नई दिल्ली। बिजनेस की दुनिया में अक्सर हम बड़ी-बड़ी कंपनियों और उनके मालिकों की सफलता देखते हैं, लेकिन हर सफलता के पीछे एक ऐसा संघर्ष छिपा होता है जिसे समझना जरूरी है। दिल्ली के शालीमार बाग से निकलकर करोड़ों का कारोबार खड़ा करने वाले अवनीत सिंह कोहली उर्फ ‘सन्नी’ की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—जहां हालात इतने खराब थे कि परिवार को दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ा, लेकिन आज वही शख्स लग्जरी कारों के करोड़ों के कारोबार का मालिक है।
यह कहानी सिर्फ पैसे कमाने की नहीं है, बल्कि बदलते समय के साथ खुद को ढालने, रिस्क लेने और बार-बार असफल होकर भी खड़े होने की कहानी है।
एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी

सन्नी का जन्म 1980 के दशक में दिल्ली के शालीमार बाग में एक कारोबारी परिवार में हुआ था। उनके पिता इलेक्ट्रॉनिक सामान—जैसे वॉशिंग मशीन, टीवी और स्टीरियो सिस्टम—बनाने की फैक्ट्री चलाते थे। परिवार आर्थिक रूप से स्थिर था और जिंदगी सामान्य चल रही थी।
लेकिन 1996 में एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया।
जब सन्नी आठवीं कक्षा में थे, उनके पिता एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गए। तीन साल तक वह बिस्तर पर रहे। इलाज का खर्च इतना बढ़ा कि परिवार को फैक्ट्री बेचनी पड़ी, फिर संपत्ति भी चली गई। हालात इतने खराब हो गए कि दवाइयों और खाने के लिए भी पैसे जुटाना मुश्किल हो गया।
यह वही मोड़ था जहां से संघर्ष की असली शुरुआत हुई।
₹20,000 से फिर शुरू हुआ सफर
साल 1999 में सन्नी के पिता ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने घर के गहने बेचकर ₹20,000 जुटाए और स्टेबलाइजर बनाने का छोटा सा काम शुरू किया। उस समय दिल्ली में बिजली की गुणवत्ता खराब होती थी, इसलिए स्टेबलाइजर की मांग थी।
सन्नी ने 2000 में पढ़ाई के साथ-साथ इस काम में हाथ बंटाना शुरू किया। उन्होंने सिर्फ काम नहीं किया, बल्कि उसे समझा—ग्राहकों की जरूरत, बाजार का ट्रेंड और प्रोडक्ट की डिमांड।
धीरे-धीरे काम चल निकला, लेकिन यह सफलता ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी।
जब मार्केट बदल गया और बिजनेस खत्म हो गया

साल 2010 के आसपास दिल्ली में बिजली वितरण निजी कंपनियों जैसे टाटा और रिलायंस के हाथ में चला गया। इसके बाद बिजली की गुणवत्ता में सुधार हुआ और स्टेबलाइजर की जरूरत लगभग खत्म हो गई।
एक तरह से उनका पूरा बिजनेस अचानक खत्म हो गया।
यहीं पर एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ—अब आगे क्या?
बहुत से लोग इस स्थिति में हार मान लेते हैं, लेकिन सन्नी ने दिशा बदलने का फैसला किया।
सेकेंड हैंड कार मार्केट में एंट्री—पहली असफलता
सन्नी ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में कदम रखने का फैसला किया। उन्होंने करोल बाग में एक जानकार के साथ काम करके सेकेंड हैंड कारों का बिजनेस सीखा।
करीब एक साल सीखने के बाद उन्होंने एक फ्लैट बेचकर पूंजी जुटाई और खुद का काम शुरू किया।
लेकिन यह पहला बड़ा झटका था।
6-8 महीने में ही बिजनेस बंद करना पड़ा। नुकसान हुआ, आत्मविश्वास डगमगाया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
सही सेगमेंट चुना—लक्जरी कार मार्केट

इस असफलता से सन्नी ने एक अहम बात सीखी—मार्केट में भीड़ जहां ज्यादा हो, वहां मार्जिन कम होता है। इसलिए उन्होंने सेकेंड हैंड लग्जरी कारों के सेगमेंट में जाने का फैसला किया, जहां उस समय बहुत कम खिलाड़ी थे।
साल 2011 में दिल्ली के नारायणा में 800 वर्ग फुट की छोटी सी जगह पर “Auto Best” नाम से शोरूम खोला गया।
शुरुआत में उनके पास 6-8 गाड़ियां होती थीं—जैसे Mitsubishi Pajero, Skoda Laura, Chevrolet Cruze, Toyota Altis, Honda Accord। महीने में 4-5 कारें बिकती थीं।
यह छोटा लेकिन स्थिर शुरुआत थी।
इंटरनेट ने बदल दिया खेल
2011-12 के आसपास भारत में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर सेकेंड हैंड कारों की बिक्री तेजी से बढ़ने लगी। सन्नी ने इस बदलाव को जल्दी समझ लिया।
उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल शुरू किया—ऑनलाइन लिस्टिंग, ग्राहकों से सीधे संपर्क और बेहतर प्रेजेंटेशन।
यहीं से बिजनेस में असली ग्रोथ शुरू हुई।
महीने की बिक्री धीरे-धीरे दोगुनी होने लगी।
भाई की एंट्री और बड़ा विस्तार

