Vedanta ने गुजरात के CB-OS/2 ऑफशोर ऑयल और गैस ब्लॉक के कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती दी है। जानिए पूरा मामला और ONGC पर इसका असर।
Vedanta News: दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ डिवीजन बेंच पहुंची कंपनी
अरबपति अनिल अग्रवाल की अगुवाई वाली Vedanta Ltd ने गुजरात के CB-OS/2 ऑफशोर ऑयल और गैस ब्लॉक से जुड़े मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया है। यह मामला समुद्र के नीचे स्थित तेल और गैस भंडार के संचालन अधिकारों से जुड़ा है, जिस पर अब कानूनी लड़ाई और तेज हो गई है।
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने केंद्र सरकार के उस फैसले को सही ठहराया था, जिसमें वेदांता को कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन देने से इनकार किया गया था। अब कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ अपील दाखिल कर दी है और मामला डिवीजन बेंच के समक्ष विचाराधीन है।
कंपनी ने क्या कहा?
वेदांता की ओर से जारी बयान में कहा गया,
“माननीय दिल्ली हाई कोर्ट ने 22 जुलाई 2026 को CB-OS/2 ब्लॉक से जुड़े मामले में अपना आदेश सुनाया। हमने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष अपील दायर की है। मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है।”
कंपनी का कहना है कि वह अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए सभी उपलब्ध विकल्पों का उपयोग करेगी।
क्या है CB-OS/2 ऑफशोर ब्लॉक विवाद?
पूरा विवाद गुजरात के कैम्बे बेसिन में स्थित CB-OS/2 ऑफशोर ऑयल और गैस ब्लॉक को लेकर है। इस ब्लॉक में लक्ष्मी और गौरी गैस फील्ड शामिल हैं, जो अरब सागर में गुजरात के सुवाली तट के पास स्थित हैं।
वेदांता ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें कंपनी के प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) की अवधि बढ़ाने से इनकार किया गया था।
सरकार ने एक्सटेंशन क्यों नहीं दिया?
केंद्र सरकार ने सितंबर 2025 में 2017 की प्री-NELP कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन पॉलिसी के तहत वेदांता को 10 वर्षों का विस्तार देने से इनकार कर दिया था।
कंपनी का PSC 29 जून 2023 को समाप्त हो गया था। हालांकि, समीक्षा प्रक्रिया के दौरान सरकार ने कुछ अंतरिम विस्तार दिए, लेकिन अंतिम निर्णय में कॉन्ट्रैक्ट बढ़ाने से मना कर दिया और ब्लॉक की संपत्तियां तथा संचालन ONGC को सौंपने का फैसला लिया।
इसी निर्णय को वेदांता ने पहले सिंगल बेंच में चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने सरकार के फैसले को वैध माना। अब कंपनी ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की है।
ONGC के लिए क्या मायने रखता है फैसला?
यदि हाई कोर्ट का पूर्व आदेश बरकरार रहता है, तो ONGC इस ऑफशोर ब्लॉक की परिसंपत्तियों और संचालन का पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में ले सकती है।
इस ब्लॉक में पहले से ही ONGC की 50% हिस्सेदारी है, जबकि Vedanta के पास 40% हिस्सेदारी है। शेष हिस्सेदारी अन्य भागीदारों के पास है। ऐसे में अदालत के अंतिम फैसले का असर ब्लॉक के भविष्य के संचालन और उत्पादन पर पड़ सकता है।
1998 में मिला था ब्लॉक
CB-OS/2 ऑफशोर ब्लॉक का आवंटन वर्ष 1998 में केर्न एनर्जी, टाटा पेट्रोडाइन और ONGC के कंसोर्टियम को किया गया था। बाद के वर्षों में कॉर्पोरेट पुनर्गठन के बाद Vedanta इस परियोजना की ऑपरेटर बनी।
यह ब्लॉक पश्चिमी भारत के महत्वपूर्ण गैस उत्पादक क्षेत्रों में शामिल माना जाता है और इससे जुड़े फैसले ऊर्जा क्षेत्र के लिए अहम माने जा रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला?
यह विवाद केवल एक कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ऊर्जा क्षेत्र में सरकार की कॉन्ट्रैक्ट नीति, पुराने प्री-NELP ब्लॉकों के भविष्य और निजी कंपनियों की भागीदारी पर भी असर पड़ सकता है।
यदि डिवीजन बेंच वेदांता के पक्ष में फैसला देती है, तो कंपनी को ब्लॉक के संचालन का अवसर मिल सकता है। वहीं, सरकार और ONGC के पक्ष में फैसला बरकरार रहने पर ब्लॉक का नियंत्रण पूरी तरह ONGC के पास चला जाएगा।


