India Oil Routes: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर साफ दिखाई देने लगा है। होर्मुज स्ट्रेट में पहले से बनी अनिश्चितता के बीच अब बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी संकट के घेरे में आ गया है। लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल परिवहन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस मार्ग पर बढ़ते खतरे से भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ गई है। यदि दोनों समुद्री रास्तों पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो भारत के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति, परिवहन लागत और महंगाई पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
बाब अल-मंदेब में बढ़ा संकट, तेल टैंकरों को बदलना पड़ा रास्ता
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच सऊदी अरब से भारत और चीन के लिए रवाना हुए तीन बड़े तेल टैंकरों—शिन लॉन्ग यांग (Xin Long Yang), रोडोस (Rhodos) और अमेजन (Amazon)—को लाल सागर में अपना मार्ग बदलना पड़ा। रिपोर्ट्स के अनुसार, यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा के बाद इन जहाजों ने यू-टर्न लिया।
इस घटनाक्रम ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई चिंता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत के लिए जा रहा था कच्चा तेल
सूत्रों के मुताबिक, रोडोस और अमेजन नामक टैंकर भारत के लिए कच्चा तेल लेकर आ रहे थे। हालांकि फिलहाल भारत को गैर-सऊदी स्रोतों से आने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही में बड़ी रुकावट का सामना नहीं करना पड़ा है।
भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के फुजैराह टर्मिनल सहित अन्य वैकल्पिक स्रोतों से भी तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश की है। इसके बावजूद यदि पश्चिम एशिया के दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो भारत के लिए चुनौतियां काफी बढ़ सकती हैं।
होर्मुज स्ट्रेट पहले से ही दबाव में
ईरान-अमेरिका और इजरायल से जुड़े बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट पहले से ही वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में शामिल है और खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया तक पहुंचता है।
हाल के दिनों में बारूदी सुरंगें (माइंस) बिछाए जाने की आशंकाओं और सुरक्षा जोखिमों के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है। इससे शिपिंग कंपनियों की लागत और जोखिम दोनों बढ़ गए हैं।
बाब अल-मंदेब क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यूरोप, एशिया और पश्चिम एशिया के बीच होने वाले समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
यदि यह रास्ता बाधित होता है तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा सफर तय करना पड़ सकता है। इससे यात्रा का समय कई दिनों तक बढ़ जाता है और ईंधन व शिपिंग लागत में भी भारी इजाफा होता है।
हूती विद्रोहियों की चेतावनी से बढ़ी कंपनियों की चिंता
हूती विद्रोहियों ने कथित तौर पर शिपिंग कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे सऊदी अरब के बंदरगाहों पर माल की लोडिंग या अनलोडिंग से बचें। चेतावनी में कहा गया है कि आदेश का पालन नहीं करने वाले जहाजों को किसी भी स्थान पर निशाना बनाया जा सकता है।
इस चेतावनी के बाद कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां अपने जहाजों के मार्ग और संचालन की समीक्षा कर रही हैं। इससे समुद्री बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों में किसी भी तरह का व्यवधान सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
संभावित प्रभाव इस प्रकार हो सकते हैं:
- कच्चे तेल की आपूर्ति में देरी।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी।
- पेट्रोल और डीजल की लागत बढ़ने का दबाव।
- शिपिंग और बीमा खर्च में वृद्धि।
- आयात बिल बढ़ने से चालू खाते के घाटे पर असर।
- महंगाई और परिवहन लागत में बढ़ोतरी।
यानबू बंदरगाह बना था वैकल्पिक रास्ता
होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते जोखिम के बाद सऊदी अरब का यानबू बंदरगाह, जो लाल सागर के तट पर स्थित है, पश्चिम एशियाई तेल निर्यात का प्रमुख वैकल्पिक मार्ग बन गया था। यहां से प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का निर्यात संभव हो रहा था।
लेकिन यदि बाब अल-मंदेब मार्ग भी प्रभावित होता है तो यह वैकल्पिक व्यवस्था भी गंभीर दबाव में आ सकती है।
आगे क्या हो सकता है?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ और दोनों प्रमुख समुद्री मार्गों पर जोखिम बना रहा, तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत फिलहाल विभिन्न स्रोतों से तेल आयात कर जोखिम कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लंबे समय तक संकट रहने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू महंगाई पर इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है।


