नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी सामने आई है। निवेश और वित्तीय सलाहकार कंपनी Avendus Wealth की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2026-27 में औसतन 90 डॉलर प्रति बैरल तक की ब्रेंट क्रूड कीमत को संभाल सकती है। लेकिन यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक इस स्तर से ऊपर बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर देश की आर्थिक वृद्धि, महंगाई, चालू खाता घाटे और रुपये की स्थिरता पर पड़ सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा एक बड़ा जोखिम मानी जाती है। Avendus Wealth की रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान परिस्थितियों में भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत जरूर है, लेकिन लगातार ऊंची तेल कीमतें कई मोर्चों पर दबाव बढ़ा सकती हैं।
90 डॉलर प्रति बैरल क्यों है महत्वपूर्ण स्तर?
रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना और सरकारी वित्तीय स्थिति को देखते हुए 90 डॉलर प्रति बैरल तक की औसत ब्रेंट क्रूड कीमत को अर्थव्यवस्था झेल सकती है। इसके ऊपर कीमतें लंबे समय तक बनी रहने पर आयात बिल तेजी से बढ़ेगा, जिससे सरकार, कंपनियों और उपभोक्ताओं सभी पर दबाव बढ़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन, बिजली उत्पादन, उर्वरक, रसायन उद्योग और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने से लगभग हर क्षेत्र प्रभावित होता है। यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतों को भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत का एक अहम संकेतक माना जाता है।
Avendus Wealth ने विभिन्न संस्थागत रिसर्च रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा है कि यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि होती है तो भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) करीब 18 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यह देश की GDP का लगभग 0.41 प्रतिशत हिस्सा है।
सिर्फ इतना ही नहीं, कई विश्लेषकों का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड में हर 10 डॉलर की वृद्धि भारत की GDP ग्रोथ को 30 से 35 बेसिस पॉइंट तक कम कर सकती है। यानी यदि तेल लगातार महंगा रहता है तो आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
महंगाई पर भी पड़ेगा सीधा असर
ऊंची ऊर्जा कीमतें आम लोगों की जेब पर भी असर डालती हैं। पेट्रोल, डीजल और गैस महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक दिखाई देता है।
रिपोर्ट में एमके ग्लोबल, स्पार्क कैपिटल और कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज जैसी रिसर्च फर्मों के अनुमानों का उल्लेख किया गया है। इनके अनुसार यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो उपभोक्ता महंगाई दर RBI के आरामदायक दायरे से ऊपर जा सकती है। ऐसी स्थिति में ब्याज दरों में कटौती की संभावना भी कमजोर पड़ सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर है। Avendus Wealth के अनुसार भारत के लगभग 47 प्रतिशत कच्चे तेल, 61 प्रतिशत LPG और 29 प्रतिशत LNG आयात इसी समुद्री मार्ग से होकर आते हैं।
दुनिया के कुल कच्चे तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा भी इसी रास्ते से गुजरता है। यदि किसी भू-राजनीतिक तनाव, सैन्य संघर्ष या अन्य कारणों से होर्मुज स्ट्रेट में बाधा आती है तो वैश्विक तेल कीमतों में अचानक तेज उछाल देखने को मिल सकता है। इसका सबसे बड़ा असर तेल आयातक देशों पर पड़ेगा, जिनमें भारत भी शामिल है।
भारत के पास कौन-कौन सी ताकतें हैं?
हालांकि जोखिम मौजूद हैं, लेकिन रिपोर्ट भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति को मजबूत भी बताती है। देश के पास लगभग 11 महीने के आयात को कवर करने लायक विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। इसके अलावा बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी और सरकार की ओर से जारी पूंजीगत खर्च (Capex) अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रहे हैं।
कॉरपोरेट सेक्टर की बैलेंस शीट भी पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुई है। कंपनियों ने कर्ज कम किया है और नकदी प्रवाह बेहतर बनाया है। इसी वजह से वे अल्पकालिक झटकों को पहले की तुलना में बेहतर तरीके से झेल सकती हैं।
निवेशकों और आम लोगों को क्या समझना चाहिए?
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर लंबे समय तक बना रहता है तो भारत में महंगाई, आयात बिल और चालू खाता घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। इससे शेयर बाजार, रुपये और ब्याज दरों पर भी असर देखने को मिल सकता है।
हालांकि फिलहाल भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, सरकारी निवेश और बेहतर कॉरपोरेट बैलेंस शीट अर्थव्यवस्था को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं। लेकिन निवेशकों और नीति निर्माताओं की नजर आने वाले महीनों में तेल कीमतों और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर बनी रहेगी, क्योंकि यही तय करेगा कि भारत की विकास यात्रा कितनी सहज बनी रहती है।


