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Reading: India Energy Import: तेल, LPG-LNG में क्या रूस की जगह ले सकता है अमेरिका? भारत की ऊर्जा रणनीति में वेनेजुएला भी बन रहा बड़ा फैक्टर
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India Energy Import: तेल, LPG-LNG में क्या रूस की जगह ले सकता है अमेरिका? भारत की ऊर्जा रणनीति में वेनेजुएला भी बन रहा बड़ा फैक्टर

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 7:19 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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11 Min Read
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नई दिल्ली। दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारत की ऊर्जा आयात रणनीति एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फरवरी में दावा किया था कि भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करेगा और अमेरिका के साथ ऊर्जा व्यापार बढ़ाएगा। हालांकि, चार महीने बाद सामने आए आंकड़े बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं। रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, जबकि अमेरिका शीर्ष पांच सप्लायरों में भी जगह नहीं बना पाया है।

Contents
क्या भारत की ऊर्जा जरूरतों में रूस अभी भी सबसे अहम है?भारत के टॉप सप्लायरों की सूची में क्या बदला?भारत का रुख हमेशा ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित रहाक्या अमेरिका वास्तव में रूस की जगह ले सकता है?वेनेजुएला क्यों बन रहा है बड़ा फैक्टर?असली कहानी LPG और LNG की हैअमेरिका से LNG खरीदना क्यों फायदेमंद हो सकता है?होर्मुज स्ट्रेट क्यों बना हुआ है सबसे बड़ा जोखिम?भारत की ऊर्जा रणनीति का अगला चरण क्या होगा?

इसके बावजूद भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा संबंध कमजोर नहीं हुए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह साझेदारी अब कच्चे तेल से हटकर LPG, LNG और अन्य गैस आधारित ईंधन की तरफ बढ़ती दिखाई दे रही है। इसी दौरान वेनेजुएला भी भारत के लिए एक अहम ऊर्जा स्रोत बनकर उभरा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका वास्तव में रूस की जगह ले सकता है या भारत की ऊर्जा रणनीति का भविष्य कुछ और कहानी बयां कर रहा है?

क्या भारत की ऊर्जा जरूरतों में रूस अभी भी सबसे अहम है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में सस्ती और भरोसेमंद सप्लाई भारत की प्राथमिकता रहती है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूसी तेल की खरीद जारी रखी।

ग्लोबल डेटा और एनालिटिक्स फर्म केप्लर के अनुसार मई 2026 में भी रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना रहा। भारतीय रिफाइनरियों ने अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली छूट का लाभ उठाते हुए रूसी तेल की खरीद बढ़ाई, जिससे आयात का स्तर फिर से 2023 के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया। उस समय भारत प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल रूसी तेल आयात कर रहा था।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी तेल भारत के लिए सिर्फ सस्ता विकल्प नहीं है बल्कि भारतीय रिफाइनिंग सिस्टम के लिए तकनीकी रूप से भी अधिक उपयुक्त है। यही वजह है कि रूस की हिस्सेदारी अभी भी मजबूत बनी हुई है।

भारत के टॉप सप्लायरों की सूची में क्या बदला?

मई महीने में एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि संयुक्त अरब अमीरात भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया। यूएई से औसतन 5.61 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात हुआ। दूसरी ओर सऊदी अरब तीसरे स्थान पर खिसक गया, जहां से भारत ने लगभग 3.50 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा।

इस दौरान वेनेजुएला ने भी तेजी से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। पिछले कुछ महीनों में यह भारत के शीर्ष पांच कच्चे तेल सप्लायरों में शामिल हो गया है। ऊर्जा बाजार के जानकार मानते हैं कि वेनेजुएला की बढ़ती भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसके पीछे एक वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भी है। होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाली सप्लाई पर दबाव बढ़ने के कारण भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ रही है। ऐसे में वेनेजुएला जैसे देशों की भूमिका बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है।

भारत का रुख हमेशा ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित रहा

भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि तेल खरीद का फैसला किसी राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर लिया जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रूस के कच्चे तेल पर प्रत्यक्ष प्रतिबंध नहीं हैं। प्रतिबंध मुख्य रूप से कुछ रूसी कंपनियों और शिपिंग नेटवर्क पर लगाए गए हैं। इसलिए जिन रूसी तेल ग्रेड पर प्रतिबंध लागू नहीं हैं, उनका आयात आगे भी जारी रह सकता है।

यही कारण है कि भारत रूस के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को पूरी तरह खत्म करने के मूड में दिखाई नहीं देता। जब तक रूसी तेल प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध रहेगा, भारतीय रिफाइनरियां उसकी खरीद जारी रख सकती हैं।

क्या अमेरिका वास्तव में रूस की जगह ले सकता है?

