नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत मिलने वाले सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की सालाना सीमा में बड़ा बदलाव किया है। अब योजना के लाभार्थियों को एक साल में नौ की जगह केवल चार सब्सिडी वाले गैस सिलेंडर मिलेंगे। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। सरकार का कहना है कि यह फैसला उज्ज्वला लाभार्थियों की औसत घरेलू खपत को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जबकि विशेषज्ञ इसे बढ़ती सब्सिडी लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतों में आई तेजी से भी जोड़कर देख रहे हैं।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। सरकार का दावा है कि इसके बावजूद भारत में घरेलू रसोई गैस की कीमतें दुनिया के कई देशों की तुलना में काफी कम हैं।
2016 में शुरू हुई थी उज्ज्वला योजना
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत मई 2016 में की गई थी। इस योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को धुएं से मुक्त रसोई उपलब्ध कराना था। योजना के तहत पात्र परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए ताकि वे लकड़ी, कोयला और गोबर के उपलों जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम कर सकें।
योजना शुरू होने के समय लाभार्थियों को सालाना 12 सब्सिडी वाले 14.2 किलोग्राम एलपीजी सिलेंडर उपलब्ध कराए जाते थे। बाद में सरकार ने इस संख्या को घटाकर नौ कर दिया था। अब इसे और कम करते हुए केवल चार सिलेंडर प्रति वर्ष कर दिया गया है।
सरकार का तर्क है कि अधिकांश उज्ज्वला लाभार्थी साल में चार से पांच सिलेंडर ही उपयोग करते हैं, इसलिए नई सीमा वास्तविक खपत के अधिक करीब है।
सरकार ने क्यों घटाई सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या?
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव प्रवीण मल खनूजा के अनुसार यह निर्णय उज्ज्वला लाभार्थियों के वास्तविक उपभोग पैटर्न को ध्यान में रखकर लिया गया है। उन्होंने मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि सरकार द्वारा निर्धारित नई सीमा औसत वार्षिक खपत को दर्शाती है।
सरकार का मानना है कि बड़ी संख्या में लाभार्थी पहले से ही नौ सिलेंडर की पूरी सीमा का उपयोग नहीं कर रहे थे। ऐसे में सब्सिडी का बड़ा हिस्सा अप्रयुक्त रह जाता था। नई व्यवस्था के जरिए सब्सिडी को अधिक लक्षित और प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के परिवारों में एलपीजी उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी की उपलब्धता कम करने के बजाय रिफिल को और सस्ता बनाया जाना चाहिए था।
2022 में शुरू हुई थी टारगेटेड सब्सिडी
सरकार ने मई 2022 में उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए विशेष एलपीजी सब्सिडी शुरू की थी। इसके तहत प्रत्येक 14.2 किलोग्राम सिलेंडर पर 200 रुपये की सहायता सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा की जाती थी।
अक्टूबर 2023 में सरकार ने इस सहायता राशि को बढ़ाकर 300 रुपये प्रति सिलेंडर कर दिया। पांच किलोग्राम वाले छोटे सिलेंडरों पर भी इसी अनुपात में लाभ दिया जाने लगा।
सरकार के अनुसार इस कदम का उद्देश्य गरीब परिवारों पर महंगाई का बोझ कम करना और उन्हें स्वच्छ ईंधन का उपयोग जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करना था।
लगातार बढ़ रही हैं एलपीजी की कीमतें
सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या में कटौती ऐसे समय में हुई है जब एलपीजी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत पिछले तीन महीनों में दो बार बढ़ाई गई है। इस दौरान कुल 89 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। 7 जून को हुई हालिया वृद्धि के बाद दिल्ली में एलपीजी सिलेंडर की कीमत 942 रुपये तक पहुंच गई।
उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को 300 रुपये की सब्सिडी मिलने के बाद भी एक सिलेंडर के लिए लगभग 642 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। ऐसे में सीमित आय वाले परिवारों के लिए एलपीजी रिफिल कराना पहले की तुलना में महंगा होता जा रहा है।
सरकार पर कितना है सब्सिडी का बोझ?
प्रवीण मल खनूजा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के कारण घरेलू एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई लागत लगभग 1,600 रुपये प्रति सिलेंडर तक पहुंच गई है।
इसके मुकाबले उपभोक्ताओं से काफी कम कीमत वसूली जाती है। सरकार के अनुसार प्रति सिलेंडर औसतन लगभग 1,000 रुपये की सहायता अप्रत्यक्ष रूप से दी जा रही है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2022 से अब तक एलपीजी सब्सिडी पर करीब 52,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। यही वजह है कि सरकार सब्सिडी ढांचे को अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ बनाने की दिशा में कदम उठा रही है।
मिडिल ईस्ट संकट का एलपीजी बाजार पर असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतों में तेजी का सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव माना जा रहा है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार फरवरी के बाद से मिडिल ईस्ट क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर वैश्विक एलपीजी बाजार पर पड़ा है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और एलपीजी की आयात लागत सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (Saudi CP) से जुड़ी होती है। यह वैश्विक स्तर पर एलपीजी का प्रमुख बेंचमार्क माना जाता है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार फरवरी के बाद से सऊदी सीपी में करीब 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव और आपूर्ति संबंधी चिंताओं ने कीमतों को ऊपर धकेला है।
क्या उज्ज्वला लाभार्थियों पर पड़ेगा असर?
सरकार का दावा है कि नई सीमा लाभार्थियों की औसत खपत के अनुरूप है और अधिकांश परिवारों को इससे कोई विशेष परेशानी नहीं होगी। लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि कुछ परिवारों पर इसका असर दिखाई दे सकता है।
ग्रामीण इलाकों में कई परिवार सालाना चार से अधिक सिलेंडर का उपयोग करते हैं। ऐसे परिवारों को अतिरिक्त सिलेंडर बाजार मूल्य पर खरीदने होंगे। यदि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कीमतें और बढ़ती हैं तो घरेलू बजट पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि उज्ज्वला योजना की सफलता केवल कनेक्शन देने में नहीं बल्कि नियमित रिफिल सुनिश्चित करने में है। यदि रिफिल की लागत बढ़ती रही तो कुछ परिवार फिर से पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट सकते हैं।
NewsJagran Analysis
उज्ज्वला योजना में सब्सिडी वाले सिलेंडरों की सीमा को नौ से घटाकर चार करना सरकार की वित्तीय रणनीति और वास्तविक खपत के आंकड़ों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश माना जा सकता है। एक तरफ सरकार बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सब्सिडी के बोझ को नियंत्रित करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ गरीब परिवारों के लिए एलपीजी को सुलभ बनाए रखना भी उसकी प्राथमिकता है।
आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या उज्ज्वला लाभार्थियों की रिफिल दर में कोई गिरावट आती है या नहीं। यदि रिफिल दर प्रभावित होती है तो सरकार को भविष्य में सब्सिडी नीति की फिर से समीक्षा करनी पड़ सकती है। फिलहाल यह फैसला एलपीजी क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों का सबसे बड़ा नीतिगत बदलाव माना जा रहा है।


