नई दिल्ली: दुनिया के ऊर्जा बाजार में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक हालात भारत की तेल आयात रणनीति को भी प्रभावित कर रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा था, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर संकट और वैश्विक सप्लाई चेन को लेकर बढ़ती चिंताओं ने नई दिल्ली को अपने विकल्पों का दायरा बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है।
इसी कड़ी में वेनेजुएला एक बार फिर भारत के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार के रूप में उभर रहा है। हाल ही में वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग पर हुई बातचीत ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में भारत और वेनेजुएला के रिश्ते केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी नई दिशा देंगे।
भारत के लिए तेल क्यों है सबसे बड़ी रणनीतिक जरूरत?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85-90 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में होने वाला हर बड़ा बदलाव भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई, व्यापार घाटे और रुपये की स्थिति को प्रभावित करता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल तेल खरीदना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न हो। यदि किसी क्षेत्र में युद्ध, प्रतिबंध या समुद्री संकट पैदा हो जाए तो ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
यही कारण है कि भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाने की नीति पर काम कर रहा है।
यूक्रेन युद्ध के बाद कैसे बदला भारत का आयात पैटर्न?
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इसके चलते रूसी कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में छूट पर मिलने लगा।
भारतीय रिफाइनरियों ने इस अवसर का लाभ उठाया और रिकॉर्ड मात्रा में रूसी तेल खरीदना शुरू किया। परिणामस्वरूप रूस कुछ ही महीनों में भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।
इससे भारत को दो बड़े फायदे हुए।
पहला, तेल आयात बिल को नियंत्रित करने में मदद मिली।
दूसरा, वैश्विक बाजार में ऊंची कीमतों के बावजूद घरेलू ईंधन बाजार पर दबाव अपेक्षाकृत कम रहा।
हालांकि, किसी एक स्रोत पर बढ़ती निर्भरता को लेकर नीति निर्माताओं के भीतर चिंताएं भी बनी रहीं।
होर्मुज संकट ने क्यों बढ़ाई चिंता?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर एशियाई देशों तक पहुंचता है।
ऊर्जा बाजार के आंकड़ों के अनुसार, भारत के आयातित कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक इसी मार्ग से आता रहा है। यदि इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
पश्चिम एशिया में हाल के तनाव ने भारत सहित कई बड़े ऊर्जा आयातक देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि वैकल्पिक स्रोतों को मजबूत करना जरूरी है।
वेनेजुएला क्यों बन रहा है भारत का नया विकल्प?
वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार वाले देशों में शामिल है। हालांकि वर्षों तक अमेरिकी प्रतिबंधों और घरेलू आर्थिक संकट के कारण उसका तेल उत्पादन प्रभावित रहा।
लेकिन हाल के वर्षों में उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ा है और एशियाई बाजारों में उसकी मौजूदगी फिर मजबूत होने लगी है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार मई महीने में भारत वेनेजुएला के कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा। भारत ने प्रतिदिन लगभग 4.27 लाख बैरल तेल खरीदा।
यह आंकड़ा केवल व्यापारिक लेन-देन नहीं बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का संकेत भी माना जा रहा है।
वेनेजुएला का तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए पूरी तरह नया नहीं है। रिलायंस इंडस्ट्रीज और कुछ अन्य भारतीय कंपनियां पहले भी वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल प्रोसेस करती रही हैं।
क्या रूस की जगह ले लेगा वेनेजुएला?
विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
रूस फिलहाल भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ताओं में बना हुआ है। रूसी तेल कीमत, उपलब्धता और रिफाइनिंग कॉन्फिगरेशन के लिहाज से भारतीय कंपनियों के लिए अभी भी आकर्षक है।
वेनेजुएला को रूस के विकल्प के तौर पर नहीं बल्कि एक अतिरिक्त स्रोत के रूप में देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य जोखिम को कम करना और सप्लाई चैन को अधिक लचीला बनाना है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार यदि भारत रूस, खाड़ी देशों, अमेरिका, अफ्रीका और वेनेजुएला जैसे कई स्रोतों से तेल खरीदता है तो उसे बेहतर कीमतों पर बातचीत करने की शक्ति मिलती है।
भारत को क्या मिलेगा फायदा?
वेनेजुएला से बढ़ती खरीद भारत को कई स्तरों पर फायदा पहुंचा सकती है।
सबसे पहले, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। यदि किसी एक क्षेत्र में संकट आता है तो दूसरे स्रोत से आपूर्ति जारी रखी जा सकेगी।
दूसरा, भारतीय रिफाइनरियों के पास अधिक विकल्प होंगे जिससे वे लागत कम रखने में सक्षम होंगी।
तीसरा, अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारत की सौदेबाजी क्षमता बढ़ेगी क्योंकि वह किसी एक सप्लायर पर निर्भर नहीं रहेगा।
चौथा, दीर्घकाल में इससे ईंधन आयात लागत को संतुलित रखने में मदद मिल सकती है।
आगे क्या?
भारत की ऊर्जा नीति अब केवल सस्ता तेल खरीदने तक सीमित नहीं है। मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
डेल्सी रोड्रिगेज की भारत यात्रा और वेनेजुएला के साथ बढ़ते ऊर्जा संपर्क इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। आने वाले महीनों में यदि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते होते हैं तो भारत का तेल आयात मानचित्र और अधिक विविध हो सकता है।
निष्कर्ष
रूस अभी भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार बना रहेगा, लेकिन होर्मुज संकट और वैश्विक अनिश्चितताओं ने नई दिल्ली को यह समझा दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए विविधता जरूरी है। वेनेजुएला से बढ़ती तेल खरीद उसी रणनीति का हिस्सा है। इसका उद्देश्य रूस को हटाना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा आपूर्ति को अधिक सुरक्षित, संतुलित और भविष्य के संकटों के प्रति लचीला बनाना है।