ऊर्जा बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इसका जवाब फिलहाल “नहीं” है।

वोर्टेक्स के एपीएसी एनालिसिस प्रमुख इवान मैथ्यूज का कहना है कि अमेरिका से कच्चा तेल खरीदना भारत के लिए अपेक्षाकृत महंगा पड़ता है। अमेरिकी खाड़ी तट से भारत तक तेल पहुंचाने की परिवहन लागत काफी अधिक होती है। इसके अलावा अमेरिकी तेल मुख्य रूप से हल्का और कम सल्फर वाला होता है, जबकि भारत की अधिकांश रिफाइनरियां मध्यम और भारी ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई हैं।

रूसी यूराल्स क्रूड न केवल सस्ता पड़ता है बल्कि भारतीय रिफाइनिंग सिस्टम के लिए बेहतर विकल्प भी माना जाता है। यही वजह है कि अमेरिकी तेल के लिए रूस को पूरी तरह रिप्लेस करना आसान नहीं है।

आईसीआरए के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ भी मानते हैं कि दूरी और परिवहन लागत अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती है। भारत के लिए पश्चिम एशिया और रूस जैसे स्रोत अभी भी अधिक आर्थिक रूप से व्यवहार्य बने हुए हैं।

वेनेजुएला क्यों बन रहा है बड़ा फैक्टर?

भारत की ऊर्जा रणनीति में वेनेजुएला का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार वेनेजुएला का कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है क्योंकि यह भारी और उच्च सल्फर वाला क्रूड है।

ऐसे तेल की कीमत आमतौर पर कम होती है, जिससे भारतीय रिफाइनरों को बेहतर मार्जिन मिलता है। यदि होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई प्रभावित होती है और कीमतें अनुकूल रहती हैं तो भारत वेनेजुएला से और अधिक तेल खरीद सकता है।

हाल ही में वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज की भारत यात्रा भी इस बात का संकेत मानी जा रही है कि दोनों देश ऊर्जा सहयोग बढ़ाने में रुचि रखते हैं।

असली कहानी LPG और LNG की है

हालांकि सुर्खियों में हमेशा कच्चा तेल रहता है, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-अमेरिका ऊर्जा संबंधों का भविष्य वास्तव में LPG और LNG में छिपा है।

भारत तेजी से प्राकृतिक गैस आधारित अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है। घरेलू गैस उत्पादन मांग के मुकाबले कम है, इसलिए आयात की जरूरत लगातार बढ़ रही है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भारत को गैस आपूर्ति के नए स्रोत तलाशने के लिए प्रेरित किया है।

यहीं अमेरिका की भूमिका मजबूत होती दिखाई देती है।

केप्लर के विश्लेषक सुमित रिटोलिया के अनुसार एलएनजी, एलपीजी और ईथेन जैसे उत्पादों में भारत-अमेरिका ऊर्जा व्यापार तेजी से बढ़ सकता है। हाल के वर्षों में अमेरिका से इन उत्पादों का आयात लगातार बढ़ा है।

अमेरिका से LNG खरीदना क्यों फायदेमंद हो सकता है?

ऊर्जा बाजार में एलएनजी की कीमत अक्सर दो प्रमुख बेंचमार्क से जुड़ी होती है—ब्रेंट और हेनरी हब। अमेरिका से निर्यात होने वाली एलएनजी आमतौर पर हेनरी हब से जुड़ी होती है, जो कई बार ब्रेंट आधारित गैस से सस्ती पड़ती है।

आईसीआरए के प्रशांत वशिष्ठ का मानना है कि अमेरिका से एलएनजी आयात आर्थिक रूप से व्यवहार्य साबित हो सकता है। इससे भारत को गैस आपूर्ति में विविधता मिलेगी और पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम होगी।

भारत सरकार भी गैस आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन, पेट्रोकेमिकल और उर्वरक क्षेत्रों में बड़े निवेश को प्रोत्साहित कर रही है। ऐसे में अमेरिकी एलएनजी की भूमिका और बढ़ सकती है।

होर्मुज स्ट्रेट क्यों बना हुआ है सबसे बड़ा जोखिम?

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत की सबसे बड़ी चिंता रूस या अमेरिका नहीं बल्कि होर्मुज स्ट्रेट है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।

यदि यहां लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो भारत को तेल, एलपीजी और एलएनजी तीनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत अपनी ऊर्जा खरीद टोकरी को लगातार विविध बना रहा है।

वर्तमान में भारत 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है। इसका उद्देश्य किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है।

भारत की ऊर्जा रणनीति का अगला चरण क्या होगा?

विशेषज्ञों की राय में आने वाले वर्षों में रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बना रह सकता है। हालांकि उसकी हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम हो सकती है क्योंकि भारत सप्लाई स्रोतों में विविधता बढ़ा रहा है।

दूसरी ओर अमेरिका के साथ ऊर्जा संबंध तेजी से मजबूत हो सकते हैं, लेकिन यह बढ़ोतरी कच्चे तेल के बजाय LNG, LPG और ईथेन जैसे गैस आधारित उत्पादों में अधिक दिखाई देगी।

यानी भारत की ऊर्जा कहानी में रूस और अमेरिका दोनों की भूमिका रहेगी, लेकिन दोनों की जिम्मेदारियां अलग-अलग होंगी। रूस जहां कच्चे तेल का प्रमुख स्रोत बना रहेगा, वहीं अमेरिका भारत की गैस सुरक्षा और ऊर्जा ट्रांजिशन में महत्वपूर्ण भागीदार बन सकता है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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