Highlights
- मजबूत अल नीनो की आशंका से कृषि क्षेत्र पर बढ़ा दबाव
- अर्थशास्त्रियों ने 2026-27 में एग्रीकल्चर GDP ग्रोथ शून्य या नकारात्मक रहने की चेतावनी दी
- किसान कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ रहे, लेकिन आय घटने का खतरा
- दाल, तिलहन, कपास और सब्जियों की कीमतों में तेजी की आशंका
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता मांग पर पड़ सकता है व्यापक असर
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित नहीं है। देश की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है और ग्रामीण बाजार एफएमसीजी, ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता वस्तुओं तथा सेवा क्षेत्र की मांग का बड़ा आधार है। ऐसे में यदि कृषि क्षेत्र कमजोर पड़ता है तो इसका असर पूरे आर्थिक ढांचे पर दिखाई देता है।
इसी बीच 2026-27 को लेकर कृषि क्षेत्र से चिंताजनक संकेत मिलने लगे हैं। अल नीनो की आशंकाओं और सामान्य से कम बारिश के अनुमान के बीच कई प्रमुख कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि आने वाले वित्त वर्ष में भारत की एग्रीकल्चर GDP ग्रोथ शून्य के आसपास रह सकती है या कुछ परिस्थितियों में नकारात्मक भी हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो इसका असर केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसानों की आय, ग्रामीण खपत, खाद्य महंगाई और देश की आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ेगा।
क्यों बढ़ रही है चिंता?
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) के पूर्व चेयरमैन अशोक गुलाटी ने चेतावनी दी है कि बारिश की मात्रा और उसका वितरण आने वाले महीनों में कृषि क्षेत्र की दिशा तय करेगा।
उनके अनुसार यदि भारतीय मौसम विभाग (IMD) का अनुमान सही साबित होता है और बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के लगभग 90 प्रतिशत तक सीमित रहती है, तो कृषि उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
गुलाटी का कहना है कि भारत की खेती आज भी बड़े पैमाने पर मानसून पर निर्भर है। कमजोर मानसून की स्थिति में एग्रीकल्चर GDP ग्रोथ लगभग शून्य या नकारात्मक भी हो सकती है।
किसानों ने पहले ही बदलनी शुरू की रणनीति
कम बारिश की आशंका का असर खेतों तक पहुंच चुका है। कई राज्यों में किसान पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों का रकबा घटाने लगे हैं।
महाराष्ट्र के कई इलाकों में किसान गन्ने की खेती कम कर रहे हैं और उसकी जगह बाजरा, ज्वार, मूंग तथा सब्जियों जैसी कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि इन फसलों में पानी की जरूरत कम होती है, लेकिन इनसे मिलने वाली आय भी अपेक्षाकृत कम होती है।
पश्चिमी महाराष्ट्र के किसान राहुल पवार ने नहरों में पानी की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता के कारण गन्ने का रकबा लगभग 60 प्रतिशत तक कम करने का निर्णय लिया है। उनका मानना है कि यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं आया तो गन्ने जैसी लंबी अवधि वाली फसल को बचाना मुश्किल होगा।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी किसान धान और सोयाबीन जैसी फसलों का रकबा घटाने पर विचार कर रहे हैं।
किसानों की आय पर दोहरी मार
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार किसानों के सामने केवल उत्पादन का संकट नहीं है, बल्कि लागत भी तेजी से बढ़ रही है।
डीजल की ऊंची कीमतें, खाद की कमी, कीटनाशकों की बढ़ती लागत और सिंचाई पर बढ़ता खर्च किसानों के लिए चुनौती बन चुका है। कई क्षेत्रों से ऐसी शिकायतें भी सामने आई हैं कि किसान खुले बाजार या ग्रे मार्केट से अधिक कीमत पर खाद खरीदने को मजबूर हैं।
कर्नाटक एग्रीकल्चरल प्राइस कमीशन के चेयरमैन और किसानों की आय दोगुनी करने वाली समिति के पूर्व प्रमुख अशोक दलवाई का कहना है कि यदि मानसून कमजोर रहा तो सोयाबीन, अरहर, उड़द और कपास जैसी फसलों में मॉइस्चर स्ट्रेस बढ़ सकता है, जिससे पैदावार सीधे प्रभावित होगी।
ऐसी स्थिति में किसानों की आमदनी घटने और कर्ज का दबाव बढ़ने का जोखिम भी बढ़ जाएगा।
क्या बढ़ जाएगी महंगाई?
कृषि उत्पादन में कमी का सबसे बड़ा असर खाद्य महंगाई पर देखने को मिल सकता है।
अशोक गुलाटी के अनुसार दालों, तिलहन, मोटे अनाज, कपास और सब्जियों का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। यदि ऐसा हुआ तो बाजार में आपूर्ति कम होगी और कीमतों में तेजी आ सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि खाद्य महंगाई बढ़ने की स्थिति में खुदरा महंगाई (CPI Inflation) भी फिर से 5 प्रतिशत के ऊपर जा सकती है। कुछ आकलनों के अनुसार अक्टूबर-नवंबर तक CPI महंगाई 6 प्रतिशत के करीब पहुंचने का जोखिम भी मौजूद है।
महंगाई बढ़ने का असर केवल किसानों या ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शहरी उपभोक्ताओं की जेब पर भी सीधा असर पड़ेगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर कितना असर होगा?
भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था उपभोक्ता मांग का एक महत्वपूर्ण आधार है। कई उद्योगों की कुल बिक्री में ग्रामीण बाजार की हिस्सेदारी 30 से 40 प्रतिशत तक मानी जाती है।
यदि किसानों की आय घटती है तो इसका असर ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन, उपभोक्ता सामान, सीमेंट, स्टील और FMCG उत्पादों की मांग पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर कृषि सीजन का असर रोजगार पर भी पड़ेगा। खेती-बाड़ी से जुड़े काम कम होने पर कृषि मजदूरों की मांग घट सकती है, जिससे ग्रामीण आय पर अतिरिक्त दबाव बनेगा।
उत्पादन को लेकर उद्योग भी चिंतित
कृषि क्षेत्र पर नजर रखने वाली कंपनियां भी आने वाले सीजन को लेकर सतर्क हैं।
AWL एग्री बिजनेस के एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन अंगशु मल्लिक का कहना है कि दाल, धान, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में गिरावट का खतरा पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने बताया कि फसल के अंतिम विकास चरण में पर्याप्त नमी बेहद जरूरी होती है। यदि मानसून के दूसरे हिस्से में बारिश कमजोर रही तो उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है।
सरकार के सामने क्या चुनौती?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो का प्रभाव जनवरी 2027 तक बना रहता है तो इसका असर केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहेगा। रबी और जायद फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं।
ऐसे में सरकार के सामने किसानों की आय को स्थिर रखने, खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने, सिंचाई सुविधाओं को मजबूत बनाने और खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने की बड़ी चुनौती होगी।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो उत्पादन में गिरावट, ग्रामीण आय में कमी और महंगाई में वृद्धि का संयुक्त प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत के लिए 2026-27 केवल एक कृषि वर्ष नहीं बल्कि एक बड़ी आर्थिक परीक्षा साबित हो सकता है। अल नीनो, कमजोर मानसून, बढ़ती लागत और उत्पादन संबंधी चुनौतियों के बीच कृषि क्षेत्र दबाव में दिखाई दे रहा है। यदि मौसम अनुमान सही साबित होते हैं तो किसानों की आय, ग्रामीण मांग और महंगाई सभी पर असर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ महीने न केवल किसानों बल्कि पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले साबित होंगे।


