भारत के लिए दलहन (Pulses) सेक्टर से बड़ी राहत की खबर सामने आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का दालों का आयात बिल 34% घटकर 3.63 अरब डॉलर रह गया है। वहीं दूसरी ओर भारतीय दालों के निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। खासकर चीन में भारतीय हरी मूंग और अन्य दालों की मांग बढ़ने से निर्यातकों को नया बाजार मिला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में नरमी और सरकार की आत्मनिर्भर दलहन नीति के चलते भारत की आयात पर निर्भरता कम हुई है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होने के साथ-साथ किसानों को भी बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद है।
Highlights
- दालों का आयात बिल 34% घटकर 3.63 अरब डॉलर हुआ।
- घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हुई।
- चीन समेत कई देशों में भारतीय दालों की मांग बढ़ी।
- काबुली चना, पीली मटर और मसूर के आयात में बड़ी गिरावट दर्ज।
- दलहन उत्पादन बढ़कर 27.4 मिलियन टन पहुंचा।
34% घटा दालों का आयात बिल
वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल दलहन आयात 3.63 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह 5.54 अरब डॉलर था। यानी एक साल में आयात बिल में करीब 34% की कमी दर्ज की गई।
मात्र मूल्य ही नहीं, बल्कि आयात की मात्रा में भी गिरावट आई है। इस दौरान दलहन का आयात 12% घटकर 6 मिलियन टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष यह 7.34 मिलियन टन था।
व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने से बाजार में पर्याप्त उपलब्धता रही, जिसके कारण आयात की आवश्यकता पहले की तुलना में काफी कम हो गई।
किन दालों के आयात में सबसे ज्यादा कमी आई?
इस साल कई प्रमुख दालों के आयात में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली।
काबुली चना
सबसे बड़ी गिरावट काबुली चना के आयात में दर्ज हुई। इसका आयात वित्त वर्ष 2024-25 के 8.25 करोड़ डॉलर (82.5 मिलियन डॉलर) से घटकर केवल 9.7 लाख डॉलर रह गया। यानी इसमें लगभग 99% की गिरावट दर्ज की गई।
देसी चना
अंतरराष्ट्रीय बाजार में देसी चने की कीमतों में करीब 25% की गिरावट के बावजूद आयात 111.66 करोड़ डॉलर से घटकर 53.59 करोड़ डॉलर रह गया, जो लगभग 52% की कमी है।
पीली मटर
पीली मटर का आयात 96.06 करोड़ डॉलर से घटकर 39.77 करोड़ डॉलर रह गया, जो बड़ी गिरावट मानी जा रही है।
मसूर दाल
मसूर दाल का आयात भी 91.60 करोड़ डॉलर से घटकर 65.97 करोड़ डॉलर पर आ गया।
इसके अलावा:
- अरहर के आयात में 26.3% कमी
- राजमा के आयात में 23.6% कमी
- लोबिया के आयात में 13.9% कमी दर्ज की गई।
निर्यात में भारत ने बनाई नई पहचान
जहां एक ओर आयात घटा है, वहीं दूसरी ओर भारत का दलहन निर्यात लगातार बढ़ रहा है।
सरकार द्वारा दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के तहत किसानों को प्रोत्साहन दिए जाने का असर अब निर्यात के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है।
- काबुली चना का निर्यात 179.7 मिलियन डॉलर से बढ़कर 212.2 मिलियन डॉलर पहुंच गया, यानी 18.1% की वृद्धि।
- अन्य सूखी फलियों (Leguminous Vegetables) का निर्यात 9.7 मिलियन डॉलर से बढ़कर 23 मिलियन डॉलर हो गया, जो दोगुने से भी अधिक है।
चीन में क्यों बढ़ी भारतीय दालों की मांग?
व्यापार जगत के अनुसार चीन में हरी मूंग दाल और अन्य भारतीय दलहन उत्पादों की मांग बढ़ी है।
इसके प्रमुख कारण हैं:
- भारतीय दालों की बेहतर गुणवत्ता
- प्रतिस्पर्धी कीमतें
- वैश्विक सप्लाई चेन में सुधार
- भारत की निर्यात क्षमता में वृद्धि
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान जारी रहा तो आने वाले वर्षों में भारत दालों के निर्यात बाजार में और मजबूत स्थिति बना सकता है।
उत्पादन बढ़ने से आयात की जरूरत हुई कम
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के अनुसार, पिछले वर्ष दलहन का उत्पादन काफी अच्छा रहा, जिससे देश में उपलब्धता बढ़ी और आयात की आवश्यकता कम हो गई।
उन्होंने कहा कि मजबूत घरेलू उत्पादन ने न केवल आयात कम किया बल्कि निर्यात के लिए भी अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध कराया।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दलहन उत्पादन
सरकार के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल दलहन उत्पादन बढ़कर 27.4 मिलियन टन हो गया है।
पिछले वर्ष यह उत्पादन लगभग 25.7 मिलियन टन था।
इसी तरह रबी दलहन उत्पादन भी:
- 2024-25: 15.2 मिलियन टन
- 2025-26: 16.9 मिलियन टन
तक पहुंच गया है।
यह वृद्धि बताती है कि किसानों ने दलहन की खेती का रकबा बढ़ाया और बेहतर उत्पादन तकनीकों का लाभ उठाया।
सरकार की नीतियों का दिखा असर
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें शामिल हैं:
- दलहन आत्मनिर्भरता मिशन
- किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराना
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद
- उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं
- आयात नीति में संतुलित बदलाव
इन प्रयासों का असर अब उत्पादन और व्यापार दोनों में साफ दिखाई देने लगा है।
आगे क्या है संभावना?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य रहा और उत्पादन मजबूत बना रहा तो आने वाले वर्षों में भारत की दालों के आयात पर निर्भरता और कम हो सकती है। साथ ही चीन, मध्य-पूर्व और अन्य एशियाई देशों में बढ़ती मांग भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोल सकती है।
घरेलू उत्पादन में निरंतर वृद्धि, बेहतर सरकारी नीतियां और वैश्विक बाजार में भारतीय दालों की बढ़ती स्वीकार्यता भारत को धीरे-धीरे दालों के बड़े आयातक से मजबूत निर्यातक की दिशा में आगे बढ़ा रही है।


