा को कठिन बना दिया।
इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर “इन्वेंटरी करेक्शन” भी एक अहम कारण रहा। कोविड के बाद कई देशों में स्टॉक ज्यादा हो गया था, जिसे धीरे-धीरे कम किया जा रहा है। इसका सीधा असर नए ऑर्डर्स पर पड़ा।
तीसरी बड़ी वजह है “डिस्क्रेशनरी स्पेंडिंग” में कमी। महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता के चलते लोग लग्ज़री आइटम्स—जैसे ज्वेलरी—पर कम खर्च कर रहे हैं।
लेकिन पूरी तस्वीर नेगेटिव नहीं है
अगर हम गहराई से देखें, तो एक बड़ा पॉजिटिव ट्रेंड सामने आता है—मार्केट डायवर्सिफिकेशन।
United Arab Emirates भारत के लिए एक मजबूत ग्रोथ मार्केट बनकर उभरा है। FY26 में यहां निर्यात 8.70 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें सालाना आधार पर करीब 10.5% की वृद्धि दर्ज की गई।
Australia में तो और भी तेज़ उछाल देखने को मिला—करीब 38% की वृद्धि। यह दिखाता है कि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स और नए बाजारों में प्रवेश भारतीय निर्यातकों के लिए गेम-चेंजर बन सकते हैं।
इसके अलावा हांगकांग और कनाडा जैसे बाजार भी स्थिर मांग दिखा रहे हैं।
सेक्टर के अंदर क्या बदल रहा है?
GJEPC के चेयरमैन Kirit Bhansali के अनुसार, यह सिर्फ एक अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि “स्ट्रक्चरल रीसेट” है।
मतलब—अब सेक्टर खुद को बदल रहा है:
- एक ही देश पर निर्भरता कम हो रही है
- वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स पर फोकस बढ़ रहा है
- और नए ग्राहकों तक पहुंचने के लिए नई रणनीतियां अपनाई जा रही हैं
कौन से प्रोडक्ट्स आगे, कौन पीछे?
डेटा से साफ है कि सभी सेगमेंट एक जैसे प्रदर्शन नहीं कर रहे।
कट और पॉलिश्ड डायमंड्स अब भी सबसे बड़ा सेगमेंट हैं, लेकिन इनमें गिरावट दर्ज की गई। इसकी वजह है कीमतों में दबाव और ग्लोबल डिमांड में कमी।
वहीं गोल्ड ज्वेलरी का प्रदर्शन मिला-जुला रहा। साधारण गोल्ड ज्वेलरी की मांग घटी, क्योंकि सोने की कीमतें ऊंची बनी रहीं। लेकिन स्टडेड ज्वेलरी (रत्न जड़ी ज्वेलरी) में वृद्धि हुई—यह संकेत है कि ग्राहक अब “प्रीमियम वैल्यू” की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।
सबसे दिलचस्प ग्रोथ सिल्वर ज्वेलरी में देखने को मिली, जहां 52% से ज्यादा की बढ़त दर्ज हुई। इसका कारण है इसकी अपेक्षाकृत कम कीमत और बढ़ती वैश्विक मांग।
लैब-ग्रोन डायमंड: उभरता हुआ लेकिन अस्थिर सेगमेंट
लैब-ग्रोन डायमंड्स को लेकर भी तस्वीर दिलचस्प है।
निर्यात मूल्य में गिरावट आई, लेकिन वॉल्यूम बढ़ा। इसका मतलब है कि कीमतें कम हुई हैं, लेकिन मांग बनी हुई है।
यह ट्रेंड बताता है कि आने वाले समय में यह सेगमेंट बड़े बदलाव ला सकता है—खासकर तब, जब उपभोक्ता “सस्टेनेबल और अफोर्डेबल” विकल्प तलाश रहे हैं।
क्षेत्रीय स्तर पर भारत के भीतर कौन आगे?
भारत के भीतर पश्चिमी क्षेत्र—खासकर मुंबई—अब भी इस सेक्टर का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। इसके बाद गुजरात का स्थान है, जहां डायमंड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री का मजबूत आधार है।
यह क्षेत्रीय क्लस्टरिंग भारत की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को मजबूत करती है, क्योंकि यहां स्किल, इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन पहले से विकसित हैं।
आगे क्या? जोखिम और अवसर दोनों
आने वाले समय में इस सेक्टर के सामने दो बड़ी चुनौतियां रहेंगी:
पहली—वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता
दूसरी—टैरिफ और ट्रेड पॉलिसी का जोखिम
लेकिन इसके साथ ही बड़े अवसर भी हैं:
- नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स
- डिजिटल मार्केटप्लेस
- और वैल्यू-एडेड ज्वेलरी की बढ़ती मांग
निष्कर्ष: गिरावट नहीं, बदलाव की शुरुआत
अगर इस पूरे ट्रेंड को एक लाइन में समझें, तो यह “गिरावट” नहीं बल्कि “परिवर्तन” है।
भारत का जेम्स और ज्वेलरी सेक्टर अब एक नए फेज में प्रवेश कर रहा है—जहां फोकस सिर्फ वॉल्यूम पर नहीं, बल्कि वैल्यू, डायवर्सिफिकेशन और स्ट्रेटेजिक ग्रोथ पर है।
सीधी बात—
जो एक्सपोर्टर्स इस बदलाव को समझेंगे और नए बाजारों में कदम बढ़ाएंगे, वही आने वाले दशक में जीतेंगे।
और जो अभी भी पुराने मॉडल—एक ही बाजार पर निर्भरता—पर टिके रहेंगे, उनके लिए समय चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
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