2013 में सन्नी के भाई जसप्रीत सिंह ‘हन्नी’ भी इस बिजनेस में जुड़ गए। दोनों ने मिलकर इसे अगले स्तर पर ले जाने की योजना बनाई।
दिल्ली के अशोक विहार में बड़ा शोरूम खोला गया, जहां 25 गाड़ियों की इन्वेंट्री रखी जाने लगी।
इसके बाद 2015 में उन्होंने “Auto Best Emperio” के नाम से ब्रांड को रीब्रांड किया और नारायणा में एक बड़ा एक्सपीरियंस सेंटर खोला।
इस फैसले को उस समय कई लोगों ने गलत बताया। लोगों को लगा कि कार शोरूम को “रेस्टोरेंट जैसा” बनाना बेकार है।
लेकिन यहीं उनकी सबसे बड़ी जीत छिपी थी।
Experience Center मॉडल—गेम चेंजर साबित हुआ
Auto Best Emperio ने सिर्फ कार बेचने का काम नहीं किया, बल्कि ग्राहकों को एक प्रीमियम अनुभव देना शुरू किया।
शोरूम को हाई-एंड डिजाइन दिया गया, जहां ग्राहक आराम से बैठकर कार चुन सकें, टेस्ट ड्राइव ले सकें और पूरी ट्रांसपेरेंसी के साथ डील कर सकें।
इस मॉडल ने उन्हें बाकी डीलर्स से अलग बना दिया।
परिणाम—महीने में 30-35 कारों की बिक्री।
कोरोना काल में भी ग्रोथ—कैसे संभव हुआ?

जहां कोरोना महामारी के दौरान कई बिजनेस ठप हो गए, वहीं Auto Best Emperio का बिजनेस और बढ़ा।
इसके पीछे दो बड़े कारण थे:
- लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट से बचना चाहते थे
- हाई-नेटवर्थ इंडिविजुअल्स ने लग्जरी कारों में निवेश बढ़ाया
सन्नी और उनकी टीम ने डिजिटल सेल्स, वर्चुअल टूर और होम डिलीवरी जैसे मॉडल अपनाए।
इससे उनका बिजनेस पूरे भारत में फैल गया।
आज का कारोबार—₹216 करोड़ टर्नओवर
आज Auto Best Emperio भारत के प्रमुख सेकेंड हैंड लग्जरी कार डीलर्स में से एक है।
- कंपनी का टर्नओवर ₹216 करोड़ तक पहुंच चुका है
- हर समय ₹50-60 करोड़ की इन्वेंट्री रहती है
- 50 लाख से लेकर 7-8 करोड़ तक की कारों की बिक्री होती है
वे Mercedes-Benz, BMW, Audi, Lamborghini, Bentley, Volvo, Land Rover जैसी प्रीमियम ब्रांड्स में डील करते हैं।
उनके ग्राहक बड़े उद्योगपति, फिल्मी हस्तियां और हाई-प्रोफाइल क्लाइंट्स हैं—हालांकि गोपनीयता उनके बिजनेस का अहम हिस्सा है।
आगे की योजना—IPO और ₹500 करोड़ का लक्ष्य
सन्नी और उनकी टीम का लक्ष्य अगले तीन साल में कंपनी का टर्नओवर ₹500 करोड़ तक पहुंचाना है।
साथ ही, वे भविष्य में IPO लाने की योजना भी बना रहे हैं, जिससे कंपनी को और विस्तार मिल सके।
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस सक्सेस स्टोरी नहीं है, बल्कि बदलते समय में सही फैसले लेने की मिसाल है।
सबसे बड़ी सीख यह है कि:
- हालात चाहे कितने भी खराब हों, शुरुआत हमेशा छोटी हो सकती है
- असफलता अंत नहीं होती, बल्कि दिशा बदलने का मौका देती है
- मार्केट को समझना और समय के साथ बदलना जरूरी है
- रिस्क लेने से ही बड़ा ग्रोथ संभव होता है
निष्कर्ष
अवनीत सिंह कोहली की कहानी हमें यह सिखाती है कि सफलता किसी एक बड़े मौके से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सही फैसलों से बनती है। ₹20,000 से शुरू हुआ सफर आज ₹216 करोड़ तक पहुंच चुका है—और यह सिर्फ शुरुआत है।
अगर नजरिया सही हो, मेहनत लगातार हो और समय के साथ खुद को बदलने की क्षमता हो, तो किसी भी मुश्किल से निकलकर बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।
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