नई दिल्ली: होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) में बढ़ते तनाव के बाद अब लाल सागर (Red Sea) भी वैश्विक तेल बाजार के लिए नया संकट बनकर उभरा है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर हमले का दावा किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। गुरुवार की लेट ट्रेडिंग में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई (WTI) भी करीब 92 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ गया।
तेल बाजार में आई इस तेजी ने दुनिया भर के आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है। भारत, जो अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, उसके लिए यह स्थिति आर्थिक मोर्चे पर गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है।
होर्मुज के बाद अब रेड सी में बढ़ा खतरा
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अब हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में भी अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमले के बाद वैश्विक शिपिंग कंपनियों और तेल कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है।
इससे पहले जहाजों पर अधिकतर खतरा होर्मुज स्ट्रेट के आसपास केंद्रित था, लेकिन अब रेड सी में बढ़ते हमलों ने यह संकेत दिया है कि तेल आपूर्ति के प्रमुख समुद्री मार्ग भी असुरक्षित होते जा रहे हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है लाल सागर का रास्ता?
रेड सी सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है।
- बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होकर प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चा तेल गुजरता है।
- दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 12 से 15 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से संचालित होता है।
- इस रूट से हर साल 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक मूल्य का सामान दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है।
- होर्मुज स्ट्रेट में बढ़े जोखिम के बाद कई जहाज इसी मार्ग का इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन अब यहां भी खतरा बढ़ गया है।
100 डॉलर के पार पहुंचा ब्रेंट क्रूड
रेड सी में तनाव बढ़ने के बाद तेल बाजार में जबरदस्त खरीदारी देखने को मिली।
- ब्रेंट क्रूड 6 प्रतिशत से अधिक उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया।
- अमेरिकी WTI क्रूड लगभग 92 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ गया।
- पिछले एक महीने में कच्चे तेल की कीमतों में 35 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई है।
- साल 2026 की शुरुआत से अब तक क्रूड ऑयल करीब 60 प्रतिशत महंगा हो चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो तेल की कीमतों में आगे भी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
1. पेट्रोल-डीजल हो सकते हैं महंगे
यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है तो तेल विपणन कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ेगा। इससे आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है।
2. महंगाई बढ़ने का खतरा
ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है। इसका असर फल, सब्जी, दूध, राशन, सीमेंट, स्टील और अन्य रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है।
3. आयात बिल बढ़ेगा
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। तेल महंगा होने से सरकार और कंपनियों का आयात खर्च बढ़ जाएगा, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) और ट्रेड डेफिसिट पर दबाव बढ़ सकता है।
4. रुपये पर बढ़ेगा दबाव
तेल आयात के लिए अधिक अमेरिकी डॉलर की जरूरत होगी। डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है। कमजोर रुपया आयात को और महंगा बना देता है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ जाता है।
5. शेयर बाजार पर असर
तेल की कीमतों में तेजी का असर शेयर बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। खासकर एविएशन, पेंट, टायर, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत बढ़ सकती है, जबकि तेल एवं गैस क्षेत्र की कुछ कंपनियों को फायदा मिल सकता है।
क्या आगे और बढ़ सकती हैं कीमतें?
कमोडिटी बाजार के जानकारों का कहना है कि यदि रेड सी और होर्मुज स्ट्रेट दोनों क्षेत्रों में तनाव जारी रहता है और तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के ऊपर कुछ समय तक बना रह सकता है। हालांकि कीमतों की दिशा काफी हद तक भू-राजनीतिक घटनाक्रम, ओपेक+ की रणनीति और वैश्विक मांग पर निर्भर करेगी।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती
भारत ने हाल के वर्षों में रूस समेत कई देशों से रियायती दरों पर तेल खरीदकर आयात लागत को नियंत्रित रखा है। लेकिन यदि वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर सरकारी वित्त, महंगाई, रुपये और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ना तय माना जा रहा है।
ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार, तेल कंपनियों और भारतीय रिजर्व बैंक की रणनीति पर बाजार की नजर रहेगी। यदि मध्य पूर्व में तनाव कम नहीं हुआ, तो ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।


