नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का करीब 30,000 करोड़ रुपये का प्रस्तावित आईपीओ भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा पब्लिक इश्यू माना जा रहा है। लेकिन लगभग एक दशक की देरी के बाद आ रहे इस आईपीओ के सामने अब भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। एक ओर वर्षों पुराना को-लोकेशन (Co-location) विवाद अंतिम चरण में है, वहीं दूसरी ओर SEBI द्वारा डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पर लगाए गए नए नियमों ने एक्सचेंज की आय, मुनाफे और बाजार हिस्सेदारी पर असर डाला है।
वैल्यू रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों वजहों ने निवेशकों के बीच NSE IPO को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या था NSE का को-लोकेशन विवाद?
NSE का को-लोकेशन विवाद वर्ष 2010 से 2014 के बीच सामने आया था। आरोप था कि कुछ चुनिंदा ब्रोकर्स एक्सचेंज के डेटा सेंटर के बैकअप सर्वर से अन्य प्रतिभागियों की तुलना में पहले जुड़ जाते थे। इससे उन्हें बाजार की जानकारी कुछ मिलीसेकेंड पहले मिल जाती थी, जिससे ट्रेडिंग में अनुचित बढ़त (Unfair Advantage) हासिल होती थी।
बाद में फॉरेंसिक ऑडिट में इस पैटर्न की पुष्टि हुई, जिसके बाद SEBI ने मामले की जांच शुरू की। यही विवाद NSE के आईपीओ में सबसे बड़ी बाधा बन गया।
2016 में दाखिल हुआ था ड्राफ्ट, लेकिन अटक गया IPO
NSE ने वर्ष 2016 में अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था, लेकिन उस समय तक को-लोकेशन विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। नियामकीय अनिश्चितता के चलते IPO प्रक्रिया रोक दी गई।
इसके बाद मामला SEBI की कार्रवाई, अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसके कारण लिस्टिंग लगभग एक दशक तक टलती रही।
1,491 करोड़ रुपये के सेटलमेंट से खुल सकता है रास्ता
रिपोर्ट के मुताबिक, अब यह मामला अंतिम चरण में पहुंच चुका है। NSE ने SEBI के समक्ष 1,491 करोड़ रुपये के संशोधित सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा है। यदि इसे मंजूरी मिलती है तो लंबे समय से अटका IPO आखिरकार आगे बढ़ सकता है।
आशीष चौहान की वापसी से मिली नई रफ्तार
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में आशीष चौहान की NSE में वापसी ने IPO प्रक्रिया को फिर गति दी। चौहान NSE की संस्थापक टीम का हिस्सा रह चुके हैं और उन्होंने BSE की 2017 की सफल लिस्टिंग का नेतृत्व भी किया था।
उनकी वापसी से एक्सचेंज की नियामकीय विश्वसनीयता मजबूत हुई और IPO की तैयारियां दोबारा तेज हो गईं।
कारोबार बढ़ा, लेकिन ऑप्शंस ट्रेडिंग पर बढ़ी निर्भरता
हालांकि NSE सूचीबद्ध नहीं हो पाया, लेकिन पिछले एक दशक में उसके कारोबार में जबरदस्त विस्तार हुआ।
- पिछले 10 वर्षों में एक्सचेंज की आय करीब 9 गुना बढ़ी।
- वर्ष 2016 में कुल आय में ट्रांजैक्शन चार्ज की हिस्सेदारी 49.5% थी।
- वित्त वर्ष 2026 तक यह बढ़कर 78.7% हो गई।
- आज NSE की कुल परिचालन आय का लगभग 60% हिस्सा ऑप्शंस ट्रेडिंग से आता है।
यानी एक्सचेंज की कमाई का बड़ा आधार डेरिवेटिव्स कारोबार बन चुका है।
SEBI के नए नियमों से क्यों बढ़ी चिंता?
SEBI के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में 91% रिटेल फ्यूचर्स एवं ऑप्शंस (F&O) ट्रेडर्स को शुद्ध नुकसान हुआ, जिसकी कुल राशि करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये रही।
इसी के बाद नियामक ने डेरिवेटिव्स बाजार में कई बड़े बदलाव लागू किए, जिनमें शामिल हैं—
- दोनों एक्सचेंजों के कई साप्ताहिक एक्सपायरी दिनों को घटाकर एक करना।
- NSE निफ्टी की साप्ताहिक एक्सपायरी मंगलवार तय करना।
- BSE सेंसेक्स की एक्सपायरी गुरुवार निर्धारित करना।
- कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाना।
- एक्सपायरी के समय अतिरिक्त मार्जिन लागू करना।
नए नियमों का NSE पर क्या असर पड़ा?
वित्त वर्ष 2026 इन नए नियमों के तहत संचालन का पहला पूरा वर्ष रहा।
इस दौरान—
- परिचालन आय में लगभग 3% की गिरावट दर्ज हुई।
- समायोजित शुद्ध लाभ 17% घटकर 9,101 करोड़ रुपये रह गया, जबकि पिछले वर्ष यह 10,978 करोड़ रुपये था।
- इक्विटी ऑप्शंस बाजार में NSE की हिस्सेदारी 97% से घटकर 75% रह गई।
रिपोर्ट के अनुसार, इससे स्पष्ट है कि NSE की आय अभी भी काफी हद तक ऑप्शंस कारोबार पर निर्भर है और फिलहाल अन्य व्यवसाय इस गिरावट की भरपाई करने की स्थिति में नहीं हैं।
अन्य आय के स्रोत भी बने हुए हैं मजबूत
हालांकि एक्सचेंज की कुल आय का लगभग 21% हिस्सा अपेक्षाकृत स्थिर स्रोतों से आता है, जिनमें शामिल हैं—
- डेटा फीड्स
- लिस्टिंग फीस
- इंडेक्स लाइसेंसिंग
- को-लोकेशन चार्ज
इन व्यवसायों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है और भविष्य में आय के विविधीकरण में इनकी अहम भूमिका हो सकती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। IPO या शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार या प्रमाणित निवेश सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।


