बिहार में जमीन से जुड़े कामकाज को लेकर आम लोगों की सबसे बड़ी शिकायत हमेशा यही रही है कि उन्हें अंचल कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं, समय भी लगता है और पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठते हैं। अब राज्य सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर एक बड़ा बदलाव किया है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने सुपौल सहित सभी जिलों में जमीन मापी (Land Survey/Measurement) की प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया है। इसका सीधा मतलब है कि अब जमीन मापी के लिए न तो आपको दफ्तरों के चक्कर लगाने होंगे और न ही रिपोर्ट लेने के लिए इंतजार में भटकना पड़ेगा।
नई व्यवस्था के तहत तय समय सीमा भी निर्धारित कर दी गई है—7 दिनों के भीतर जमीन की मापी और 14 दिनों के अंदर रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।
यह कदम बिहार में ई-गवर्नेंस को मजबूत करने और भूमि प्रबंधन प्रणाली को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बड़ा सुधार माना जा रहा है।
क्या बदला है नई व्यवस्था में?
पहले जमीन मापी की प्रक्रिया पूरी तरह ऑफलाइन थी। आवेदन जमा करने से लेकर मापी और रिपोर्ट प्राप्त करने तक हर चरण में लोगों को सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर लगाने पड़ते थे।
अब नई व्यवस्था में सरकार ने साफ निर्देश जारी किए हैं कि:
- सिर्फ ऑनलाइन आवेदन ही स्वीकार होंगे
- ऑफलाइन आवेदन पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं
- रिपोर्ट भी केवल पोर्टल पर ही उपलब्ध होगी
यदि कोई अधिकारी या अमीन इस नियम का पालन नहीं करता, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
इसका मतलब यह है कि अब पूरी प्रक्रिया डिजिटल ट्रैकिंग के तहत होगी, जिससे भ्रष्टाचार और देरी की संभावना काफी हद तक कम हो जाएगी।
7 दिन में मापी और 14 दिन में रिपोर्ट: कैसे काम करेगा सिस्टम?
नई प्रणाली को टाइम-बाउंड बनाया गया है, ताकि लोगों को लंबे इंतजार से राहत मिल सके।
पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से समझें:
सबसे पहले, जब कोई व्यक्ति ऑनलाइन आवेदन करता है, तो 3 दिनों के भीतर संबंधित अमीन (survey official) की नियुक्ति कर दी जाएगी।
इसके बाद अंचल कार्यालय की ओर से जमीन के संबंधित पक्षों को नोटिस भेजा जाएगा, ताकि मापी के समय कोई विवाद न हो।
फिर सातवें दिन अमीन मौके पर जाकर जमीन की मापी करेगा। इस दौरान उसे जियो-टैग्ड फोटो अपलोड करनी होगी, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि मापी वास्तव में मौके पर ही हुई है।
अंत में, 14 दिनों के भीतर पूरी रिपोर्ट ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड कर दी जाएगी, जिसे आवेदक कहीं से भी डाउनलोड कर सकता है।
निगरानी कैसे होगी?
इस पूरी प्रक्रिया को सिर्फ डिजिटल बनाने से ही काम नहीं चलेगा, इसलिए सरकार ने इसकी निगरानी के लिए भी सख्त व्यवस्था की है।
जिला स्तर पर अपर समाहर्ता (Additional Collector) को इसकी जिम्मेदारी दी गई है।
वे यह सुनिश्चित करेंगे कि:
- हर आवेदन समय पर प्रोसेस हो
- मापी तय समय में पूरी हो
- रिपोर्ट में कोई देरी न हो
इससे जवाबदेही तय होगी और अधिकारियों पर काम समय पर पूरा करने का दबाव भी रहेगा।
आम लोगों को क्या फायदा होगा?
इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा सीधे आम नागरिकों को मिलेगा।
पहला और सबसे अहम फायदा है समय की बचत। अब लोगों को कई दिनों तक दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
दूसरा बड़ा फायदा है पारदर्शिता। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होने से हर स्टेप रिकॉर्ड में रहेगा, जिससे किसी तरह की गड़बड़ी की संभावना कम हो जाएगी।
तीसरा फायदा है भ्रष्टाचार में कमी। पहले मापी के नाम पर देरी या अनावश्यक खर्च की शिकायतें आती थीं, जो अब काफी हद तक खत्म हो सकती हैं।
इसके अलावा, जियो-टैगिंग जैसी तकनीक के इस्तेमाल से यह भी सुनिश्चित होगा कि फर्जी मापी या गलत रिपोर्टिंग की गुंजाइश न रहे।
किन समस्याओं का समाधान होगा?
बिहार में जमीन विवाद एक बड़ी समस्या रही है। अक्सर गलत मापी, रिकॉर्ड में गड़बड़ी या देरी की वजह से विवाद बढ़ जाते हैं।
नई डिजिटल प्रणाली इन समस्याओं को काफी हद तक कम कर सकती है क्योंकि:
- रिकॉर्ड डिजिटल और सुरक्षित होगा
- मापी की प्रक्रिया प्रमाणित होगी
- समय सीमा तय होने से देरी कम होगी
हालांकि, शुरुआती दौर में तकनीकी चुनौतियां या पोर्टल से जुड़ी समस्याएं आ सकती हैं, लेकिन लंबे समय में यह सिस्टम जमीन से जुड़े मामलों को काफी आसान बना देगा।
क्या यह पूरे बिहार में लागू होगा?
हां, यह सिस्टम सिर्फ सुपौल तक सीमित नहीं है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने इसे पूरे बिहार के सभी जिलों में लागू करने का आदेश दिया है।
शुरुआती चरण में कुछ जिलों में इसका परीक्षण हो सकता है, लेकिन धीरे-धीरे यह राज्यभर में पूरी तरह लागू हो जाएगा।
आगे क्या?
यह कदम बिहार में डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में एक बड़ा संकेत है।
अगर यह मॉडल सफल रहता है, तो भविष्य में:
- रजिस्ट्री
- जमीन रिकॉर्ड अपडेट
- म्यूटेशन
जैसे अन्य कार्य भी पूरी तरह ऑनलाइन हो सकते हैं।
निष्कर्ष
बिहार में जमीन मापी प्रक्रिया का ऑनलाइन होना सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम है।
यह सिस्टम अगर सही तरीके से लागू होता है, तो यह न सिर्फ लोगों की परेशानी कम करेगा बल्कि जमीन से जुड़े विवादों को भी काफी हद तक कम कर सकता है।
अब असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन की है—क्योंकि किसी भी नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू होती है।
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