भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर टिकी है ब्राउन-फोरमैन की उम्मीद
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील पर दुनिया की कई बड़ी कंपनियों की नजर बनी हुई है। इनमें अमेरिकी प्रीमियम स्पिरिट्स कंपनी ब्राउन-फोरमैन भी शामिल है, जो मशहूर Jack Daniel’s व्हिस्की की निर्माता है। कंपनी को उम्मीद है कि यदि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का पहला चरण जुलाई 2026 तक पूरा हो जाता है तो उसके भारतीय कारोबार को नई गति मिल सकती है।
हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिया था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का पहला चरण जुलाई के मध्य तक अंतिम रूप ले सकता है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी दोनों देशों के बीच जल्द समझौते की उम्मीद जताई है। ऐसे में अमेरिकी कंपनियां भारतीय बाजार में संभावित अवसरों का आकलन कर रही हैं।
भारत क्यों है ब्राउन-फोरमैन के लिए महत्वपूर्ण बाजार?
भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। शराब उद्योग के लिए भी भारत एक बड़ा अवसर माना जाता है क्योंकि यहां युवा आबादी लगातार बढ़ रही है और प्रीमियम उत्पादों की मांग में तेजी देखी जा रही है।
ब्राउन-फोरमैन इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर गौरव सभरवाल के अनुसार कंपनी भारत-अमेरिका ट्रेड डील से जुड़े हर घटनाक्रम पर करीबी नजर रख रही है। इसकी वजह यह है कि कंपनी का अधिकांश कारोबार अमेरिकी व्हिस्की पर आधारित है और उसके सभी प्रमुख उत्पाद भारत में आयात किए जाते हैं।
कंपनी वर्तमान में भारत में Jack Daniel’s के अलावा Woodford Reserve और Herradura जैसे प्रीमियम ब्रांड्स को भी बढ़ावा दे रही है। भारत में अभी कंपनी की कोई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट नहीं है और पूरा पोर्टफोलियो आयात के जरिए बेचा जाता है।
आयात शुल्क में कमी से क्या होगा फायदा?
भारतीय बाजार में विदेशी शराब की कीमतें काफी हद तक आयात शुल्क और राज्य स्तरीय टैक्स पर निर्भर करती हैं। यदि भारत-अमेरिका ट्रेड डील के तहत अमेरिकी स्पिरिट्स पर लगने वाले शुल्क में किसी प्रकार की राहत मिलती है तो ब्राउन-फोरमैन जैसी कंपनियों को बड़ा फायदा हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कम आयात शुल्क से अमेरिकी व्हिस्की की कीमतें अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकती हैं। इससे प्रीमियम शराब खरीदने वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ सकती है और विदेशी ब्रांड्स की पहुंच बड़े शहरों से निकलकर दूसरे बाजारों तक हो सकती है।
हालांकि भारत सरकार शराब जैसे संवेदनशील उत्पादों पर किसी भी शुल्क कटौती को लेकर बेहद सावधानी बरतती है क्योंकि इससे घरेलू उद्योग और राज्यों के राजस्व पर असर पड़ सकता है।
महंगाई और बढ़ती लागत बनी चुनौती
ब्राउन-फोरमैन ने यह भी स्वीकार किया है कि बढ़ती महंगाई, ईंधन की ऊंची कीमतें और परिवहन लागत कारोबार के लिए चुनौती बनी हुई हैं। गौरव सभरवाल के मुताबिक जब उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव बढ़ता है तो वे सबसे पहले गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करते हैं।
प्रीमियम शराब उद्योग भी इससे अछूता नहीं रहता। यदि लोगों की आय का बड़ा हिस्सा आवश्यक खर्चों में जाने लगता है तो प्रीमियम उत्पादों की बिक्री प्रभावित हो सकती है।
फिलहाल कंपनी का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का उसके भारतीय कारोबार पर कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ा है, लेकिन सप्लाई चेन और लागत पर संभावित प्रभाव को लेकर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
Jack & Coke जैसे रेडी-टू-ड्रिंक उत्पादों पर भी फोकस
भारतीय बाजार में बदलती उपभोक्ता पसंद को देखते हुए कंपनी रेडी-टू-ड्रिंक (RTD) श्रेणी पर भी ध्यान दे रही है। Jack & Coke इसी रणनीति का हिस्सा है।
करीब तीन वर्ष पहले इस उत्पाद को गोवा, हरियाणा और बेंगलुरु जैसे बाजारों में लॉन्च किया गया था। हालांकि अभी इसका बाजार सीमित है, लेकिन कंपनी को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इस श्रेणी की मांग तेजी से बढ़ सकती है।
दुनिया के कई देशों में रेडी-टू-ड्रिंक पेय पदार्थ तेजी से लोकप्रिय हुए हैं क्योंकि वे सुविधा और प्रीमियम ब्रांड अनुभव दोनों प्रदान करते हैं।
अगले पांच साल में बढ़ेगा बड़ा ग्राहक वर्ग
ब्राउन-फोरमैन की नजर भारत की जनसांख्यिकीय ताकत पर भी है। कंपनी का अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में हर साल करीब दो करोड़ लोग कानूनी रूप से शराब पीने की आयु वर्ग में शामिल होंगे।
इसके अलावा शहरीकरण, बढ़ती आय और प्रीमियम उत्पादों की मांग भी विदेशी शराब कंपनियों के लिए अवसर पैदा कर रही है। पिछले एक दशक में भारतीय उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसका फायदा प्रीमियम ब्रांड्स को मिल रहा है।
भारतीय शराब उद्योग पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि भारत-अमेरिका ट्रेड डील में शराब क्षेत्र को किसी प्रकार की राहत मिलती है तो इसका असर भारतीय शराब उद्योग पर भी पड़ सकता है। विदेशी ब्रांड्स को अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध कराने से घरेलू कंपनियों के सामने प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
हालांकि भारत का शराब बाजार अभी भी बड़े पैमाने पर घरेलू कंपनियों के नियंत्रण में है। यूनाइटेड स्पिरिट्स, रैडिको खेतान और Allied Blenders जैसी कंपनियां मजबूत वितरण नेटवर्क और स्थानीय ब्रांड्स के दम पर बाजार में मजबूत स्थिति रखती हैं।
क्या है आगे का रास्ता?
फिलहाल उद्योग की नजर जुलाई में संभावित भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर टिकी हुई है। यदि समझौता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता है तो अमेरिकी स्पिरिट्स कंपनियों के लिए भारत का बाजार और आकर्षक बन सकता है।
ब्राउन-फोरमैन जैसी कंपनियां पहले से ही अपने पोर्टफोलियो का विस्तार कर रही हैं और भारतीय उपभोक्ताओं की बदलती पसंद के अनुरूप नए उत्पाद पेश कर रही हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रेड डील का अंतिम स्वरूप क्या होता है और उससे भारतीय शराब बाजार में किस प्रकार के बदलाव देखने को मिलते हैं।


