8th Pay Commission Salary Hike: आठवें वेतन आयोग में सिर्फ फिटमेंट फैक्टर और वेतन बढ़ोतरी ही चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि अब अधिकतम सैलरी तय करने के तरीके पर भी बहस तेज हो गई है। कर्मचारी संगठनों ने आयोग के सामने दो अलग-अलग प्रस्ताव रखे हैं। एक पक्ष न्यूनतम और अधिकतम वेतन के बीच 1:12 का अनुपात चाहता है, जबकि दूसरा पक्ष अधिकतम वेतन पर किसी भी तरह की सीमा लगाने के खिलाफ है।
8वें वेतन आयोग में वेतन संरचना पर नई बहस
नई दिल्ली। 8th Pay Commission की बैठकें लगातार जारी हैं और आयोग विभिन्न कर्मचारी संगठनों से सुझाव ले रहा है। इस बीच अधिकतम वेतन (Maximum Salary) तय करने को लेकर दो अलग-अलग विचार सामने आए हैं। यह फैसला भविष्य में केंद्रीय कर्मचारियों की पूरी वेतन संरचना पर असर डाल सकता है।
जहां एक प्रस्ताव वेतन असमानता कम करने की बात करता है, वहीं दूसरा प्रस्ताव जिम्मेदारियों और विशेषज्ञता के आधार पर अधिकतम वेतन पर कोई सीमा न रखने की वकालत करता है।
पहला प्रस्ताव: न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अनुपात 1:12 हो
नेशनल काउंसिल-जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) स्टाफ साइड ने आयोग को दिए अपने ज्ञापन में सुझाव दिया है कि न्यूनतम और अधिकतम वेतन के बीच का अनुपात 1:12 से अधिक नहीं होना चाहिए।
संगठन का मानना है कि ऐसा करने से:
- कर्मचारियों के बीच आय असमानता कम होगी।
- सभी स्तरों पर वेतन संरचना अधिक संतुलित बनेगी।
- कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा।
- सरकार एक सामाजिक न्याय आधारित आदर्श नियोक्ता की भूमिका निभा सकेगी।
- अलग-अलग पे-लेवल के बीच अत्यधिक अंतर समाप्त होगा।
RSCWS ने भी किया संतुलित वेतन ढांचे का समर्थन
रेलवे सीनियर सिटिजंस वेलफेयर सोसाइटी (RSCWS) ने भी आयोग से मांग की है कि न्यूनतम और अधिकतम वेतन के बीच संतुलित अनुपात रखा जाए।
सोसाइटी का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारियां अधिक होती हैं, इसलिए उनका वेतन स्वाभाविक रूप से ज्यादा हो सकता है। लेकिन पूरी वेतन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसे कर्मचारी और समाज दोनों न्यायसंगत मानें।
दूसरा प्रस्ताव: अधिकतम वेतन पर कोई सीमा नहीं
दूसरी ओर इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन (IRTSA) ने बिल्कुल अलग राय रखी है।
IRTSA का कहना है कि सर्वोच्च वेतनमान को न्यूनतम वेतन के अनुपात से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। यानी अधिकतम वेतन तय करने पर किसी प्रकार की सीमा नहीं लगनी चाहिए।
संगठन का तर्क है कि उच्च तकनीकी पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों की जिम्मेदारियां, जोखिम और कार्य परिस्थितियां सामान्य कर्मचारियों से अलग होती हैं। इसलिए उन्हें उनकी विशेषज्ञता और कार्यभार के अनुसार बेहतर वेतन मिलना चाहिए।
तकनीकी कर्मचारियों के लिए अलग वेतन ढांचे की मांग
IRTSA ने आयोग से यह भी मांग की है कि रेलवे के तकनीकी और गैर-तकनीकी कर्मचारियों के लिए अलग वेतन संरचना बनाई जाए।
संगठन के अनुसार तकनीकी कर्मचारियों को:
- अधिक जोखिम भरे कार्य करने पड़ते हैं।
- अतिरिक्त कार्य घंटे देने होते हैं।
- कठिन कार्य परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।
- उच्च स्तर की तकनीकी जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं।
ऐसे में उनके लिए अलग और अधिक आकर्षक वेतन व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
कर्मचारियों को कैसे मिल सकता है फायदा?
अगर आयोग 1:12 अनुपात वाले प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो निचले और मध्यम वेतन वर्ग के कर्मचारियों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिल सकता है और वेतन असमानता कम हो सकती है।
वहीं यदि अधिकतम वेतन पर सीमा न रखने वाला प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है, तो वरिष्ठ अधिकारियों और उच्च तकनीकी पदों पर कार्यरत कर्मचारियों के लिए बेहतर वेतन वृद्धि की संभावना बन सकती है।
अंतिम फैसला आयोग की सिफारिशों और केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद ही स्पष्ट होगा।
कब आएगी अंतिम रिपोर्ट?
केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग का गठन नवंबर 2025 में अधिसूचित किया था। आयोग से उम्मीद है कि वह गठन के लगभग 18 महीनों के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप देगा। इसके बाद सरकार सिफारिशों पर फैसला लेकर नई वेतन संरचना लागू करने की प्रक्रिया शुरू करेगी।
फिलहाल केंद्रीय कर्मचारियों की नजर इस बात पर टिकी है कि आयोग इन दोनों प्रस्तावों में किसे प्राथमिकता देता है और नई वेतन व्यवस्था में अधिकतम सैलरी तय करने का अंतिम फॉर्मूला क्या होगा।


