नई दिल्ली | कृषि और अर्थव्यवस्था डेस्क
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था, जो देश की लगभग आधी आबादी की आजीविका का आधार है, एक बार फिर गंभीर मौसमीय और वैश्विक चुनौतियों के घेरे में दिखाई दे रही है। रेटिंग एजेंसी ICRA की हालिया रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि आने वाला वित्तीय वर्ष भारतीय कृषि के लिए आसान नहीं रहने वाला।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर मानसून, एल-नीनो बनने की संभावना और वेस्ट एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव मिलकर भारतीय कृषि क्षेत्र पर एक साथ दबाव बना सकते हैं। यह स्थिति न केवल उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, बल्कि ग्रामीण आय, महंगाई और देश की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर भी असर डाल सकती है।
2026 मानसून पूर्वानुमान: 25 साल का सबसे कमजोर शुरुआती अनुमान
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पहले लॉन्ग-रेंज फोरकास्ट के अनुसार, 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून में बारिश लगभग 92% (±5%) LPA रहने का अनुमान है।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ICRA के अनुसार यह पिछले 25 वर्षों में सबसे कम शुरुआती पूर्वानुमानों में से एक है।
तुलना करें तो:
- 2024 और 2025 में बारिश सामान्य से अधिक रही थी (लगभग 108%)
- लेकिन 2026 में स्थिति पूरी तरह बदलती दिख रही है
कम बारिश का सीधा असर खरीफ सीजन पर पड़ता है, क्योंकि धान, मक्का, सोयाबीन और दालें पूरी तरह मानसून पर निर्भर रहती हैं।
खरीफ फसलें क्यों सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं?
भारत की कृषि व्यवस्था में खरीफ सीजन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान देश का बड़ा खाद्यान्न उत्पादन होता है।
ICRA रिपोर्ट के अनुसार अगर बारिश कमजोर रहती है, तो इसका प्रभाव तीन स्तरों पर पड़ता है:
पहला, किसानों की बुवाई कम हो जाती है क्योंकि खेतों में नमी पर्याप्त नहीं होती।
दूसरा, फसल उत्पादन घटता है जिससे बाजार में आपूर्ति कम हो जाती है।
तीसरा, खाद्य कीमतें बढ़ने लगती हैं जिससे महंगाई पर सीधा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मानसून कमजोर रहता है तो कृषि GDP growth भी दबाव में आ सकती है।
एल-नीनो का खतरा: मानसून को और कमजोर कर सकता है मौसम पैटर्न
ICRA ने अपनी रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण चेतावनी दी है—एल-नीनो बनने की 62% संभावना।
एल-नीनो एक जलवायु स्थिति है जो आमतौर पर भारतीय मानसून को कमजोर करती है। यह तब बनती है जब प्रशांत महासागर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो:
- एल-नीनो वर्षों में भारत में सूखा पड़ने की संभावना बढ़ जाती है
- कृषि उत्पादन में गिरावट आती है
- खाद्य महंगाई में तेज उछाल देखा जाता है
ICRA का कहना है कि यदि एल-नीनो प्रभावी हुआ तो बारिश के पैटर्न में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
वेस्ट एशिया युद्ध और फर्टिलाइज़र सप्लाई संकट
कृषि क्षेत्र के लिए तीसरा बड़ा खतरा भू-राजनीतिक है।
वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण:
- फर्टिलाइज़र कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है
- आयात लागत बढ़ सकती है
- और घरेलू उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है
भारत अपनी बड़ी फर्टिलाइज़र जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में किसी भी वैश्विक सप्लाई बाधा का सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ता है।
अगर खाद की कीमतें बढ़ती हैं, तो छोटे और मध्यम किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि उनकी उत्पादन लागत पहले से ही सीमित मार्जिन पर चलती है।
कृषि GVA और महंगाई पर संभावित असर
ICRA ने अपने अनुमान में कहा है कि इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव कृषि ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार:
- कृषि GVA ग्रोथ अनुमान 3% के आसपास रह सकता है
- लेकिन downside risk काफी बढ़ गया है
- CPI inflation 4.5% से ऊपर जा सकती है
इसका मतलब यह है कि अगर स्थिति बिगड़ती है तो देश में खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और आम उपभोक्ता पर महंगाई का दबाव महसूस हो सकता है।
फिर भी राहत की एक किरण: जलाशयों में बेहतर स्टोरेज
हालांकि स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। रिपोर्ट में एक सकारात्मक संकेत भी दिया गया है।
अप्रैल 2026 तक:
- देश में जलाशयों का स्तर 47% तक पहुंच गया है
- पिछले साल यह 40% था
- और 10 साल का औसत 37% है
इसका मतलब है कि देश के पास इस बार पानी का बेहतर बफर मौजूद है, जो शुरुआती नुकसान को कुछ हद तक कम कर सकता है।
हालांकि पूर्वी और दक्षिणी भारत में स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर बताई गई है।
MSP और ग्रामीण मांग का रोल
ICRA ने यह भी कहा है कि आने वाले समय में Minimum Support Price (MSP) में संतुलित वृद्धि जरूरी होगी।
अगर MSP बढ़ाया जाता है तो:
- किसानों की आय स्थिर रह सकती है
- ग्रामीण मांग सपोर्ट हो सकती है
- और आर्थिक दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है
इसके साथ ही रबी फसल की आय शुरुआती महीनों में ग्रामीण मांग को सपोर्ट कर सकती है।
निष्कर्ष: भारतीय कृषि के सामने “ट्रिपल चैलेंज” का दौर
ICRA की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि भारतीय कृषि एक जटिल मोड़ पर खड़ी है।
कमजोर मानसून, एल-नीनो का खतरा और वैश्विक युद्ध से जुड़े सप्लाई शॉक—ये तीनों मिलकर एक ऐसा दबाव बना सकते हैं जिसका असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा।
हालांकि जलाशयों की स्थिति और नीति समर्थन कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन असली स्थिति पूरी तरह मानसून के व्यवहार और वैश्विक घटनाओं पर निर्भर करेगी।
आने वाले महीनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या मौसम और भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ भारत के कृषि ढांचे को स्थिर रख पाती हैं या नहीं।
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