रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध का असर अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रह गया है। हाल के दिनों में यूक्रेन द्वारा रूस के कई महत्वपूर्ण तेल ठिकानों और ईंधन भंडारण केंद्रों पर किए गए ड्रोन हमलों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इन हमलों के बाद रूस अपने कच्चे तेल के निर्यात में बड़ी कटौती करने की तैयारी कर रहा है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ सकता है जो रूसी तेल पर काफी हद तक निर्भर हैं, और इनमें भारत सबसे प्रमुख खरीदारों में शामिल है।
भारत पिछले तीन वर्षों में रूस से सस्ते कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक बनकर उभरा है। ऐसे में अगर रूस के उत्पादन या निर्यात में कमी आती है तो इसका असर भारतीय तेल कंपनियों, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और देश की महंगाई दर तक दिखाई दे सकता है।
यूक्रेन के हमलों ने रूस के तेल ढांचे को पहुंचाया झटका
समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन ने हाल के दिनों में रूस के कई रणनीतिक तेल ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें नोवोरोस्सिय्स्क के पास स्थित ग्रुशोवाया ऑयल ट्रांसशिपमेंट बेस भी शामिल है, जिसे दक्षिणी रूस के सबसे बड़े तेल निर्यात केंद्रों में गिना जाता है।
इसके अलावा वोल्गोग्राद क्षेत्र और क्रीमिया में स्थित ईंधन भंडारण सुविधाओं पर भी हमले हुए हैं। रूस ने कुछ स्थानों पर आग लगने की पुष्टि की है, हालांकि वास्तविक नुकसान के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे हमले लगातार जारी रहते हैं तो रूस की निर्यात क्षमता प्रभावित हो सकती है, क्योंकि तेल उत्पादन जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका परिवहन और भंडारण नेटवर्क भी होता है।
जून में रूस का तेल निर्यात क्यों घट सकता है?
Reuters के मुताबिक जून 2026 में रूस के पश्चिमी बंदरगाहों से होने वाला कच्चे तेल का निर्यात लगभग 17 लाख बैरल प्रतिदिन तक गिर सकता है। मई में यह आंकड़ा करीब 25 लाख बैरल प्रतिदिन था।
प्रिमॉर्स्क, उस्त-लूगा और नोवोरोस्सिय्स्क जैसे प्रमुख बंदरगाह रूस के तेल निर्यात की रीढ़ माने जाते हैं। यदि इन बंदरगाहों की गतिविधियां प्रभावित होती हैं तो वैश्विक बाजार में रूसी तेल की उपलब्धता कम हो सकती है।
रूस फिलहाल दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ उत्पादन और लॉजिस्टिक्स पर दबाव है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू ईंधन की मांग बढ़ रही है। इसी वजह से मॉस्को सरकार निर्यात की बजाय घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता दे रही है।
रूस क्यों बढ़ा रहा है घरेलू रिफाइनिंग?
रिपोर्टों के अनुसार रूस जून के दौरान अपनी रिफाइनरियों में तेल प्रोसेसिंग को 2.5 लाख से 4 लाख बैरल प्रतिदिन तक बढ़ाने की योजना बना रहा है।
इसका मुख्य कारण घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। रूस नहीं चाहता कि युद्ध और हमलों के कारण उसके भीतर ईंधन संकट पैदा हो।
जब कोई देश अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा घरेलू जरूरतों के लिए रोकता है तो निर्यात स्वाभाविक रूप से घट जाता है। यही स्थिति फिलहाल रूस में बनती दिखाई दे रही है।
भारत के लिए रूसी तेल इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद रूस ने अपने कच्चे तेल पर भारी छूट देना शुरू किया।
भारत ने इस अवसर का फायदा उठाया और बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदना शुरू किया। आज भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा रूस से आयात करता है।
ऊर्जा क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में भारत का रूसी तेल आयात फरवरी की तुलना में लगभग 63 प्रतिशत अधिक रहा। इससे स्पष्ट है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा में रूस की भूमिका पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है।
क्या भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है?
अगर रूस का निर्यात लंबे समय तक घटता है तो सबसे पहले वैश्विक कच्चे तेल बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है। सप्लाई कम होने और मांग स्थिर रहने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बनता है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी बड़ी हलचल का असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
हालांकि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। इनमें टैक्स, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च और मार्केटिंग मार्जिन भी शामिल होते हैं। फिर भी यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।
महंगाई पर क्या पड़ सकता है असर?
तेल केवल वाहनों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन नहीं है। यह पूरी अर्थव्यवस्था की लागत को प्रभावित करता है।
जब कच्चा तेल महंगा होता है तो:
- परिवहन लागत बढ़ती है।
- खाद्य पदार्थों की सप्लाई महंगी होती है।
- उर्वरक और रसायन उद्योग प्रभावित होते हैं।
- एयरलाइंस और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत बढ़ती है।
इन सभी कारणों से खुदरा महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि वैश्विक तेल बाजार में होने वाली हर बड़ी घटना पर भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों की नजर रहती है।
क्या भारत के पास विकल्प मौजूद हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पूरी तरह रूस पर निर्भर नहीं है। भारत के पास इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे कई वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता मौजूद हैं।
हालांकि समस्या यह है कि रूसी तेल आमतौर पर अन्य स्रोतों की तुलना में सस्ता मिलता रहा है। यदि भारत को अधिक महंगे स्रोतों से तेल खरीदना पड़ा तो आयात बिल बढ़ सकता है।
यही कारण है कि भारत ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है।
आगे क्या देखना होगा?
फिलहाल बाजार की नजर तीन प्रमुख बातों पर रहेगी—यूक्रेन के आगे के हमले, रूस की उत्पादन क्षमता और OPEC+ देशों की नीति। यदि रूस निर्यात में बड़ी कटौती करता है और वैश्विक बाजार में वैकल्पिक सप्लाई नहीं बढ़ती तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि क्या रूसी तेल की आपूर्ति स्थिर बनी रहती है या आने वाले महीनों में इसमें और गिरावट आती है। यदि स्थिति बिगड़ती है तो इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महंगाई और आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी दिखाई दे सकता है।
Source: Reuters, International Energy Market Reports, Global Oil Trade Data Analysis.


