नई दिल्ली: हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में बनने वाली एक मौसमीय घटना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बनती दिख रही है। अल-नीनो (El Nino) के दोबारा सक्रिय होने की आशंका के बीच कृषि उत्पादन, किसानों की आमदनी और महंगाई पर असर को लेकर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून सिर्फ मौसम नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता है। ऐसे में अगर बारिश सामान्य से कम रहती है तो इसका प्रभाव खेतों से लेकर बाजार और आम लोगों की जेब तक दिखाई दे सकता है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस मानसून सीजन में सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है। विभाग के अनुसार वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 90 प्रतिशत तक सीमित रह सकती है। यह अनुमान ऐसे समय में आया है जब विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी अल-नीनो के विकसित होने की संभावना को काफी मजबूत बताया है।
आखिर क्या होता है अल-नीनो?
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने के कारण पैदा होती है। इसका प्रभाव केवल समुद्री क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता बल्कि दुनिया के कई देशों के मौसम को प्रभावित करता है।
भारत में अल-नीनो का सीधा संबंध मानसून की कमजोरी से माना जाता है। जब अल-नीनो सक्रिय होता है तो मानसूनी हवाओं की ताकत कम हो सकती है, जिससे कई क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश होती है। कम वर्षा का सबसे ज्यादा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ता है क्योंकि देश की बड़ी आबादी आज भी खेती और उससे जुड़े रोजगार पर निर्भर है।
इतिहास क्या कहता है?
पिछले मजबूत अल-नीनो वर्षों के आंकड़े भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। 1991-92, 1997-98 और 2015-16 के दौरान देश ने कमजोर मानसून और कृषि उत्पादन पर उसके प्रभाव को महसूस किया था।
आर्थिक विश्लेषणों के अनुसार इन वर्षों में खरीफ फसलों के उत्पादन में औसतन 1.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। यह गिरावट पहली नजर में भले छोटी लगे, लेकिन करोड़ों किसानों और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर इसका बड़ा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून में हर एक प्रतिशत की कमी कृषि सकल मूल्य वर्धित (Agriculture GVA) की वृद्धि दर को प्रभावित कर सकती है। इसका असर अंततः ग्रामीण आय, खपत और देश की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है।
किन फसलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है?
अल-नीनो का प्रभाव सभी फसलों पर समान नहीं होता। कुछ फसलें बारिश पर अधिक निर्भर होती हैं, इसलिए उनमें उत्पादन घटने का जोखिम बढ़ जाता है।
HDFC बैंक की प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट साक्षी गुप्ता के अनुसार ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि मानसून की कमी का सबसे ज्यादा असर मोटे अनाज, दालों और तिलहन फसलों पर देखा गया है।
पिछले अल-नीनो वर्षों में:
- ज्वार का उत्पादन औसतन 28% तक घटा
- अरहर उत्पादन में 17.1% की गिरावट आई
- बाजरा उत्पादन 15.7% कम हुआ
- मोटे अनाजों में 13.8% की कमी दर्ज हुई
- मक्का उत्पादन 5.4% घटा
- मूंगफली उत्पादन में 5.8% की गिरावट आई
- कपास उत्पादन लगभग 13% कम हुआ
हालांकि गन्ने और धान जैसी कुछ फसलों पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव देखा गया। इसकी बड़ी वजह सिंचाई सुविधाओं की उपलब्धता है।
किसानों की आमदनी पर क्यों मंडरा रहा खतरा?
कम बारिश का सबसे पहला असर बुवाई पर पड़ता है। यदि मानसून की शुरुआत कमजोर रहती है तो किसान कम क्षेत्र में बुवाई कर पाते हैं। वहीं यदि बारिश बीच सीजन में प्रभावित होती है तो फसल की पैदावार कम हो सकती है।
कम उत्पादन का मतलब है किसानों की कम कमाई। इसके साथ ही सिंचाई, डीजल, बिजली और अन्य कृषि लागत बढ़ने से किसानों का खर्च भी बढ़ सकता है। ऐसे में ग्रामीण आय पर दोहरा दबाव पड़ने का खतरा रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून ग्रामीण मांग को भी प्रभावित कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आय घटने से ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन, उपभोक्ता वस्तुओं और अन्य उत्पादों की मांग कमजोर पड़ सकती है।
WMO ने क्या कहा?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार जून से अगस्त के बीच अल-नीनो के विकसित होने की संभावना लगभग 80 प्रतिशत है। वहीं इसके नवंबर तक बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।
भारत में खरीफ सीजन की बुवाई जून से शुरू होती है और यह मानसून पर काफी हद तक निर्भर रहती है। ऐसे में यदि शुरुआती महीनों में बारिश कमजोर रहती है तो कृषि क्षेत्र पर इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।
भारत को सालभर की कुल वर्षा का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच मिलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होता है। इसलिए इस अवधि में वर्षा में किसी भी प्रकार की कमी का सीधा असर कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
क्या बढ़ सकती है महंगाई?
अल-नीनो का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। कम उत्पादन का असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
2015-16 के मजबूत अल-नीनो वर्ष में देश की औसत महंगाई दर 4.9 प्रतिशत रही थी। वहीं दालों की महंगाई 31.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इससे आम लोगों के घरेलू बजट पर भारी दबाव पड़ा था।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि इस बार भी दाल, तिलहन और सब्जियों का उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। चूंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य वस्तुओं की बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए इसका असर समग्र महंगाई पर दिखाई दे सकता है।
सरकार की तैयारी कितनी मजबूत?
सरकार का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में सिंचाई सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कई राज्यों में नहर नेटवर्क, माइक्रो इरिगेशन और जल संरक्षण परियोजनाओं को बढ़ावा दिया गया है।
इसके अलावा कृषि वैज्ञानिक कम समय में तैयार होने वाली और मौसम के उतार-चढ़ाव को सहन करने वाली बीज किस्मों पर भी काम कर रहे हैं। सरकार का मानना है कि इन उपायों से अल-नीनो के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
धान और गेहूं के पर्याप्त सरकारी भंडार भी खाद्य सुरक्षा बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। हालांकि दालों और तिलहनों के मामले में स्थिति अलग हो सकती है, क्योंकि इनका उत्पादन अधिक बारिश पर निर्भर करता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और GDP पर क्या होगा असर?
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान भले घटा हो, लेकिन रोजगार और ग्रामीण मांग के लिहाज से इसकी भूमिका अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि अल-नीनो के कारण फसल उत्पादन घटता है तो इसका असर ग्रामीण आय पर पड़ेगा। ग्रामीण खपत कमजोर होने से FMCG कंपनियों, ऑटोमोबाइल सेक्टर, कृषि उपकरण निर्माताओं और बैंकिंग सेक्टर तक प्रभाव दिखाई दे सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून आर्थिक विकास दर पर भी दबाव डाल सकता है। हालांकि सिंचाई सुविधाओं और सरकारी हस्तक्षेप के कारण पहले की तुलना में जोखिम कुछ कम हुआ है।
आगे क्या देखना होगा?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात मानसून की प्रगति और बारिश का वितरण रहेगा। केवल कुल वर्षा ही नहीं बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि किस क्षेत्र में कितनी बारिश होती है और उसका समय क्या रहता है।
यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है तो दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों के उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं यदि बारिश का वितरण बेहतर रहा तो अल-नीनो का असर सीमित भी रह सकता है।
फिलहाल मौसम वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और नीति निर्माता सभी मानसून की गतिविधियों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं क्योंकि आने वाले कुछ महीने भारत की कृषि, महंगाई और आर्थिक वृद्धि के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।


